नतीजा यह है कि ट्रंप प्रशासन की रणनीति तेज़ कूटनीतिक समझौते से हटकर लंबे समय तक आर्थिक अलगाव, नौसैनिक दबाव और सैन्य विकल्प खुले रखने की दिशा में जाती दिख रही है। यह कोई स्थायी शांति नहीं, बल्कि दबाव और सहनशक्ति की ऐसी लड़ाई है जिसमें दोनों पक्ष मानते हैं कि समय उनके पक्ष में जा सकता है।
जून के मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी समझौता-ज्ञापन ने अधिकतम 60 दिनों में अंतिम डील का लक्ष्य रखा था। इसका उद्देश्य युद्ध समाप्त करना, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण से जुड़ी व्यवस्था बनाना और होर्मुज़ में सामान्य वाणिज्यिक आवाजाही बहाल करना था। पर समयसीमा बीतने तक इनमें से कोई लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हुआ।
ट्रंप ने कहा कि ईरान समझौता चाहता है, लेकिन वह ऐसा समझौता नहीं करेगा जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति आवश्यक मानते हैं। वॉशिंगटन ने अंतरिम व्यवस्था बढ़ाने से भी इनकार कर दिया। इससे संकेत मिलता है कि प्रशासन अब समय, प्रतिबंधों और ईरान की कमजोर होती अर्थव्यवस्था को बातचीत में रियायतें हासिल करने के औजार के रूप में देख रहा है।
अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकाबंदी जारी रखने की बात कही है। इस तरह कूटनीति अब किसी तय समयसीमा वाले समझौते की प्रक्रिया कम और आर्थिक तथा सैन्य दबाव के लंबे अभियान जैसी अधिक दिखाई दे रही है।
वॉशिंगटन और तेहरान की सार्वजनिक बयानबाजी से बातचीत की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं होती। ट्रंप पहले कह चुके थे कि ईरान के साथ बातचीत शुरू हो गई है। इसके बाद उनके दामाद और विशेष दूत जारेड कुशनर ने बातचीत को “सकारात्मक” और “सक्रिय” बताया।
लेकिन ट्रंप ने बाद में सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि ईरान के साथ “कोई बातचीत या संवाद चल नहीं रहा और न ही तय है।” ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने भी प्रत्यक्ष अमेरिका-ईरान वार्ता से इनकार किया। उनके अनुसार, संपर्क केवल मध्यस्थों के जरिए संदेशों के आदान-प्रदान तक सीमित है और तेहरान का मुख्य ध्यान ओमान के साथ होर्मुज़ में जहाजों की आवाजाही पर बातचीत पर है।
इस विरोधाभास का अर्थ यह हो सकता है कि पर्दे के पीछे सीमित संदेश-व्यवस्था तो मौजूद है, लेकिन दोनों पक्ष उसे औपचारिक बातचीत मानने के लिए तैयार नहीं हैं। यह अंतर किसी संभावित समझौते की गुंजाइश को और संकीर्ण करता है।
होर्मुज़ संकट इस गतिरोध का सबसे तात्कालिक केंद्र है। ट्रंप का कहना है कि जलडमरूमध्य खुला है, अमेरिकी नियंत्रण में है और वहां की शेष ईरानी गतिविधि केवल परेशानी पैदा करने तक सीमित है। उन्होंने यह भी कहा कि नौसैनिक नाकाबंदी जारी है और समुद्री बारूदी सुरंगों को हटाया जा चुका है या निष्क्रिय कर दिया गया है।
ईरान इसके विपरीत कहता है कि जलडमरूमध्य जहाजरानी के लिए बंद है और तब तक खुला नहीं रहेगा जब तक अमेरिका अपने बंदरगाह प्रतिबंध, प्रतिबंधात्मक आर्थिक उपाय और सैन्य धमकियां वापस नहीं लेता। ईरानी अधिकारियों ने ओमान के साथ वैकल्पिक या नियंत्रित समुद्री मार्गों पर बातचीत की बात कही है, लेकिन अमेरिका ऐसी व्यवस्था स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखता जिसमें तेहरान को खाड़ी में प्रवेश करने वाले जहाजों पर निर्णायक नियंत्रण मिले।
इसलिए “जलडमरूमध्य खुला है” और “जलडमरूमध्य बंद है”—दोनों दावे एक साथ राजनीतिक संदेश का काम कर रहे हैं। जमीनी स्तर पर सीमित आवाजाही और सामान्य वाणिज्यिक यातायात के बीच का अंतर ही बाजारों की चिंता बढ़ा रहा है।
संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान से होने वाले सभी व्यापार, वाणिज्यिक आदान-प्रदान और वित्तीय लेन-देन को अगली सूचना तक रोक दिया। अबू धाबी ने इस फैसले के लिए ईरान से दागी गई बताई गई बैलिस्टिक मिसाइलों को जिम्मेदार ठहराया, जबकि तेहरान ने मिसाइल प्रक्षेपण की जिम्मेदारी से इनकार किया है।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि UAE लंबे समय से ईरान के लिए व्यापार, भुगतान, आयात और पुनः-निर्यात का एक अहम क्षेत्रीय संपर्क-बिंदु रहा है। ऐसे चैनल बंद होने से ईरान की आयात क्षमता, विदेशी मुद्रा तक पहुंच, भुगतान व्यवस्था और प्रतिबंधों के बीच व्यापार करने की गुंजाइश और सीमित हो सकती है।
ईरान पहले ही गंभीर महंगाई और खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी का सामना कर रहा है। ऐसे में बाहरी आर्थिक दबाव का असर घरेलू बाजार में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों, कारोबार की लागत और आम लोगों की क्रयशक्ति पर पड़ सकता है। इससे सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है—हालांकि यह भी संभव है कि तेहरान इसे बाहरी घेराबंदी बताकर अपने समर्थकों को लामबंद करने की कोशिश करे।
इस स्थिति को “अस्थिर होल्डिंग पैटर्न” इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि यह किसी साझा समझौते पर आधारित नहीं है। दोनों पक्षों ने दूसरे की मुख्य शर्तें स्वीकार नहीं की हैं। अमेरिका आर्थिक दबाव और संभावित आगे के हमलों का विकल्प बनाए हुए है। ईरान होर्मुज़ में समुद्री व्यवधान, मिसाइल क्षमता और नियंत्रित सैन्य बढ़ोतरी के जरिए जवाब देने की स्थिति में है।
एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने कहा है कि यदि अंतरिम शांति व्यवस्था लागू नहीं की गई तो ईरान रक्षात्मक मुद्रा से “पूरी तरह आक्रामक” सैन्य रुख अपना सकता है। दूसरी ओर, वॉशिंगटन अंतरिम समझौता बढ़ाने से इनकार कर चुका है। इस टकराव में किसी छोटी समुद्री घटना, मिसाइल चेतावनी या गलत आकलन से नया सैन्य संघर्ष भड़कने का जोखिम बना हुआ है।
युद्ध अब लगभग 24 सप्ताह पुराना हो चुका है—ट्रंप की मूल चार से पांच सप्ताह की उम्मीद से काफी आगे। इस अवधि ने प्रशासन के लिए एक कठिन राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है: जिस युद्ध को जल्दी खत्म करने का दावा किया गया था, वह अब आर्थिक घेराबंदी, समुद्री संकट और संभावित नए हमलों वाला लंबा संघर्ष बन गया है।
तेल बाजार अब होर्मुज़ में व्यवधान को कुछ दिनों के अस्थायी झटके की तरह नहीं, बल्कि कई हफ्तों या महीनों तक चल सकने वाली स्थिति की तरह देख रहा है। ब्रेंट कच्चा तेल करीब 90 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर हुआ और नए सैन्य तनाव के बीच 91 डॉलर से ऊपर भी पहुंचा।
महंगा तेल वैश्विक महंगाई की चिंता बढ़ाता है। इसी वजह से अमेरिकी 30-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5.327% तक पहुंच गई, जो 2007 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर बताया गया। बाजारों में यह चिंता भी है कि महंगाई से निपटने, राजकोषीय खर्च और बढ़ती सरकारी कर्ज-आपूर्ति के कारण लंबी अवधि की उधारी महंगी हो सकती है।
होर्मुज़ खुलने की उम्मीद कमजोर पड़ने से अमेरिकी और एशियाई शेयर बाजारों में भी दबाव दिखा, खासकर चिप निर्माताओं और सेमीकंडक्टर से जुड़े शेयरों पर। ऊंची ऊर्जा और शिपिंग लागत विनिर्माण की मांग, कंपनियों के मार्जिन और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों को प्रभावित कर सकती है।
फिलहाल अमेरिका तेज़ समझौते के बजाय दबाव बनाए रखने की नीति पर चलता दिख रहा है, जबकि ईरान प्रतिबंधों, नाकाबंदी और सैन्य धमकियों को हटाए बिना होर्मुज़ को सामान्य बनाने से इनकार कर रहा है। सीमित मध्यस्थता या संदेश-आदान-प्रदान भविष्य में किसी नए समझौते का आधार बन सकता है, लेकिन सार्वजनिक तौर पर दोनों पक्षों की भाषा लगातार कठोर हो रही है।
इसलिए निकट भविष्य में सबसे संभावित स्थिति न तो स्थायी शांति है और न ही तत्काल पूर्ण युद्धविराम, बल्कि लंबा, महंगा और आसानी से भड़क सकने वाला गतिरोध है—जिसका असर ईरान और खाड़ी क्षेत्र से आगे बढ़कर तेल, महंगाई, ब्याज दरों और वैश्विक बाजारों तक पहुंच रहा है।
नतीजा यह है कि ट्रंप प्रशासन की रणनीति तेज़ कूटनीतिक समझौते से हटकर लंबे समय तक आर्थिक अलगाव, नौसैनिक दबाव और सैन्य विकल्प खुले रखने की दिशा में जाती दिख रही है। यह कोई स्थायी शांति नहीं, बल्कि दबाव और सहनशक्ति की ऐसी लड़ाई है जिसमें दोनों पक्ष मानते हैं कि समय उनके पक्ष में जा सकता है।
जून के मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी समझौता-ज्ञापन ने अधिकतम 60 दिनों में अंतिम डील का लक्ष्य रखा था। इसका उद्देश्य युद्ध समाप्त करना, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण से जुड़ी व्यवस्था बनाना और होर्मुज़ में सामान्य वाणिज्यिक आवाजाही बहाल करना था। पर समयसीमा बीतने तक इनमें से कोई लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हुआ।
ट्रंप ने कहा कि ईरान समझौता चाहता है, लेकिन वह ऐसा समझौता नहीं करेगा जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति आवश्यक मानते हैं। वॉशिंगटन ने अंतरिम व्यवस्था बढ़ाने से भी इनकार कर दिया। इससे संकेत मिलता है कि प्रशासन अब समय, प्रतिबंधों और ईरान की कमजोर होती अर्थव्यवस्था को बातचीत में रियायतें हासिल करने के औजार के रूप में देख रहा है।
अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकाबंदी जारी रखने की बात कही है। इस तरह कूटनीति अब किसी तय समयसीमा वाले समझौते की प्रक्रिया कम और आर्थिक तथा सैन्य दबाव के लंबे अभियान जैसी अधिक दिखाई दे रही है।
वॉशिंगटन और तेहरान की सार्वजनिक बयानबाजी से बातचीत की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं होती। ट्रंप पहले कह चुके थे कि ईरान के साथ बातचीत शुरू हो गई है। इसके बाद उनके दामाद और विशेष दूत जारेड कुशनर ने बातचीत को “सकारात्मक” और “सक्रिय” बताया।
लेकिन ट्रंप ने बाद में सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि ईरान के साथ “कोई बातचीत या संवाद चल नहीं रहा और न ही तय है।” ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने भी प्रत्यक्ष अमेरिका-ईरान वार्ता से इनकार किया। उनके अनुसार, संपर्क केवल मध्यस्थों के जरिए संदेशों के आदान-प्रदान तक सीमित है और तेहरान का मुख्य ध्यान ओमान के साथ होर्मुज़ में जहाजों की आवाजाही पर बातचीत पर है।
इस विरोधाभास का अर्थ यह हो सकता है कि पर्दे के पीछे सीमित संदेश-व्यवस्था तो मौजूद है, लेकिन दोनों पक्ष उसे औपचारिक बातचीत मानने के लिए तैयार नहीं हैं। यह अंतर किसी संभावित समझौते की गुंजाइश को और संकीर्ण करता है।
होर्मुज़ संकट इस गतिरोध का सबसे तात्कालिक केंद्र है। ट्रंप का कहना है कि जलडमरूमध्य खुला है, अमेरिकी नियंत्रण में है और वहां की शेष ईरानी गतिविधि केवल परेशानी पैदा करने तक सीमित है। उन्होंने यह भी कहा कि नौसैनिक नाकाबंदी जारी है और समुद्री बारूदी सुरंगों को हटाया जा चुका है या निष्क्रिय कर दिया गया है।
ईरान इसके विपरीत कहता है कि जलडमरूमध्य जहाजरानी के लिए बंद है और तब तक खुला नहीं रहेगा जब तक अमेरिका अपने बंदरगाह प्रतिबंध, प्रतिबंधात्मक आर्थिक उपाय और सैन्य धमकियां वापस नहीं लेता। ईरानी अधिकारियों ने ओमान के साथ वैकल्पिक या नियंत्रित समुद्री मार्गों पर बातचीत की बात कही है, लेकिन अमेरिका ऐसी व्यवस्था स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखता जिसमें तेहरान को खाड़ी में प्रवेश करने वाले जहाजों पर निर्णायक नियंत्रण मिले।
इसलिए “जलडमरूमध्य खुला है” और “जलडमरूमध्य बंद है”—दोनों दावे एक साथ राजनीतिक संदेश का काम कर रहे हैं। जमीनी स्तर पर सीमित आवाजाही और सामान्य वाणिज्यिक यातायात के बीच का अंतर ही बाजारों की चिंता बढ़ा रहा है।
संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान से होने वाले सभी व्यापार, वाणिज्यिक आदान-प्रदान और वित्तीय लेन-देन को अगली सूचना तक रोक दिया। अबू धाबी ने इस फैसले के लिए ईरान से दागी गई बताई गई बैलिस्टिक मिसाइलों को जिम्मेदार ठहराया, जबकि तेहरान ने मिसाइल प्रक्षेपण की जिम्मेदारी से इनकार किया है।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि UAE लंबे समय से ईरान के लिए व्यापार, भुगतान, आयात और पुनः-निर्यात का एक अहम क्षेत्रीय संपर्क-बिंदु रहा है। ऐसे चैनल बंद होने से ईरान की आयात क्षमता, विदेशी मुद्रा तक पहुंच, भुगतान व्यवस्था और प्रतिबंधों के बीच व्यापार करने की गुंजाइश और सीमित हो सकती है।
ईरान पहले ही गंभीर महंगाई और खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी का सामना कर रहा है। ऐसे में बाहरी आर्थिक दबाव का असर घरेलू बाजार में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों, कारोबार की लागत और आम लोगों की क्रयशक्ति पर पड़ सकता है। इससे सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है—हालांकि यह भी संभव है कि तेहरान इसे बाहरी घेराबंदी बताकर अपने समर्थकों को लामबंद करने की कोशिश करे।
इस स्थिति को “अस्थिर होल्डिंग पैटर्न” इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि यह किसी साझा समझौते पर आधारित नहीं है। दोनों पक्षों ने दूसरे की मुख्य शर्तें स्वीकार नहीं की हैं। अमेरिका आर्थिक दबाव और संभावित आगे के हमलों का विकल्प बनाए हुए है। ईरान होर्मुज़ में समुद्री व्यवधान, मिसाइल क्षमता और नियंत्रित सैन्य बढ़ोतरी के जरिए जवाब देने की स्थिति में है।
एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने कहा है कि यदि अंतरिम शांति व्यवस्था लागू नहीं की गई तो ईरान रक्षात्मक मुद्रा से “पूरी तरह आक्रामक” सैन्य रुख अपना सकता है। दूसरी ओर, वॉशिंगटन अंतरिम समझौता बढ़ाने से इनकार कर चुका है। इस टकराव में किसी छोटी समुद्री घटना, मिसाइल चेतावनी या गलत आकलन से नया सैन्य संघर्ष भड़कने का जोखिम बना हुआ है।
युद्ध अब लगभग 24 सप्ताह पुराना हो चुका है—ट्रंप की मूल चार से पांच सप्ताह की उम्मीद से काफी आगे। इस अवधि ने प्रशासन के लिए एक कठिन राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है: जिस युद्ध को जल्दी खत्म करने का दावा किया गया था, वह अब आर्थिक घेराबंदी, समुद्री संकट और संभावित नए हमलों वाला लंबा संघर्ष बन गया है।
तेल बाजार अब होर्मुज़ में व्यवधान को कुछ दिनों के अस्थायी झटके की तरह नहीं, बल्कि कई हफ्तों या महीनों तक चल सकने वाली स्थिति की तरह देख रहा है। ब्रेंट कच्चा तेल करीब 90 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर हुआ और नए सैन्य तनाव के बीच 91 डॉलर से ऊपर भी पहुंचा।
महंगा तेल वैश्विक महंगाई की चिंता बढ़ाता है। इसी वजह से अमेरिकी 30-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5.327% तक पहुंच गई, जो 2007 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर बताया गया। बाजारों में यह चिंता भी है कि महंगाई से निपटने, राजकोषीय खर्च और बढ़ती सरकारी कर्ज-आपूर्ति के कारण लंबी अवधि की उधारी महंगी हो सकती है।
होर्मुज़ खुलने की उम्मीद कमजोर पड़ने से अमेरिकी और एशियाई शेयर बाजारों में भी दबाव दिखा, खासकर चिप निर्माताओं और सेमीकंडक्टर से जुड़े शेयरों पर। ऊंची ऊर्जा और शिपिंग लागत विनिर्माण की मांग, कंपनियों के मार्जिन और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों को प्रभावित कर सकती है।
फिलहाल अमेरिका तेज़ समझौते के बजाय दबाव बनाए रखने की नीति पर चलता दिख रहा है, जबकि ईरान प्रतिबंधों, नाकाबंदी और सैन्य धमकियों को हटाए बिना होर्मुज़ को सामान्य बनाने से इनकार कर रहा है। सीमित मध्यस्थता या संदेश-आदान-प्रदान भविष्य में किसी नए समझौते का आधार बन सकता है, लेकिन सार्वजनिक तौर पर दोनों पक्षों की भाषा लगातार कठोर हो रही है।
इसलिए निकट भविष्य में सबसे संभावित स्थिति न तो स्थायी शांति है और न ही तत्काल पूर्ण युद्धविराम, बल्कि लंबा, महंगा और आसानी से भड़क सकने वाला गतिरोध है—जिसका असर ईरान और खाड़ी क्षेत्र से आगे बढ़कर तेल, महंगाई, ब्याज दरों और वैश्विक बाजारों तक पहुंच रहा है।