बाद में PET स्कैन पर उच्च अमाइलॉइड स्तर वाले प्रतिभागियों में, कम-से-कम सात साल पहले किए गए MRI में कॉर्टेक्स की संरचना और उसकी मोटाई में अंतर दिखाई दे रहा था। इससे यह संभावना बनती है कि बाद में अमाइलॉइड-पॉजिटिव होने से जुड़ी जैविक प्रक्रिया, पारंपरिक अमाइलॉइड-PET इमेजिंग में बड़ी मात्रा में प्लाक दिखने से पहले ही मस्तिष्क की संरचना को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि कॉर्टिकल पतलापन दिखने वाला हर मामला अल्जाइमर रोग का शुरुआती संकेत है। उम्र बढ़ने के साथ कॉर्टेक्स में स्वाभाविक बदलाव आते हैं। पिछले शोधों में कॉर्टिकल मोटाई का संबंध अमाइलॉइड, टाउ, रक्तवाहिका-संबंधी जोखिम और अन्य कारकों से पाया गया है। 70 वर्ष की उम्र के संज्ञानात्मक रूप से स्वस्थ वयस्कों पर किए गए एक अध्ययन में अल्जाइमर-संबंधी क्षेत्रों के कॉर्टिकल पतले होने की दर का संबंध रक्तवाहिका-संबंधी बोझ से मिला, लेकिन अमाइलॉइड स्थिति से नहीं।
विश्लेषण में शामिल थे:
शोधकर्ताओं ने किसी एक स्कैन को निदान मानने के बजाय समय के साथ बदलावों की पूरी दिशा या trajectory का अध्ययन किया। उन्होंने उन लोगों में कॉर्टिकल मोटाई और उसके बदलने की दर की तुलना की, जो बाद में PET पर उच्च-अमाइलॉइड समूह में पहुंचे, उन लोगों से जो अमाइलॉइड-नेगेटिव बने रहे। तुलना के लिए इस्तेमाल किए गए MRI स्कैन उन वर्षों के थे, जो प्रतिभागियों के उच्च-अमाइलॉइड होने से पहले किए गए थे।
यह लंबे समय तक चलने वाला अध्ययन-डिजाइन महत्वपूर्ण है। एक ही समय पर लिया गया स्कैन केवल यह बता सकता है कि दो समूहों में अंतर है। बार-बार किए गए स्कैन यह दिखा सकते हैं कि बाद में होने वाली जैविक घटना से पहले मस्तिष्क की संरचना में बदलाव की गति या उसका पैटर्न अलग था।
अमाइलॉइड-PET का उपयोग आमतौर पर पर्याप्त मात्रा में मौजूद फाइब्रिलर अमाइलॉइड प्लाक का पता लगाने के लिए किया जाता है। लेकिन स्कैन तभी पॉजिटिव होता है, जब अमाइलॉइड उस स्तर तक पहुंच जाए जिसे इमेजिंग तकनीक और उसकी तय सीमा पहचान सके। इसलिए नेगेटिव या सीमा से नीचे का PET स्कैन यह दर्शा सकता है कि प्लाक अभी पता लगाने योग्य मात्रा में नहीं है—यह जरूरी नहीं कि अल्जाइमर से जुड़ी जैविक प्रक्रिया शुरू ही न हुई हो।
ओस्लो विश्लेषण यह साबित नहीं करता कि कॉर्टिकल बदलाव अमाइलॉइड जमा होने का कारण बनते हैं या ये बदलाव केवल अल्जाइमर रोग के कारण होते हैं। लेकिन यह अमाइलॉइड-PET की एक सरल व्याख्या को चुनौती देता है: पहला पॉजिटिव PET स्कैन बीमारी की शुरुआत का क्षण हो। संभव है कि उस समय तक मस्तिष्क की संरचना में बदलाव पहले से चल रहे हों।
अध्ययन अकेले इन संभावनाओं में से किसी एक को सिद्ध नहीं करता। संभावित व्याख्याओं में शामिल हैं:
अन्य इमेजिंग अध्ययनों में भी संज्ञानात्मक रूप से स्वस्थ बुजुर्गों में कॉर्टिकल मोटाई, अमाइलॉइड और टाउ के बीच अलग-अलग संबंध मिले हैं। इससे स्पष्ट होता है कि कॉर्टिकल पतलेपन को अपने-आप में निदान नहीं, बल्कि एक जैविक संकेत के रूप में देखना चाहिए। रक्तवाहिका-संबंधी बोझ पर मिले निष्कर्ष भी यही सावधानी बरतने की वजह देते हैं।
यदि आगे के अध्ययनों में यह पैटर्न दोहराया जाता है और यह व्यक्तिगत मरीजों के लिए पर्याप्त रूप से विशिष्ट साबित होता है, तो बार-बार किया जाने वाला MRI लक्षणों या उच्च अमाइलॉइड-PET स्तर से पहले लोगों की निगरानी में मदद कर सकता है। इसे रक्त-आधारित बायोमार्कर, संज्ञानात्मक परीक्षण, आनुवंशिक जोखिम की जानकारी और टाउ या अमाइलॉइड इमेजिंग के साथ मिलाकर अधिक व्यापक जोखिम-प्रोफाइल बनाया जा सकता है।
जल्दी जैविक निगरानी से शोधकर्ताओं को मदद मिल सकती है:
फिलहाल, ये निष्कर्ष सामान्य आबादी में कॉर्टिकल पतलेपन वाले लोगों की स्क्रीनिंग या MRI के आधार पर अल्जाइमर का निदान करने का समर्थन नहीं करते। सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल यही है कि इन बदलावों का पहले पता लगाकर और उस आधार पर कदम उठाकर क्या मरीजों के परिणाम वास्तव में बेहतर किए जा सकते हैं।
बीमारी के समय और उपचार का सवाल दवा अनुसंधान के लिए भी अहम है। किसी दवा का परीक्षण अक्सर तब शुरू होता है, जब लक्षण और मस्तिष्क में स्थापित पैथोलॉजी पहले से मौजूद हो—भले ही बीमारी की प्रक्रिया कई साल पहले शुरू हो चुकी हो।
इंजेक्शन के रूप में दी जाने वाली लिराग्लूटाइड पर किए गए एक छोटे अध्ययन में अल्जाइमर के प्रति संवेदनशील मस्तिष्क क्षेत्रों में वॉल्यूम घटने की दर कम होने और संज्ञानात्मक गिरावट धीमी होने के संभावित संकेत मिले। लेकिन यह अभी इमेजिंग और शुरुआती क्लिनिकल संकेत हैं, लिराग्लूटाइड को अल्जाइमर का प्रभावी उपचार साबित करने वाला निर्णायक प्रमाण नहीं।
इसके विपरीत, Novo Nordisk के बड़े EVOKE और EVOKE+ चरण-3 परीक्षणों में 40 देशों के 566 केंद्रों पर 3,808 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। इन परीक्षणों में रोजाना मुंह से लेने वाली सेमाग्लूटाइड की अधिकतम 14 मिलीग्राम तक की खुराक का अध्ययन किया गया। 104 सप्ताह बाद, शुरुआती लक्षणों वाले अल्जाइमर रोगियों में सेमाग्लूटाइड ने प्लेसीबो की तुलना में संज्ञानात्मक या कार्यात्मक गिरावट को धीमा नहीं किया।
इन परिणामों से यह साबित नहीं होता कि अल्जाइमर में हर GLP-1 दवा अप्रभावी है। वे केवल यह दिखाते हैं कि जांची गई खुराक, अवधि और मरीजों के समूह में मुंह से दी गई सेमाग्लूटाइड से क्लिनिकल लाभ नहीं मिला। लिराग्लूटाइड और सेमाग्लूटाइड के अलग नतीजों के पीछे दवा के अणु की विशेषताएं, खुराक, शरीर में दवा का संपर्क, इंजेक्शन और गोली के रूप में मिलने का अंतर, उपचार का समय, बीमारी की अवस्था या मस्तिष्क के संबंधित हिस्सों तक पहुंचने वाली दवा की मात्रा जैसे कारण हो सकते हैं। ये अभी शोध की संभावनाएं हैं, परीक्षणों से सिद्ध निष्कर्ष नहीं।
MRI के सात साल पहले दिखने वाले संकेत और GLP-1 दवाओं के मिले-जुले नतीजे एक ही बड़ी चुनौती की ओर इशारा करते हैं: अल्जाइमर से जुड़ी जैविक प्रक्रिया चुपचाप शुरू हो सकती है, जबकि विश्वसनीय जांच और उपचार परीक्षण अक्सर काफी देर से शुरू होते हैं।
आगे के शोध में यह तय करना होगा कि शुरुआती संरचनात्मक बदलावों में से कौन-से अल्जाइमर के लिए विशिष्ट और भविष्यवाणी करने में सक्षम हैं। साथ ही, कम खर्च और कम असुविधा वाले बायोमार्कर विकसित करने, ओस्लो के निष्कर्षों को सहकर्मी-समीक्षित अध्ययनों में दोहराने और यह जांचने की जरूरत है कि ज्यादा प्लाक बनने से पहले उपचार शुरू करने पर संज्ञानात्मक क्षमता को बचाया जा सकता है या नहीं।
फिलहाल, सात साल पहले दिखने वाला MRI संकेत इस बात का प्रमाण है कि अल्जाइमर की दिखाई देने वाली समय-रेखा केवल अमाइलॉइड-PET से मिलने वाली जानकारी से पहले शुरू हो सकती है। यह अभी इस्तेमाल के लिए तैयार निदान या उपचार-पद्धति नहीं है।
बाद में PET स्कैन पर उच्च अमाइलॉइड स्तर वाले प्रतिभागियों में, कम-से-कम सात साल पहले किए गए MRI में कॉर्टेक्स की संरचना और उसकी मोटाई में अंतर दिखाई दे रहा था। इससे यह संभावना बनती है कि बाद में अमाइलॉइड-पॉजिटिव होने से जुड़ी जैविक प्रक्रिया, पारंपरिक अमाइलॉइड-PET इमेजिंग में बड़ी मात्रा में प्लाक दिखने से पहले ही मस्तिष्क की संरचना को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि कॉर्टिकल पतलापन दिखने वाला हर मामला अल्जाइमर रोग का शुरुआती संकेत है। उम्र बढ़ने के साथ कॉर्टेक्स में स्वाभाविक बदलाव आते हैं। पिछले शोधों में कॉर्टिकल मोटाई का संबंध अमाइलॉइड, टाउ, रक्तवाहिका-संबंधी जोखिम और अन्य कारकों से पाया गया है। 70 वर्ष की उम्र के संज्ञानात्मक रूप से स्वस्थ वयस्कों पर किए गए एक अध्ययन में अल्जाइमर-संबंधी क्षेत्रों के कॉर्टिकल पतले होने की दर का संबंध रक्तवाहिका-संबंधी बोझ से मिला, लेकिन अमाइलॉइड स्थिति से नहीं।
विश्लेषण में शामिल थे:
शोधकर्ताओं ने किसी एक स्कैन को निदान मानने के बजाय समय के साथ बदलावों की पूरी दिशा या trajectory का अध्ययन किया। उन्होंने उन लोगों में कॉर्टिकल मोटाई और उसके बदलने की दर की तुलना की, जो बाद में PET पर उच्च-अमाइलॉइड समूह में पहुंचे, उन लोगों से जो अमाइलॉइड-नेगेटिव बने रहे। तुलना के लिए इस्तेमाल किए गए MRI स्कैन उन वर्षों के थे, जो प्रतिभागियों के उच्च-अमाइलॉइड होने से पहले किए गए थे।
यह लंबे समय तक चलने वाला अध्ययन-डिजाइन महत्वपूर्ण है। एक ही समय पर लिया गया स्कैन केवल यह बता सकता है कि दो समूहों में अंतर है। बार-बार किए गए स्कैन यह दिखा सकते हैं कि बाद में होने वाली जैविक घटना से पहले मस्तिष्क की संरचना में बदलाव की गति या उसका पैटर्न अलग था।
अमाइलॉइड-PET का उपयोग आमतौर पर पर्याप्त मात्रा में मौजूद फाइब्रिलर अमाइलॉइड प्लाक का पता लगाने के लिए किया जाता है। लेकिन स्कैन तभी पॉजिटिव होता है, जब अमाइलॉइड उस स्तर तक पहुंच जाए जिसे इमेजिंग तकनीक और उसकी तय सीमा पहचान सके। इसलिए नेगेटिव या सीमा से नीचे का PET स्कैन यह दर्शा सकता है कि प्लाक अभी पता लगाने योग्य मात्रा में नहीं है—यह जरूरी नहीं कि अल्जाइमर से जुड़ी जैविक प्रक्रिया शुरू ही न हुई हो।
ओस्लो विश्लेषण यह साबित नहीं करता कि कॉर्टिकल बदलाव अमाइलॉइड जमा होने का कारण बनते हैं या ये बदलाव केवल अल्जाइमर रोग के कारण होते हैं। लेकिन यह अमाइलॉइड-PET की एक सरल व्याख्या को चुनौती देता है: पहला पॉजिटिव PET स्कैन बीमारी की शुरुआत का क्षण हो। संभव है कि उस समय तक मस्तिष्क की संरचना में बदलाव पहले से चल रहे हों।
अध्ययन अकेले इन संभावनाओं में से किसी एक को सिद्ध नहीं करता। संभावित व्याख्याओं में शामिल हैं:
अन्य इमेजिंग अध्ययनों में भी संज्ञानात्मक रूप से स्वस्थ बुजुर्गों में कॉर्टिकल मोटाई, अमाइलॉइड और टाउ के बीच अलग-अलग संबंध मिले हैं। इससे स्पष्ट होता है कि कॉर्टिकल पतलेपन को अपने-आप में निदान नहीं, बल्कि एक जैविक संकेत के रूप में देखना चाहिए। रक्तवाहिका-संबंधी बोझ पर मिले निष्कर्ष भी यही सावधानी बरतने की वजह देते हैं।
यदि आगे के अध्ययनों में यह पैटर्न दोहराया जाता है और यह व्यक्तिगत मरीजों के लिए पर्याप्त रूप से विशिष्ट साबित होता है, तो बार-बार किया जाने वाला MRI लक्षणों या उच्च अमाइलॉइड-PET स्तर से पहले लोगों की निगरानी में मदद कर सकता है। इसे रक्त-आधारित बायोमार्कर, संज्ञानात्मक परीक्षण, आनुवंशिक जोखिम की जानकारी और टाउ या अमाइलॉइड इमेजिंग के साथ मिलाकर अधिक व्यापक जोखिम-प्रोफाइल बनाया जा सकता है।
जल्दी जैविक निगरानी से शोधकर्ताओं को मदद मिल सकती है:
फिलहाल, ये निष्कर्ष सामान्य आबादी में कॉर्टिकल पतलेपन वाले लोगों की स्क्रीनिंग या MRI के आधार पर अल्जाइमर का निदान करने का समर्थन नहीं करते। सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल यही है कि इन बदलावों का पहले पता लगाकर और उस आधार पर कदम उठाकर क्या मरीजों के परिणाम वास्तव में बेहतर किए जा सकते हैं।
बीमारी के समय और उपचार का सवाल दवा अनुसंधान के लिए भी अहम है। किसी दवा का परीक्षण अक्सर तब शुरू होता है, जब लक्षण और मस्तिष्क में स्थापित पैथोलॉजी पहले से मौजूद हो—भले ही बीमारी की प्रक्रिया कई साल पहले शुरू हो चुकी हो।
इंजेक्शन के रूप में दी जाने वाली लिराग्लूटाइड पर किए गए एक छोटे अध्ययन में अल्जाइमर के प्रति संवेदनशील मस्तिष्क क्षेत्रों में वॉल्यूम घटने की दर कम होने और संज्ञानात्मक गिरावट धीमी होने के संभावित संकेत मिले। लेकिन यह अभी इमेजिंग और शुरुआती क्लिनिकल संकेत हैं, लिराग्लूटाइड को अल्जाइमर का प्रभावी उपचार साबित करने वाला निर्णायक प्रमाण नहीं।
इसके विपरीत, Novo Nordisk के बड़े EVOKE और EVOKE+ चरण-3 परीक्षणों में 40 देशों के 566 केंद्रों पर 3,808 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। इन परीक्षणों में रोजाना मुंह से लेने वाली सेमाग्लूटाइड की अधिकतम 14 मिलीग्राम तक की खुराक का अध्ययन किया गया। 104 सप्ताह बाद, शुरुआती लक्षणों वाले अल्जाइमर रोगियों में सेमाग्लूटाइड ने प्लेसीबो की तुलना में संज्ञानात्मक या कार्यात्मक गिरावट को धीमा नहीं किया।
इन परिणामों से यह साबित नहीं होता कि अल्जाइमर में हर GLP-1 दवा अप्रभावी है। वे केवल यह दिखाते हैं कि जांची गई खुराक, अवधि और मरीजों के समूह में मुंह से दी गई सेमाग्लूटाइड से क्लिनिकल लाभ नहीं मिला। लिराग्लूटाइड और सेमाग्लूटाइड के अलग नतीजों के पीछे दवा के अणु की विशेषताएं, खुराक, शरीर में दवा का संपर्क, इंजेक्शन और गोली के रूप में मिलने का अंतर, उपचार का समय, बीमारी की अवस्था या मस्तिष्क के संबंधित हिस्सों तक पहुंचने वाली दवा की मात्रा जैसे कारण हो सकते हैं। ये अभी शोध की संभावनाएं हैं, परीक्षणों से सिद्ध निष्कर्ष नहीं।
MRI के सात साल पहले दिखने वाले संकेत और GLP-1 दवाओं के मिले-जुले नतीजे एक ही बड़ी चुनौती की ओर इशारा करते हैं: अल्जाइमर से जुड़ी जैविक प्रक्रिया चुपचाप शुरू हो सकती है, जबकि विश्वसनीय जांच और उपचार परीक्षण अक्सर काफी देर से शुरू होते हैं।
आगे के शोध में यह तय करना होगा कि शुरुआती संरचनात्मक बदलावों में से कौन-से अल्जाइमर के लिए विशिष्ट और भविष्यवाणी करने में सक्षम हैं। साथ ही, कम खर्च और कम असुविधा वाले बायोमार्कर विकसित करने, ओस्लो के निष्कर्षों को सहकर्मी-समीक्षित अध्ययनों में दोहराने और यह जांचने की जरूरत है कि ज्यादा प्लाक बनने से पहले उपचार शुरू करने पर संज्ञानात्मक क्षमता को बचाया जा सकता है या नहीं।
फिलहाल, सात साल पहले दिखने वाला MRI संकेत इस बात का प्रमाण है कि अल्जाइमर की दिखाई देने वाली समय-रेखा केवल अमाइलॉइड-PET से मिलने वाली जानकारी से पहले शुरू हो सकती है। यह अभी इस्तेमाल के लिए तैयार निदान या उपचार-पद्धति नहीं है।