इस व्यवस्था का उद्देश्य EU के भीतर उत्पादित सामान पर लागू कार्बन लागत और आयातित सामान की कार्बन लागत के बीच अंतर कम करना है। यदि निर्यातक देश में पहले ही कोई प्रमाणित कार्बन कीमत चुकाई जा चुकी है, तो उसे CBAM देनदारी में समायोजित किया जा सकता है। 2026 की पहली तिमाही के लिए प्रमाणपत्र की कीमत €75.36 और दूसरी तिमाही के लिए €75.28 प्रति टन कार्बन डाइऑक्साइड घोषित की गई।
स्टील और एल्युमीनियम सीधे CBAM के दायरे में आते हैं और इनका उत्पादन ऊर्जा तथा उत्सर्जन की दृष्टि से भारी होता है। इसलिए निर्यातकों को केवल अतिरिक्त कार्बन लागत ही नहीं, बल्कि उत्सर्जन की गणना, सत्यापन, दस्तावेजीकरण और EU के डिफॉल्ट उत्सर्जन मानों पर निर्भरता जैसी अनुपालन चुनौतियों का भी सामना करना पड़ सकता है।
भारत, दक्षिण अफ्रीका और चीन के ऐसे उत्पादक जो EU को कार्बन-गहन सामान निर्यात करते हैं, उनके लिए यह व्यवस्था विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। विश्व बैंक के हवाले से एक नीति आकलन में अनुमान लगाया गया है कि CBAM विकासशील देशों के लगभग 16 अरब डॉलर सालाना निर्यात को प्रभावित कर सकता है। यह आंकड़ा किसी एक देश या केवल भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के लिए अलग-अलग अनुमान नहीं है।
CBAM से 2030 में कितनी आय होगी, इस पर कोई एक भरोसेमंद आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग अध्ययनों में काफी भिन्न अनुमान दिए गए हैं—एक अनुमान के अनुसार 2028 से सालाना आय €1.5 अरब हो सकती है, जबकि दूसरे अनुमान में यह लगभग €2.1 अरब सालाना बताई गई है। मौजूदा दायरे और परिस्थितियों के आधार पर 2030 के लिए €5–9 अरब की सीमा का भी अनुमान दिया गया है।
स्पष्ट बात यह है कि CBAM से मिलने वाली राशि EU के बजट में जाने के लिए निर्धारित है। BRICS की राजनीतिक आपत्ति यह है कि विकासशील देशों के निर्यातकों से जुटाई गई राशि को EU के सामान्य बजट में शामिल करने के बजाय उन देशों के जलवायु अनुकूलन, उत्सर्जन घटाने और औद्योगिक बदलाव में लगाया जाना चाहिए।
CBAM का वित्तीय प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ेगा, क्योंकि EU की घरेलू कार्बन व्यवस्था के तहत उद्योगों को मिलने वाले मुफ्त भत्ते चरणबद्ध तरीके से हटाए जाएंगे। लागू CBAM कारक 2026 में 2.5%, 2027 में 5%, 2028 में 10%, 2029 में 22.5% और 2030 में 51.5% है। इसलिए 2030 की आय कार्बन कीमत, आयात मात्रा, सत्यापित उत्सर्जन और CBAM के दायरे में होने वाले संभावित बदलावों पर निर्भर करेगी।
राजनयिक विरोध अपने-आप में विश्व व्यापार संगठन (WTO) में मामला दाखिल नहीं करता। औपचारिक चुनौती के लिए किसी सदस्य देश को पहले परामर्श का अनुरोध करना होगा और विवाद न सुलझने पर पैनल की कार्यवाही शुरू की जा सकती है।
संभावित कानूनी विवाद इस बात पर केंद्रित हो सकता है कि CBAM व्यवहार में आयातित वस्तुओं या विदेशी उत्पादन प्रक्रियाओं के साथ भेदभाव करता है या नहीं। EU का संभावित बचाव यह होगा कि CBAM घरेलू उत्पादकों पर लागू कार्बन लागत की बराबरी करता है, विदेश में पहले चुकाई गई कार्बन कीमत का क्रेडिट देता है और पर्यावरणीय उद्देश्य पूरा करता है। ऐसे तर्क GATT के पर्यावरणीय अपवादों के संदर्भ में उठाए जा सकते हैं।
उपलब्ध सामग्री के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका ने शिकायत में रुचि का संकेत दिया है और भारत, चीन तथा ब्राज़ील ने CBAM से जुड़े कानूनी तथा समानता संबंधी सवाल उठाए हैं। लेकिन यह प्रमाणित नहीं है कि चीन ने CBAM के खिलाफ WTO में कोई विशिष्ट विवाद दाखिल कर दिया है।
EU के साथ व्यापार समझौते या बातचीत परामर्श, तकनीकी सहयोग और समायोजन के रास्ते खोल सकती हैं, लेकिन वे WTO चुनौती की संभावना को खत्म नहीं करतीं। प्रमाणों के आधार पर सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि जैसे-जैसे CBAM प्रमाणपत्रों की देनदारी बढ़ेगी, तनाव और कानूनी कार्रवाई का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि, BRICS की ओर से एक समन्वित WTO मामला अभी स्थापित तथ्य नहीं है।
विस्तारित BRICS में कच्चे माल, धातु और विनिर्माण क्षेत्र के कई बड़े निर्यातक शामिल हैं। इसी वजह से CBAM पर उसका विरोध केवल पर्यावरण नीति का मुद्दा नहीं, बल्कि जलवायु वित्त, व्यापार नियमों और विकासशील देशों के औद्योगिक भविष्य से जुड़ा राजनीतिक विवाद भी बन गया है। उपलब्ध स्रोतों में BRICS के वैश्विक व्यापार में हिस्से का कोई पर्याप्त रूप से सत्यापित सटीक प्रतिशत नहीं दिया गया है; इसलिए किसी निश्चित आंकड़े को स्थापित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।