कार्यक्रम का ध्यान सर्दियों की शाम और रात में होने वाली उड़ानों पर रहेगा, क्योंकि इस समय कॉन्ट्रेल से बचने का संभावित जलवायु लाभ अधिक माना जाता है। मॉडल तीन प्रमुख तरह की जानकारी को मिलाएंगे:
इनसे उन तथाकथित “ice-supersaturated” क्षेत्रों की पहचान करने की कोशिश होगी, जहां विमान के गुजरने पर लंबे समय तक टिकने वाले कॉन्ट्रेल बनने की संभावना अधिक रहती है। इसके बाद NATS—ब्रिटेन की एयर-ट्रैफिक नेविगेशन सेवा—के कंट्रोलर चुनिंदा विमानों को लगभग 2,000 फीट तक ऊपर या नीचे उड़ने का विकल्प दे सकते हैं। उद्देश्य सभी विमानों को मोड़ना नहीं, बल्कि केवल उन कुछ उड़ानों पर ध्यान देना है जिनसे अपेक्षाकृत बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।
ऊंचाई बदलने से विमान को अतिरिक्त ईंधन जलाना पड़ सकता है और इससे CO2 उत्सर्जन बढ़ सकता है। इसलिए यह परीक्षण पहले से यह मानकर नहीं चल रहा कि हर ऊंचाई-परिवर्तन जलवायु के लिए फायदेमंद होगा। इसका मुख्य उद्देश्य पूरे हिसाब-किताब को मापना है:
दूसरे शब्दों में, यह अभी इस बात का प्रमाण नहीं है कि ऐसी उड़ान-संबंधी कार्रवाइयां कुल मिलाकर जलवायु लाभ देती हैं। यही इस प्रयोग का केंद्रीय प्रश्न है।
ब्रिटेन के Department for Transport का समर्थन Aerospace Technology Institute Programme के जरिए है। इस कंसोर्टियम में Google, NATS, Contrails.org, Imperial College London, University of Cambridge और Met Office शामिल हैं। Met Office, Contrails.org के सबकॉन्ट्रैक्टर के रूप में काम कर रहा है।
Google और Contrails.org पहले ऐसे उपकरण विकसित कर चुके हैं जो सैटेलाइट से पहचाने गए कॉन्ट्रेल को अलग-अलग उड़ानों से जोड़ते हैं और कॉन्ट्रेल का पूर्वानुमान देते हैं। कुछ एयरलाइनों के शुरुआती प्रदर्शनों में उड़ान-योजना या ऊंचाई में तात्कालिक बदलावों को भी परखा गया है। Blue Skies की खासियत यह होगी कि यह व्यक्तिगत एयरलाइन प्रयोगों से आगे बढ़कर व्यस्त महासागरीय हवाई गलियारे में कंट्रोलर-निर्देशित संचालन का परीक्षण करेगा।
सैटेलाइट तस्वीरों और उड़ान डेटा से यह जांचा जाएगा कि पूर्वानुमानित कॉन्ट्रेल क्षेत्र और दिए गए बचाव-निर्देश वास्तविक परिणामों से मेल खाते हैं या नहीं। विश्वविद्यालयों के शोधकर्ता स्वतंत्र वैज्ञानिक समीक्षा देंगे। कार्यक्रम के अनुसार इसकी विधियों और परिणामों को प्रकाशित करने का इरादा है।
पारदर्शिता महत्वपूर्ण है, क्योंकि कॉन्ट्रेल का पूर्वानुमान, जलवायु प्रभाव मापने के तरीके और अतिरिक्त ईंधन की कीमत—तीनों में अभी वैज्ञानिक और संचालन संबंधी अनिश्चितताएं हैं।
अगर परीक्षण सफल और स्वतंत्र रूप से सत्यापित होता है, तो यह विमानन के गैर-CO2 जलवायु प्रभाव के एक हिस्से को कम करने का अपेक्षाकृत निकट-अवधि वाला तरीका दे सकता है। इसके लिए पूरे विमान बेड़े को बदलने या नए ईंधन के व्यापक इस्तेमाल का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
लेकिन यह CO2 उत्सर्जन घटाने का विकल्प नहीं है। कॉन्ट्रेल से बचने के लिए किए गए बदलावों में भी ईंधन जल सकता है, और ऐसी रणनीति सभी कॉन्ट्रेल या विमानन के सभी जलवायु प्रभावों को खत्म नहीं कर सकती।
इस परियोजना के साथ एक वास्तविक लेखांकन संबंधी सवाल भी जुड़ा है, हालांकि इसे सीधा विरोधाभास कहना जल्दबाजी होगी। Google के अनुसार, AI की बढ़ती मांग के बीच उसके डेटा सेंटरों की बिजली खपत 2024 में 27% बढ़ी, जबकि स्वच्छ ऊर्जा खरीद और दक्षता उपायों के कारण डेटा सेंटरों से संबंधित ऊर्जा उत्सर्जन 12% घटा।
कॉन्ट्रेल से बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाली AI प्रणाली का संभावित जलवायु लाभ उसके पूर्वानुमान चलाने में लगने वाली बिजली से कहीं बड़ा हो सकता है। लेकिन पारदर्शी, शुरुआत से अंत तक के जीवन-चक्र आकलन के बिना यह अभी सार्वजनिक रूप से साबित नहीं हुआ है।
विश्वसनीय निष्कर्ष के लिए कार्यक्रम को कम-से-कम इन आंकड़ों को प्रकाशित करना होगा: मॉडल चलाने में लगी ऊर्जा और उससे जुड़े सीमांत उत्सर्जन, वास्तविक ईंधन बदलाव, कॉन्ट्रेल में वास्तविक कमी, इस्तेमाल किया गया जलवायु मापदंड और समय-सीमा, गलत चेतावनियों तथा छूटे हुए कॉन्ट्रेल का अनुपात, और स्वतंत्र मूल्यांकन। तब तक ऑपरेशन ब्लू स्काईज़ का जलवायु लाभ एक promising संभावना है—सिद्ध तथ्य नहीं।