ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर ऐसे प्रोटीन हैं जो DNA के छोटे-छोटे अनुक्रमों को पहचानकर जीन की गतिविधि को नियंत्रित करते हैं। इन छोटे अनुक्रमों को मोटिफ कहा जाता है। मानव ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर की बड़ी संख्या के लिए अब तक प्रयोगों से यह स्पष्ट नहीं था कि वे DNA के किन अनुक्रमों को पहचानते हैं।
Codebook Consortium ने पांच प्रयोगात्मक प्लेटफॉर्म और कंप्यूटेशनल विश्लेषण को मिलाकर 332 संभावित या कम-विशेषता वाले मानव ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर पर 4,800 से अधिक प्रयोग किए। शोधकर्ताओं ने 177 फैक्टर, यानी 53 प्रतिशत, के DNA-बाइंडिंग मोटिफ पहचाने। इससे मानव जीन नियंत्रण में ज्ञात अनुक्रम-विविधता में लगभग 130 अलग-अलग मोटिफ जुड़ गए।
प्रयोगशाला में पहचाने गए ये मोटिफ कोशिकाओं में देखे गए ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर बाइंडिंग साइटों पर बड़ी संख्या में मौजूद मिले। इसके आधार पर शोधकर्ताओं ने मानव जीनोम में पहले से अनपहचानी, संरक्षित और सीधे जुड़ी हुई हजारों—बल्कि दसियों हजार—बाइंडिंग साइटों का पता लगाया। इनमें से कई जीन के प्रमोटर क्षेत्रों में केंद्रित थीं। इस जानकारी से ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर की बाइंडिंग और जीन-अभिव्यक्ति के बीच संबंध समझने की क्षमता भी बेहतर हुई।
नए संसाधन के साथ अब लगभग 1,421 मानव ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर के DNA-बाइंडिंग मोटिफ की जानकारी उपलब्ध है, जबकि ऐसे फैक्टर की अनुमानित कुल संख्या करीब 1,600 है। यह जीन नियंत्रण की पूरी व्याख्या नहीं है, लेकिन यह एक बड़ी कमी दूर करता है: कौन-सा प्रोटीन DNA के किस अनुक्रम को पहचान सकता है।
सिर्फ मोटिफ का नक्शा यह नहीं बता सकता कि DNA का कोई आधार रासायनिक रूप से बदलने पर ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर की बाइंडिंग कैसी रहेगी। इसी सवाल पर Deplancke की टीम ने meSMiLE-seq विकसित किया। इसका पूरा नाम methylation-sensitive selective microfluidics-based ligand enrichment followed by sequencing है।
यह माइक्रोफ्लूडिक विधि एक ही तरह के मिथाइलेटेड और बिना मिथाइलेशन वाले DNA अनुक्रमों से ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर की बाइंडिंग की तुलना करती है। इससे शोधकर्ता किसी फैक्टर की सामान्य अनुक्रम-पसंद के साथ-साथ उसकी मिथाइलेशन-संवेदनशीलता का मॉडल भी बना सकते हैं।
डेटासेट के अनुसार, 23 प्रयोगों में 114 मानव ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर की जांच की गई और 48 के लिए बाइंडिंग मॉडल तैयार हुए। इनमें 13 फैक्टर मिथाइलेटेड DNA से कम जुड़ने की प्रवृत्ति दिखाते हैं। 11 फैक्टर में मिथाइलेटेड DNA के प्रति पसंद या ऐसा वैकल्पिक बाइंडिंग स्थल मिला जिसमें मिथाइलेशन शामिल था। बाकी फैक्टर की बाइंडिंग पर इस परीक्षण की परिस्थितियों में DNA मिथाइलेशन का असर नहीं दिखा।
कुछ सारांश इस बढ़ी हुई या बदली हुई बाइंडिंग वाले समूह की संख्या 14 बताते हैं, लेकिन उद्धृत डेटासेट के एब्स्ट्रैक्ट में संख्या 11 दी गई है। इसलिए सावधानीपूर्ण निष्कर्ष यही है कि मिथाइलेशन-निर्भर प्रभाव कुछ फैक्टर में देखे गए—13 में बाइंडिंग घटी और 11 में बाइंडिंग बढ़ी या उसकी पसंद बदली।
DNA मिथाइलेशन को अक्सर जीन गतिविधि दबाने वाले संकेत के रूप में सरल तरीके से समझाया जाता है। नए परिणाम बताते हैं कि यह तस्वीर अधूरी है। मिथाइलेशन किसी फैक्टर के मोटिफ को पहचानने में बाधा डाल सकता है, लेकिन कुछ मामलों में यह अधिक पसंदीदा रासायनिक संदर्भ बना सकता है या फैक्टर को किसी दूसरे अनुक्रम से जुड़ने के लिए प्रेरित कर सकता है। प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि कौन-सा ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर और कौन-सा DNA अनुक्रम मौजूद है।
यही बात समझाने में मदद करती है कि एक ही जीनोम वाली अलग-अलग कोशिकाएं अलग नियामक कार्यक्रम कैसे चला पाती हैं। विभिन्न कोशिका प्रकारों में मौजूद ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर अलग हो सकते हैं और DNA मिथाइलेशन का स्थान भी अलग हो सकता है। इसलिए एक ही DNA अनुक्रम एक कोशिका में अनदेखा रह सकता है, दूसरी में किसी अलग फैक्टर को आकर्षित कर सकता है या मिथाइलेशन बदलने पर उसी फैक्टर से अलग ताकत के साथ जुड़ सकता है।
इस तरह दोनों अध्ययन जीन नियंत्रण की दो परतों को जोड़ते हैं: DNA के अक्षरों में दर्ज अनुक्रम कोड और उन अक्षरों को पढ़ने का तरीका बदलने वाली एपिजेनेटिक अवस्था।
विस्तृत मोटिफ-संग्रह से उन आनुवंशिक बदलावों का विश्लेषण बेहतर हो सकता है जो प्रोटीन बनाने वाले हिस्सों के बाहर, यानी गैर-कोडिंग DNA में होते हैं। ऐसा बदलाव किसी मौजूदा ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर मोटिफ को नष्ट कर सकता है या नया मोटिफ बना सकता है। इसके बाद मिथाइलेशन यह तय करने में भूमिका निभा सकता है कि किसी खास कोशिका प्रकार में वह बदली हुई साइट वास्तव में पहचानी जाएगी या नहीं।
यह संसाधन विकास, उम्र बढ़ने और कैंसर में शामिल नियामक बदलावों के अध्ययन के लिए उपयोगी हो सकता है। हालांकि अभी इसका मुख्य महत्व एक बुनियादी शोध-संदर्भ के रूप में है, न कि क्लिनिकल डायग्नोस्टिक टेस्ट के रूप में। बाइंडिंग मॉडल आगे के प्रयोगों और परिणामों की व्याख्या के लिए मजबूत आधार देते हैं, लेकिन वास्तविक जैविक प्रभाव कोशिका के संदर्भ पर निर्भर होंगे और संबंधित प्रणालियों में उनकी पुष्टि करनी होगी।
Codebook परियोजना में उत्तर अमेरिका, यूरोप और रूस की दो दर्जन से अधिक संस्थाओं का अंतरराष्ट्रीय सहयोग शामिल था। इसकी अहमियत केवल बड़ी संख्या में ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर की जांच में नहीं है, बल्कि अलग-अलग प्रयोगात्मक विधियों, कंप्यूटेशनल विश्लेषण और कोशिकीय सत्यापन को साथ लाने में भी है।
दोनों अध्ययन दिखाते हैं कि जीन नियंत्रण को एक ऐसी स्थिर शब्दावली के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है जिसमें हर मोटिफ का हमेशा एक ही अर्थ हो। मानव कोशिकाएं DNA अनुक्रम को रासायनिक बदलावों, उपलब्ध ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर और आसपास के कोशिकीय वातावरण के साथ पढ़ती हैं। Codebook इस अनुक्रम-व शब्दावली को दर्ज करना शुरू करता है, जबकि meSMiLE-seq दिखाता है कि मिथाइलेशन उस शब्दावली को पढ़ने का तरीका कैसे बदल सकता है।
ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर ऐसे प्रोटीन हैं जो DNA के छोटे-छोटे अनुक्रमों को पहचानकर जीन की गतिविधि को नियंत्रित करते हैं। इन छोटे अनुक्रमों को मोटिफ कहा जाता है। मानव ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर की बड़ी संख्या के लिए अब तक प्रयोगों से यह स्पष्ट नहीं था कि वे DNA के किन अनुक्रमों को पहचानते हैं।
Codebook Consortium ने पांच प्रयोगात्मक प्लेटफॉर्म और कंप्यूटेशनल विश्लेषण को मिलाकर 332 संभावित या कम-विशेषता वाले मानव ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर पर 4,800 से अधिक प्रयोग किए। शोधकर्ताओं ने 177 फैक्टर, यानी 53 प्रतिशत, के DNA-बाइंडिंग मोटिफ पहचाने। इससे मानव जीन नियंत्रण में ज्ञात अनुक्रम-विविधता में लगभग 130 अलग-अलग मोटिफ जुड़ गए।
प्रयोगशाला में पहचाने गए ये मोटिफ कोशिकाओं में देखे गए ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर बाइंडिंग साइटों पर बड़ी संख्या में मौजूद मिले। इसके आधार पर शोधकर्ताओं ने मानव जीनोम में पहले से अनपहचानी, संरक्षित और सीधे जुड़ी हुई हजारों—बल्कि दसियों हजार—बाइंडिंग साइटों का पता लगाया। इनमें से कई जीन के प्रमोटर क्षेत्रों में केंद्रित थीं। इस जानकारी से ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर की बाइंडिंग और जीन-अभिव्यक्ति के बीच संबंध समझने की क्षमता भी बेहतर हुई।
नए संसाधन के साथ अब लगभग 1,421 मानव ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर के DNA-बाइंडिंग मोटिफ की जानकारी उपलब्ध है, जबकि ऐसे फैक्टर की अनुमानित कुल संख्या करीब 1,600 है। यह जीन नियंत्रण की पूरी व्याख्या नहीं है, लेकिन यह एक बड़ी कमी दूर करता है: कौन-सा प्रोटीन DNA के किस अनुक्रम को पहचान सकता है।
सिर्फ मोटिफ का नक्शा यह नहीं बता सकता कि DNA का कोई आधार रासायनिक रूप से बदलने पर ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर की बाइंडिंग कैसी रहेगी। इसी सवाल पर Deplancke की टीम ने meSMiLE-seq विकसित किया। इसका पूरा नाम methylation-sensitive selective microfluidics-based ligand enrichment followed by sequencing है।
यह माइक्रोफ्लूडिक विधि एक ही तरह के मिथाइलेटेड और बिना मिथाइलेशन वाले DNA अनुक्रमों से ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर की बाइंडिंग की तुलना करती है। इससे शोधकर्ता किसी फैक्टर की सामान्य अनुक्रम-पसंद के साथ-साथ उसकी मिथाइलेशन-संवेदनशीलता का मॉडल भी बना सकते हैं।
डेटासेट के अनुसार, 23 प्रयोगों में 114 मानव ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर की जांच की गई और 48 के लिए बाइंडिंग मॉडल तैयार हुए। इनमें 13 फैक्टर मिथाइलेटेड DNA से कम जुड़ने की प्रवृत्ति दिखाते हैं। 11 फैक्टर में मिथाइलेटेड DNA के प्रति पसंद या ऐसा वैकल्पिक बाइंडिंग स्थल मिला जिसमें मिथाइलेशन शामिल था। बाकी फैक्टर की बाइंडिंग पर इस परीक्षण की परिस्थितियों में DNA मिथाइलेशन का असर नहीं दिखा।
कुछ सारांश इस बढ़ी हुई या बदली हुई बाइंडिंग वाले समूह की संख्या 14 बताते हैं, लेकिन उद्धृत डेटासेट के एब्स्ट्रैक्ट में संख्या 11 दी गई है। इसलिए सावधानीपूर्ण निष्कर्ष यही है कि मिथाइलेशन-निर्भर प्रभाव कुछ फैक्टर में देखे गए—13 में बाइंडिंग घटी और 11 में बाइंडिंग बढ़ी या उसकी पसंद बदली।
DNA मिथाइलेशन को अक्सर जीन गतिविधि दबाने वाले संकेत के रूप में सरल तरीके से समझाया जाता है। नए परिणाम बताते हैं कि यह तस्वीर अधूरी है। मिथाइलेशन किसी फैक्टर के मोटिफ को पहचानने में बाधा डाल सकता है, लेकिन कुछ मामलों में यह अधिक पसंदीदा रासायनिक संदर्भ बना सकता है या फैक्टर को किसी दूसरे अनुक्रम से जुड़ने के लिए प्रेरित कर सकता है। प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि कौन-सा ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर और कौन-सा DNA अनुक्रम मौजूद है।
यही बात समझाने में मदद करती है कि एक ही जीनोम वाली अलग-अलग कोशिकाएं अलग नियामक कार्यक्रम कैसे चला पाती हैं। विभिन्न कोशिका प्रकारों में मौजूद ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर अलग हो सकते हैं और DNA मिथाइलेशन का स्थान भी अलग हो सकता है। इसलिए एक ही DNA अनुक्रम एक कोशिका में अनदेखा रह सकता है, दूसरी में किसी अलग फैक्टर को आकर्षित कर सकता है या मिथाइलेशन बदलने पर उसी फैक्टर से अलग ताकत के साथ जुड़ सकता है।
इस तरह दोनों अध्ययन जीन नियंत्रण की दो परतों को जोड़ते हैं: DNA के अक्षरों में दर्ज अनुक्रम कोड और उन अक्षरों को पढ़ने का तरीका बदलने वाली एपिजेनेटिक अवस्था।
विस्तृत मोटिफ-संग्रह से उन आनुवंशिक बदलावों का विश्लेषण बेहतर हो सकता है जो प्रोटीन बनाने वाले हिस्सों के बाहर, यानी गैर-कोडिंग DNA में होते हैं। ऐसा बदलाव किसी मौजूदा ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर मोटिफ को नष्ट कर सकता है या नया मोटिफ बना सकता है। इसके बाद मिथाइलेशन यह तय करने में भूमिका निभा सकता है कि किसी खास कोशिका प्रकार में वह बदली हुई साइट वास्तव में पहचानी जाएगी या नहीं।
यह संसाधन विकास, उम्र बढ़ने और कैंसर में शामिल नियामक बदलावों के अध्ययन के लिए उपयोगी हो सकता है। हालांकि अभी इसका मुख्य महत्व एक बुनियादी शोध-संदर्भ के रूप में है, न कि क्लिनिकल डायग्नोस्टिक टेस्ट के रूप में। बाइंडिंग मॉडल आगे के प्रयोगों और परिणामों की व्याख्या के लिए मजबूत आधार देते हैं, लेकिन वास्तविक जैविक प्रभाव कोशिका के संदर्भ पर निर्भर होंगे और संबंधित प्रणालियों में उनकी पुष्टि करनी होगी।
Codebook परियोजना में उत्तर अमेरिका, यूरोप और रूस की दो दर्जन से अधिक संस्थाओं का अंतरराष्ट्रीय सहयोग शामिल था। इसकी अहमियत केवल बड़ी संख्या में ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर की जांच में नहीं है, बल्कि अलग-अलग प्रयोगात्मक विधियों, कंप्यूटेशनल विश्लेषण और कोशिकीय सत्यापन को साथ लाने में भी है।
दोनों अध्ययन दिखाते हैं कि जीन नियंत्रण को एक ऐसी स्थिर शब्दावली के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है जिसमें हर मोटिफ का हमेशा एक ही अर्थ हो। मानव कोशिकाएं DNA अनुक्रम को रासायनिक बदलावों, उपलब्ध ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर और आसपास के कोशिकीय वातावरण के साथ पढ़ती हैं। Codebook इस अनुक्रम-व शब्दावली को दर्ज करना शुरू करता है, जबकि meSMiLE-seq दिखाता है कि मिथाइलेशन उस शब्दावली को पढ़ने का तरीका कैसे बदल सकता है।