यह कदम एक तरह की कूटनीतिक जवाबी कार्रवाई था। पुतिन के दौरे के बाद जापान पहले ही रूस के राजदूत को तलब कर चुका था। जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने यात्रा को “बिल्कुल अस्वीकार्य” बताते हुए कहा था कि इससे जापानी जनता की भावनाएं आहत हुई हैं। टोक्यो ने मॉस्को पर नए प्रतिबंध लगाने की संभावना पर भी विचार किया।
रूस के उप विदेश मंत्री मिखाइल गालुज़िन ने मुटो के सामने औपचारिक और कड़ा विरोध दर्ज कराया। रूसी विदेश मंत्रालय के अनुसार, उन्होंने दोहराया कि दक्षिणी कुरील द्वीपों पर रूस की संप्रभुता और अधिकार-क्षेत्र अडिग हैं। मॉस्को का कहना है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ये द्वीप रूस को मिले थे और इस स्थिति को चुनौती देना स्वीकार्य नहीं है।
रूस ने इस विरोध को जापान की व्यापक विदेश नीति से भी जोड़ा। मॉस्को ने जापान के रूस-विरोधी प्रतिबंधों और यूक्रेन को उसके राजनीतिक व भौतिक समर्थन का उल्लेख करते हुए कहा कि अगर टोक्यो अपनी ‘अमित्रतापूर्ण’ नीति जारी रखता है, तो रूस उचित जवाबी कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रखता है। उपलब्ध रिपोर्टों में किसी नए तत्काल प्रतिरोधी कदम का स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया।
मुटो ने रूस के पहले समन पर तुरंत विदेश मंत्रालय में उपस्थित नहीं हुए। रूसी अधिकारियों के अनुसार, उन्हें बताया गया कि राजदूत या तो मॉस्को से बाहर हैं या अस्वस्थ हैं। बाद की रिपोर्टों में उनके पहुंचने में अतिरिक्त देरी का जिक्र आया। हालांकि देरी की सही अवधि और वजह को लेकर रिपोर्टों में अंतर है—एक विवरण में दो दिन की देरी बताई गई, जबकि दूसरे में पहले मॉस्को से बाहर होने और बाद में खराब स्वास्थ्य का हवाला दिया गया।
मुटो अंततः बैठक में पहुंचे और कहा कि उन्होंने रूसी पक्ष को टोक्यो का रुख उचित तरीके से समझाया। इसके बावजूद, रूसी अधिकारियों ने उनकी देरी को मॉस्को की स्थिति स्वीकार न करने और राजनयिक असहमति के एक और संकेत के रूप में पेश किया।
टोक्यो की प्रतिक्रिया बेहद कड़ी रही। प्रधानमंत्री ताकाइची ने पुतिन की यात्रा को अस्वीकार्य बताया, जबकि विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी ने रूस के खिलाफ मजबूत विरोध दर्ज कराया और उसके राजदूत को तलब किया। जापान ने फिर कहा कि इतुरुप या एतोरुफू, कुनाशिर या कुनाशिरी, शिकोटान और हबोमाई द्वीप उसके ‘उत्तरी क्षेत्र’ हैं।
जापान ने पुतिन की यात्रा के बाद रूस पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने पर भी विचार किया। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यूक्रेन को जापान का समर्थन और मॉस्को पर उसके प्रतिबंध रूस की पहले से बताई जा रही शिकायतों का हिस्सा हैं। इस कारण द्वीपों का विवाद अब व्यापक रूस-जापान टकराव से अलग नहीं रह गया है।
अमेरिका ने भी जापान के रुख का समर्थन किया। वॉशिंगटन ने विवादित उत्तरी क्षेत्रों पर जापानी संप्रभुता की अपनी मान्यता दोहराई और कहा कि जापान के लिए उसका समर्थन अडिग है।
दक्षिणी कुरील श्रृंखला के चार द्वीप रूस के नियंत्रण में हैं, लेकिन जापान उन पर अपना दावा करता है। सोवियत सेनाओं ने द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों में इन द्वीपों पर कब्जा किया था। इसके बाद से दोनों देशों के बीच इनके दर्जे को लेकर विवाद जारी है। जापान का विदेश मंत्रालय हबोमाई, शिकोटान, कुनाशिरी और एतोरुफू को ‘उत्तरी क्षेत्र’ कहता है और इन्हें कुरील द्वीपों का हिस्सा नहीं मानता।
यही विवाद रूस और जापान के बीच औपचारिक युद्धोत्तर शांति संधि के रास्ते में भी बड़ी बाधा रहा है। जापान ने द्वीपों के दर्जे का समाधान शांति संधि के लिए जरूरी शर्त के रूप में रखा है। इसलिए पुतिन जैसे रूसी शीर्ष नेता की यात्रा केवल एक सामान्य सरकारी दौरा नहीं मानी जाती; टोक्यो इसे अपने क्षेत्रीय दावे के खिलाफ राजनीतिक संदेश समझता है, जबकि मॉस्को इसे अपने क्षेत्र में संप्रभु गतिविधि मानता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यह क्षेत्रीय विवाद दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक टकराव में शामिल हो गया है। जापान ने रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं और यूक्रेन को समर्थन दिया है। इसके परिणामस्वरूप द्वीपों पर बातचीत की गुंजाइश पहले से कम हुई है। मॉस्को का सार्वजनिक संदेश है कि इतुरुप पर उसका प्रशासन तय और स्थायी है, जबकि टोक्यो इसे अब भी अपने संप्रभुता संबंधी मूल मुद्दों में गिनता है।
सीधी बात यह है कि रूस ने अकीरा मुटो को इसलिए तलब किया क्योंकि जापान ने पुतिन की यात्रा की वैधता पर सवाल उठाया और इस तरह इतुरुप पर रूस के अधिकार को चुनौती दी। गालुज़िन ने जवाब में दक्षिणी कुरील द्वीपों पर रूस की “अडिग” संप्रभुता दोहराई और आगे जवाबी कदमों की चेतावनी दी। राजदूत की देरी, जापान और अमेरिका का विरोधी रुख, संभावित नए प्रतिबंध और लंबित शांति संधि—इन सबने दशकों पुराने विवाद को एक बार फिर गंभीर कूटनीतिक टकराव में बदल दिया है।