आकाशगंगा का warp उसके डिस्क का बड़े पैमाने का झुकाव है। बाहरी हिस्से आकाशगंगा के केंद्रीय तल से ऊपर या नीचे मुड़ जाते हैं। लेकिन शोधकर्ताओं के अनुसार, केवल इस व्यापक मोड़ से आणविक बादलों की वास्तविक स्थिति पूरी तरह समझ में नहीं आती।
टीम ने Milky Way Imaging Scroll Painting (MWISP) सर्वेक्षण से तैयार 30,000 से अधिक आणविक बादलों की त्रि-आयामी सूची का अध्ययन किया। यह सर्वेक्षण पर्पल माउंटेन ऑब्जर्वेटरी के 13.7 मीटर मिलिमीटर-वेव टेलीस्कोप से उत्तरी गैलेक्टिक प्लेन में किया गया था। इसमें कार्बन मोनोऑक्साइड के विभिन्न स्पेक्ट्रल संकेत दर्ज किए गए।
पहले वैज्ञानिकों ने आणविक गैस-डिस्क के बड़े पैमाने वाले warp का मॉडल बनाया। इसके बाद उन्होंने यह देखा कि उस चिकने मोड़ को हटाने पर बादल अपने अनुमानित गैलेक्टिक तल से कितने ऊपर या नीचे रह जाते हैं।
बचे हुए आंकड़ों में अलग-अलग, बेतरतीब विचलन नहीं दिखे। इसके बजाय उनमें जुड़ी हुई, लहरों जैसी संरचनाएं नजर आईं। इसका अर्थ है कि मिल्की वे का बाहरी आणविक डिस्क एक बड़े warp के साथ-साथ अतिरिक्त ऊर्ध्वाधर तरंगों से भी बना है।
ठंडे आणविक बादलों को दृश्य प्रकाश में देखना मुश्किल होता है, क्योंकि आकाशगंगा के डिस्क में मौजूद धूल उनके प्रकाश को रोक देती है। कार्बन मोनोऑक्साइड, या CO, ऐसे ठंडे आणविक गैस का उपयोगी संकेतक है। इसकी स्पेक्ट्रल-लाइन से उन बादलों का पता लगाया जा सकता है जिन वातावरणों में नए तारों के बनने की प्रक्रिया चलती है।
MWISP सर्वेक्षण में पर्पल माउंटेन ऑब्जर्वेटरी के टेलीस्कोप से ^12CO, ^13CO और C^18O की J=1–0 स्पेक्ट्रल लाइनों का एक साथ अवलोकन किया गया। इन लाइनों में वेग की जानकारी भी छिपी होती है। बादलों की आकाशीय स्थिति और इस वेग-संबंधी जानकारी को मिलाकर वैज्ञानिकों ने उनका अनुमानित त्रि-आयामी वितरण तैयार किया और यह मापा कि वे मॉडल किए गए गैलेक्टिक तल से कितने ऊपर या नीचे हैं।
30,000 से अधिक बादलों का बड़ा नमूना इस अध्ययन की अहम ताकत था। इतने व्यापक आंकड़ों के कारण शोधकर्ता किसी एक बादल की अनियमित स्थिति और दूर तक फैली, व्यवस्थित संरचना के बीच अंतर कर सके।
अगर हर ऊर्ध्वाधर विस्थापन को आकाशगंगा के warp का ही हिस्सा मान लिया जाता, तो छोटी लेकिन व्यापक तरंगें छिपी रह सकती थीं। इसलिए टीम ने पहले बड़े, सहज मोड़ का मॉडल बनाया और फिर उस मॉडल से बचे हुए विचलनों का अध्ययन किया।
इस प्रक्रिया से पता चला कि केवल warp पर्याप्त व्याख्या नहीं देता। उसके बाद बची हुई ऊंच-नीच व्यवस्थित थी और वह बड़ी लहरों या corrugations जैसी दिखी। इसलिए यह खोज सिर्फ warp का अधिक सटीक मापन नहीं है; यह मिल्की वे के बाहरी हिस्से की संरचना की पूरी तस्वीर को जटिल बनाती है।
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि ये corrugations बाहरी गुरुत्वीय घटनाओं से पैदा हुई bending waves हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, किसी उपग्रह या बौनी आकाशगंगा के मिल्की वे के पास से गुजरने पर उसका गुरुत्वीय प्रभाव बाहरी गैस-डिस्क में तरंगें पैदा कर सकता है।
ऐसी तरंगें आकाशगंगा के अतीत में हुए गुरुत्वीय संपर्कों की छाप अपने भीतर संजोए हो सकती हैं। हालांकि, उपलब्ध साक्ष्य किसी एक खास उपग्रह आकाशगंगा को इन लहरों का निश्चित स्रोत नहीं बताते। फिलहाल यह एक संभावित व्याख्या है, प्रमाणित पहचान नहीं।
यह खोज मिल्की वे की त्रि-आयामी बनावट को समझने का नया रास्ता खोलती है। बाहरी डिस्क को अब केवल एक बड़े मोड़ वाली अपेक्षाकृत स्थिर सतह के रूप में नहीं देखा जा सकता। खगोलविद यह जांच सकेंगे कि बड़े पैमाने का warp और उसके ऊपर बनी छोटी-बड़ी तरंगें तारों को जन्म देने वाली गैस में एक साथ कैसे मौजूद रहती हैं।
इन संरचनाओं का आकार, फैलाव और आपसी सामंजस्य आकाशगंगा के गुरुत्वीय संपर्कों और डिस्क के झुकने से जुड़े मॉडलों से मिलाया जा सकता है। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि अतीत में मिल्की वे किन घटनाओं से प्रभावित हुई और वे प्रभाव उसके बाहरी हिस्से में कैसे फैले।
फिलहाल मुख्य निष्कर्ष इतना स्पष्ट है: मिल्की वे के बाहरी आणविक गैस-डिस्क में बड़े पैमाने का warp ही नहीं, बल्कि उसके ऊपर फैली हुई ऊर्ध्वाधर लहरें भी हैं। इन तरंगों को बनाने वाली सटीक प्रक्रिया जानने के लिए आगे के मॉडल और नए अवलोकन जरूरी होंगे।