अब दोनों पक्षों के पास कथित उल्लंघनों को संभालने या किसी घटना को बड़े सैन्य टकराव में बदलने से रोकने के लिए साझा प्रक्रिया नहीं है। पहले सामने आए प्रस्तावों से भी उनके मतभेद स्पष्ट थे। ईरान कुछ विशेष मार्गों पर नियंत्रण या प्रभाव चाहता था, जबकि अमेरिका ने ऐसे किसी भी प्रबंध को खारिज किया जिसमें जहाज़ों के आवागमन के लिए मंज़ूरी, शुल्क या अन्य बाधाएं हों।
ओमान की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में बेहद संवेदनशील हो गई है। तेहरान ओमान के साथ जहाज़ों की आवाजाही के लिए अस्थायी व्यवस्था पर चर्चा कर रहा था, लेकिन ट्रंप ने यह भी धमकी दी कि अगर ओमान जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिकी प्रयासों में बाधा डालेगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। यह धमकी सैन्य कार्रवाई में बदले या नहीं, इससे वह क्षेत्रीय संचार-चैनल कमजोर पड़ सकता है जो तनाव घटाने में मदद कर सकता था।
युद्धविराम की समयसीमा से पहले ही समुद्री जोखिम दिखाई देने लगे थे। ब्रिटेन की यूके मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस एजेंसी के अनुसार, जलडमरूमध्य से बाहर निकलते समय एक मालवाहक जहाज़ पर अज्ञात प्रक्षेप्य से हमला हुआ। इससे जहाज़ के इंजन कक्ष को नुकसान पहुंचा और चालक दल का एक सदस्य घायल हुआ।
आवाजाही भी तेज़ी से घट गई। रिपोर्टों में उद्धृत Kpler के आंकड़ों के मुताबिक, एक हालिया शनिवार को होर्मुज़ से केवल पाँच जहाज़ गुज़रे, जबकि पिछले सप्ताहांत यह संख्या 31 थी। यह संचालन में गंभीर व्यवधान का संकेत है, हालांकि उपलब्ध प्रमाण यह साबित नहीं करते कि जलडमरूमध्य आधिकारिक रूप से और पूरी तरह बंद घोषित किया गया था।
जहाज़ मालिकों और माल ढुलाई कंपनियों के लिए सबसे बड़ी समस्या अनिश्चितता है। जहाज़ों को हमले, रोक-तलाशी, देरी, मार्ग बदलने या सुरक्षा आश्वासन मिलने तक इंतज़ार जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। बीमा कंपनियों और कारोबारियों को युद्ध-जोखिम बीमा की बढ़ती लागत तथा अस्थायी रोक के लंबे व्यवधान में बदलने की संभावना का भी हिसाब रखना होगा।
टैंकरों पर हमलों, रुकी हुई कूटनीति और होर्मुज़ में सीमित जहाज़ी आवाजाही के कारण कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ा। 14 अगस्त को ब्रेंट वायदा 88.52 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। इसके बाद की बाज़ार रिपोर्टों में कीमतों के 89 डॉलर के आसपास या उससे ऊपर कारोबार करने की बात कही गई, क्योंकि नाकेबंदी और शिपिंग व्यवधान की आशंका बनी रही।
रॉयटर्स ने 18 अगस्त को बताया कि तेल बाज़ार इस तरह व्यवहार करने लगा है मानो मध्य-पूर्व से आपूर्ति में व्यवधान कुछ समय का झटका नहीं, बल्कि नई और लंबे समय तक रहने वाली स्थिति हो सकता है। इसका महत्व इसलिए है क्योंकि बाज़ार पर असर केवल युद्धविराम खत्म होने की तारीख से तय नहीं होगा; असली सवाल यह है कि जहाज़ सुरक्षित रूप से सामान्य आवाजाही कब शुरू कर पाएंगे।
लंबे व्यवधान से ईंधन, माल ढुलाई और बीमा महंगे हो सकते हैं। इसका असर ऊर्जा-प्रधान उद्योगों, पेट्रोकेमिकल क्षेत्र और आयातित ऊर्जा पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। फिर भी महंगाई और आर्थिक विकास पर अंतिम प्रभाव अभी निश्चित नहीं है। यह संकट कितने समय तक चलता है, भंडार कितने उपलब्ध हैं, वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग कितने प्रभावी हैं और वाणिज्यिक जहाज़ी यातायात कितनी जल्दी बहाल होता है—नतीजा इन बातों पर निर्भर करेगा।
यह संकट अब केवल अमेरिका और ईरान के बीच का विवाद नहीं रह गया है। खाड़ी देशों पर दबाव बढ़ रहा है, ओमान की मध्यस्थ भूमिका जोखिम में है और कई देशों के वाणिज्यिक जहाज़ रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्ग में घटनाओं की चपेट में हैं। किसी जहाज़ पर नया हमला, नौसैनिक रोक, नाकेबंदी की कोशिश या क्षेत्रीय प्रॉक्सी कार्रवाई तनाव को नए हिंसक चक्र में धकेल सकती है।
निकट भविष्य में टिकाऊ समाधान के बजाय अस्थिरता और संकट-प्रबंधन की संभावना अधिक दिखती है। समुद्री मार्ग तक पहुंच पर कोई विश्वसनीय अस्थायी समझौता बातचीत का रास्ता फिर खोल सकता है, लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों को जहाज़ों के आवागमन के स्पष्ट और लागू किए जा सकने वाले नियम स्वीकार करने होंगे। साथ ही राजनीतिक वार्ता का चैनल भी बहाल करना होगा। तब तक युद्धविराम की समाप्ति का अर्थ है—कमज़ोर कूटनीति, कम भरोसेमंद शिपिंग और होर्मुज़ के आसपास हर नई घटना पर तेल बाज़ार की बढ़ती संवेदनशीलता।