सार्वजनिक रिपोर्टिंग यह स्पष्ट रूप से नहीं बताती कि हर ट्रांसफर में कौन-सा ग्रेड इस्तेमाल हुआ। हालांकि, अरामको की संबंधित पेशकशों में Arab Medium और Arab Heavy ग्रेड शामिल बताए गए हैं। एशिया के लिए सितंबर मूल्य निर्धारण में मुख्य रूप से Arab Light का उल्लेख हुआ।
यह व्यवस्था जोखिम को समाप्त नहीं करती। जहाज़ों को अब भी खाड़ी के भीतर या उसके आसपास संवेदनशील जलक्षेत्र से गुजरना पड़ सकता है, और ट्रांसफर के लिए अतिरिक्त टैंकर, चालक दल, बीमा और समय की जरूरत होती है।
अरामको का तरीका संयुक्त अरब अमीरात की सरकारी तेल कंपनी Abu Dhabi National Oil Co. यानी ADNOC के शटल मॉडल जैसा है। ADNOC छोटे टैंकरों से तेल को जोखिम वाले क्षेत्र के पार या उसके आसपास ले जाकर हार्मुज़ के बाहर बड़े निर्यात टैंकरों में स्थानांतरित कर रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार, ADNOC की यह व्यवस्था अब तक १० करोड़ बैरल से अधिक तेल स्थानांतरित कर चुकी है। उसका नेटवर्क अरामको की मौजूदा व्यवस्था से अधिक पुराना, व्यवस्थित और व्यापक है। इसके मुकाबले अरामको का STS मॉडल अभी चुनिंदा कार्गो के लिए एक आकस्मिक व्यवस्था है—यह रास तनुरा से होने वाले सामान्य निर्यात का पूर्ण विकल्प नहीं है।
संघर्ष शुरू होने के बाद सऊदी अरब ने बड़ी मात्रा में तेल को East-West Pipeline के जरिए देश के पूर्वी हिस्से से पश्चिमी बंदरगाह यानबू तक भेजना शुरू किया। इसका उद्देश्य हार्मुज़ से बचकर लाल सागर के रास्ते निर्यात करना था।
लेकिन यानबू से निकलने वाले एशिया-bound टैंकरों को लाल सागर से होते हुए यमन के पास स्थित बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य तक जाना पड़ता है। हूती हमलों और चेतावनियों के कारण कुछ सऊदी तेल ले जा रहे टैंकरों ने रास्ता बदला या वापस मुड़ गए। हाल की यानबू लोडिंग में जहाज़ों ने अपना AIS ट्रैकिंग सिग्नल भी बंद रखा, जिससे उनकी गतिविधियां सार्वजनिक निगरानी से बाहर हो गईं।
जुलाई में सऊदी कच्चा तेल लेकर चीन और भारत जा रहे तीन टैंकर हूती चेतावनी के बाद लाल सागर में यू-टर्न लेते देखे गए थे। वे यमन के तट के पास जोखिम लेने के बजाय स्वेज नहर की दिशा में मुड़ गए।
सऊदी अरब ने मिस्र के भूमध्यसागरीय बंदरगाह सिदी केरिर तक पहुंचने वाले पाइपलाइन मार्ग का उपयोग भी बढ़ाया है। हालांकि, यह मार्ग बाब-अल-मंदेब से बचाता है, लेकिन लंबी यात्रा और अतिरिक्त लॉजिस्टिक लागत जोड़ता है।
लाल सागर का रास्ता अधिक जोखिमपूर्ण होने के साथ अरामको ने हार्मुज़ के भीतर स्थित अपने प्रमुख निर्यात केंद्रों से लोडिंग फिर शुरू की है। सैटेलाइट तस्वीरों और शिपिंग डेटा में रास तनुरा परिसर के निकट, विशेष रूप से जु'आयमा के सिंगल-पॉइंट मूरिंग पर, बहुत बड़े कच्चा तेल टैंकरों (VLCC) की गतिविधि फिर दिखाई दी। कुछ अतिरिक्त टैंकर लोडिंग की प्रतीक्षा करते भी देखे गए।
यह संकेत देता है कि अरामको पश्चिमी मार्ग पर निर्भरता कम करने के लिए कुछ मात्रा वापस खाड़ी के टर्मिनलों से भेज रहा है। लेकिन हार्मुज़ के भीतर लोडिंग खुद सुरक्षा जोखिम से जुड़ी है। इसलिए यह रास्ता भी सामान्य समय जैसी भरोसेमंद व्यवस्था नहीं माना जा सकता।
एशियाई रिफाइनरियों, जिनमें भारतीय खरीदार भी शामिल हैं, को यानबू से तेल उठाने के लिए ऐसे टैंकर खोजने में कठिनाई हो रही है जो लाल सागर से गुजरने को तैयार हों। कुछ खरीदारों ने जोखिम कम करने के लिए तेल को लाल सागर के बाहर किसी वैकल्पिक बिंदु से लेने की इच्छा जताई है।
इससे भारत में अरामको की आपूर्ति की समयबद्धता और प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति पर दबाव पड़ सकता है। कुछ रिपोर्टों में भारतीय सरकारी रिफाइनरियों द्वारा सिदी केरिर से लोड होने वाले तेल के लिए प्रति बैरल ५ से १० डॉलर की छूट मांगने का उल्लेख है।
हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टिंग के आधार पर भारत के बाजार में अरामको की हिस्सेदारी कितनी बदली है, इसका सटीक आंकड़ा निकालने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं है। इतना जरूर स्पष्ट है कि अनिश्चित डिलीवरी, अधिक परिवहन लागत और वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की उपलब्धता खरीदारों के फैसलों को प्रभावित कर रही है।
गुप्त या कम दिखाई देने वाली शटल यात्राओं, नए मार्गों और कुछ खाड़ी लोडिंग के फिर शुरू होने से बाजार में तत्काल तेल-संकट का झटका उतना तेज नहीं हुआ जितना पूरी तरह आपूर्ति रुकने की स्थिति में हो सकता था। इसी वजह से तेल की कीमतों और ऊर्जा-जनित महंगाई को लेकर सबसे गंभीर आशंकाएं कुछ हद तक कम हुई हैं।
फिर भी, आपूर्ति सुरक्षा सामान्य नहीं हुई है। अरामको के प्रमुख के अनुसार, फरवरी में संघर्ष शुरू होने के बाद वैश्विक बाजार से २.६ अरब बैरल से अधिक तेल हट चुका है और भंडार घट रहे हैं।
इन वैकल्पिक अभियानों की वास्तविक मात्रा का अनुमान लगाना भी कठिन है, क्योंकि कई टैंकर AIS ट्रांसपोंडर बंद करके चलते हैं। इससे बाजार विश्लेषकों और खरीदारों के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वास्तव में कितना तेल रास्ते में है।
अरामको ने सितंबर डिलीवरी के लिए एशिया में अपने प्रमुख Arab Light ग्रेड का आधिकारिक बिक्री मूल्य (Official Selling Price या OSP) घटाकर छह साल के निचले स्तर पर कर दिया। कीमत Oman/Dubai औसत से २ डॉलर प्रति बैरल नीचे तय की गई।
लेकिन OSP केवल कच्चे तेल के मूल्य-अंतर को दर्शाता है। खरीदार की अंतिम या landed cost में कई अन्य खर्च शामिल होते हैं:
इसलिए कागज पर सस्ता Arab Light वास्तविक डिलीवरी के समय उतना सस्ता नहीं हो सकता। कुछ एशियाई ग्राहकों के लिए सितंबर के कार्गो आवंटन भी सामान्य तय कार्यक्रम के बजाय तदर्थ आधार पर संभाले गए।
संयुक्त अरब अमीरात की फुजैराह पाइपलाइन भौगोलिक रूप से हार्मुज़ को बायपास करती है, लेकिन वह UAE के पूरे कच्चे तेल निर्यात को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी कारण ADNOC को अब भी शटल टैंकरों और समुद्र में STS ट्रांसफर का सहारा लेना पड़ता है।
सऊदी अरब की Petroline या East-West Pipeline सैद्धांतिक रूप से बड़ी मात्रा में तेल को लाल सागर तट तक पहुंचा सकती है। पर इसका वास्तविक राहत-प्रभाव पाइपलाइन की throughput, यानबू टर्मिनलों की लोडिंग क्षमता, उपलब्ध टैंकरों और लाल सागर के सुरक्षा जोखिम से सीमित है।
रॉयटर्स के अनुसार, शुरुआती मोड़ के दौरान यानबू से निर्यात लगभग २० लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंचा था, जबकि हार्मुज़ से हटाई जाने वाली सऊदी मात्रा का अनुमान ५० से ६० लाख बैरल प्रतिदिन था। यानी पाइपलाइन और बंदरगाह मिलकर भी पूरे व्यवधान की भरपाई नहीं कर सकते।
अरामको और क्षेत्र के अन्य उत्पादकों ने वैकल्पिक रास्ते तो बनाए हैं, लेकिन सुरक्षित और स्थायी विकल्प अभी उपलब्ध नहीं हुआ है। इसके परिणामस्वरूप:
ऊंची कच्चे तेल की कीमतों से उत्पादकों का मुनाफा बढ़ सकता है और अरामको ने व्यवधान के बीच मुनाफे में तेज वृद्धि दर्ज की है। लेकिन इसके साथ निर्यात मात्रा पर दबाव, महंगी लॉजिस्टिक्स, ग्राहकों को बनाए रखने के लिए संभावित छूट और बाजार हिस्सेदारी खोने का जोखिम भी जुड़ा है।
अंततः, STS ट्रांसफर, यानबू और पाइपलाइन मार्गों ने तेल प्रवाह को पूरी तरह रुकने से बचाने में मदद की है। मगर ये उपाय हार्मुज़ और लाल सागर—दोनों संवेदनशील निकासों—पर निर्भरता की मूल समस्या को समाप्त नहीं करते।