लावरोव ने फ्रांस पर सहारा-साहेल क्षेत्र में सशस्त्र समूहों को सीधे हथियार और धन देने का आरोप लगाया। उन्होंने इसे अफ्रीका में प्रभाव खो चुके पूर्व औपनिवेशिक शक्ति द्वारा अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश के रूप में पेश किया।
यह आरोप रूस के उस व्यापक राजनीतिक संदेश का हिस्सा है जिसमें पश्चिमी देशों पर साहेल की सैन्य सरकारों के खिलाफ सशस्त्र समूहों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया जाता है। फ्रांस और संबंधित अफ्रीकी सरकारें क्षेत्र की सुरक्षा विफलताओं तथा विदेशी साझेदारियों को अलग-अलग तरीके से देखती हैं। इसलिए लावरोव की बात को स्वतंत्र रूप से सत्यापित निष्कर्ष नहीं, बल्कि रूस के राजनीतिक आरोप के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
लावरोव ने रूस के Defence Ministry-नियंत्रित Africa Corps को गैरकानूनी विदेशी हस्तक्षेप से अलग बताया। उनके अनुसार, यह बल उन अफ्रीकी देशों की वैध सरकारों के अनुरोध पर काम करता है जिन्हें मॉस्को वैध सरकारें मानता है, और वही सरकारें उसे अभियान और सुरक्षा से जुड़े कार्य सौंपती हैं।
यह बचाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि साहेल में रूस की सुरक्षा भूमिका क्षेत्र के बदलते शक्ति-संतुलन का प्रमुख हिस्सा है। फ्रांसीसी सैनिकों को बाहर करने के बाद बुर्किना फासो, माली और नाइजर ने रूस से सैन्य सहयोग मांगा है। मॉस्को ने प्रस्तावित 5,000 सैनिकों वाली संयुक्त सेना के लिए हथियार और प्रशिक्षण देने का वादा भी किया है।
Africa Corps को वैध सुरक्षा साझेदार माना जाए या रूसी प्रभाव के साधन के रूप में देखा जाए, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि आकलन कौन-सी सरकार या संस्था कर रही है। लावरोव का बयान इसलिए रूस की मौजूदगी का कानूनी बचाव भी है और संप्रभुता की उसकी पसंदीदा व्याख्या का समर्थन भी—यानी सुरक्षा सहयोग राष्ट्रीय सरकारों के अनुरोध पर हो, न कि पूर्व औपनिवेशिक शक्तियों या पश्चिमी नेतृत्व वाले ढांचे के तहत।
लावरोव का आरोप जुलाई 2024 में शुरू हुए एक पुराने विवाद को फिर सामने लाता है। उत्तरी माली में तुआरेग नेतृत्व वाली सेनाओं ने कहा था कि उन्होंने तिनज़ाओअतेन के पास माली की सेना और Wagner से जुड़े लड़ाकों को हराया। इसके बाद यूक्रेनी सैन्य खुफिया विभाग के एक प्रवक्ता की टिप्पणियों को बमाको ने यूक्रेन की भागीदारी का संकेत माना और माली ने यूक्रेन से राजनयिक संबंध तोड़ दिए।
इन आरोपों को संबंधित पक्षों ने चुनौती दी। तुआरेग विद्रोही गठबंधन के एक प्रतिनिधि ने कहा कि लड़ाई के दौरान उन्हें यूक्रेन सहित किसी बाहरी पक्ष से मदद नहीं मिली। यूक्रेन ने भी विद्रोहियों को ड्रोन देने से इनकार किया। इसके बावजूद बुर्किना फासो, माली और नाइजर ने संयुक्त राष्ट्र में शिकायत भेजकर कीव पर विद्रोही गुटों का समर्थन करने का आरोप लगाया।
यह पृष्ठभूमि बताती है कि लावरोव का ताजा बयान क्षेत्र में राजनीतिक रूप से इतना असरदार क्यों है। यह 2024 की विवादित घटना को रूस के साथ यूक्रेन के युद्ध को अफ्रीका तक फैलाने की व्यापक कहानी से जोड़ता है। हालांकि, उपलब्ध सामग्री इस व्याख्या की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करती।
ये आरोप बुर्किना फासो, माली और नाइजर के बड़े संस्थागत पुनर्गठन के बीच सामने आए हैं। सैन्य शासन वाले इन तीन देशों ने सैन्य शासन समाप्त कर संवैधानिक सरकार बहाल करने की ECOWAS की मांगों को लेकर लंबे विवाद के बाद 29 जनवरी 2025 को पश्चिम अफ्रीकी क्षेत्रीय संगठन ECOWAS से औपचारिक रूप से अलग होने की प्रक्रिया पूरी की। इसके बाद उन्होंने Alliance of Sahel States यानी Alliance des États du Sahel (AES) के ढांचे को आगे बढ़ाया।
तीनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) से भी हटने की प्रक्रिया शुरू की है। ICC ने पुष्टि की कि उन्हें इन देशों से Rome Statute से बाहर निकलने की सूचनाएं मिली हैं और एक वर्ष की कानूनी प्रक्रिया शुरू हो गई है। इन सरकारों ने अदालत को ‘नव-औपनिवेशिक दमन’ का माध्यम बताया है, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे जवाबदेही के रास्ते कमजोर हो सकते हैं।
रूस ने इस नए क्षेत्रीय गठजोड़ के लिए खुद को पसंदीदा बाहरी सुरक्षा साझेदार के रूप में पेश किया है। साहेल की सैन्य सरकारों ने फ्रांसीसी सैनिकों को बाहर निकाला और जिहादी हिंसा जारी रहने के बीच रूस से सहायता मांगी। हथियार, प्रशिक्षण और संयुक्त साहेल सेना के लिए मॉस्को का समर्थन इस रिश्ते को केवल वैचारिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक सैन्य आधार भी देता है।
लावरोव की रणनीति केवल तीन सैन्य सरकारों को ECOWAS के खिलाफ समर्थन देने तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि रूस ECOWAS और साहेल के तीन देशों के बीच संबंध बहाल कराने में मदद करने को तैयार है। रूस ने क्षेत्रीय संगठन के साथ सहयोग संबंधी एक समझौता ज्ञापन पर भी चर्चा की है।
इससे मॉस्को की दोहरी रणनीति सामने आती है। एक ओर वह बुर्किना फासो, माली और नाइजर के साथ करीबी सुरक्षा संबंध बनाए रख सकता है; दूसरी ओर ECOWAS के सदस्य देशों के सामने खुद को क्षेत्रीय सुरक्षा और सुलह के संभावित साझेदार के रूप में पेश कर सकता है। घाना की रूस के साथ बातचीत इसी राजनयिक चैनल का हिस्सा है, हालांकि अकरा रूस-यूक्रेन युद्ध के असर को लेकर मॉस्को के सामने अपनी चिंताएं भी रखता है।
इसी बैठक में घाना ने रूस की ओर से अपने नागरिकों को यूक्रेन में लड़ने के लिए कथित तौर पर भर्ती किए जाने का मुद्दा उठाया। अब्लाक्वा के अनुसार, 62 घानाई नागरिकों की मौत हुई है और 15 लोग लापता हैं। लावरोव ने कहा कि रूस घाना के अनुरोध की समीक्षा करेगा और बताया कि यह मामला रूसी रक्षा मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है।
इससे बैठक में एक उल्लेखनीय विरोधाभास दिखाई दिया। रूस यूक्रेन पर अफ्रीका में राज्य-समर्थित हिंसा फैलाने का आरोप लगा रहा था, जबकि घाना मॉस्को से अफ्रीकी नागरिकों को रूस के अपने युद्ध में भर्ती किए जाने की शिकायत कर रहा था। दोनों मामलों को समान आचरण का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन एक ही राजनयिक बातचीत में उनका उठना दिखाता है कि रूस-यूक्रेन युद्ध अब यूरोप से बहुत आगे जाकर अफ्रीकी सुरक्षा, भर्ती और संप्रभुता की बहसों को प्रभावित कर रहा है।
लावरोव की टिप्पणियां एक साथ कई राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करती हैं:
सबसे अहम सावधानी आरोपों की पुष्टि को लेकर है। यूक्रेनी सैनिकों की कथित भागीदारी और फ्रांस द्वारा सशस्त्र समूहों को समर्थन देने के लावरोव के दावे उपलब्ध सामग्री के आधार पर स्वतंत्र रूप से सिद्ध नहीं हैं। लेकिन व्यापक भू-राजनीतिक बदलाव स्पष्ट है: साहेल की सैन्य सरकारें कई पश्चिमी-संबद्ध संस्थानों से अलग हो रही हैं, रूस अपनी सुरक्षा भूमिका बढ़ा रहा है और यूक्रेन युद्ध से जुड़े विवाद अब यूरोप से बाहर अफ्रीका के राजनयिक संबंधों को भी आकार दे रहे हैं।