बाद में ट्रंप ने संकेत दिया कि विदेश और वित्त विभाग 2020 में लगाए गए प्रतिबंध हटाने पर काम कर रहे हैं। हालांकि, प्रतिबंध हटाना और F-35 खरीदने की पात्रता दो अलग-अलग बातें हैं। प्रतिबंधों में राहत मिलने से अपने-आप वह कानूनी रोक खत्म नहीं होगी, जो इन विमानों को तुर्किये को हस्तांतरित करने से रोकती है।
विवाद की शुरुआत 2019 में तुर्किये द्वारा रूस की S-400 वायु रक्षा प्रणाली खरीदने से हुई। वॉशिंगटन का तर्क था कि NATO के F-35 संचालक देश के पास रूसी प्रणाली होने से विमान की संवेदनशील तकनीक और उससे जुड़ी जानकारी की सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है। साथ ही, S-400 और F-35 के बीच तकनीकी तालमेल से जुड़े जोखिम भी बताए गए।
S-400 खरीद के बाद तुर्किये को F-35 कार्यक्रम से बाहर कर दिया गया और अमेरिका ने Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act यानी CAATSA के तहत प्रतिबंध लगाए।
तुर्किये F-35 कार्यक्रम में साझेदार देश था और कम-से-कम 100 विमान खरीदने की योजना बना रहा था। कार्यक्रम से बाहर किए जाने से पहले उसने इसमें लगभग 1.4 अरब डॉलर का निवेश किया था।
वित्त वर्ष 2020 के National Defense Authorization Act की धारा 1245 तुर्किये को F-35 विमान हस्तांतरित करने पर रोक लगाती है। इस रोक से छूट तभी दी जा सकती है, जब अमेरिकी कार्यपालिका प्रमाणित करे कि:
इसके अलावा, छूट प्रभावी होने से पहले 90 दिन की अवधि भी जरूरी है।
इसका अर्थ है कि राष्ट्रपति की सार्वजनिक घोषणा अपने-आप बिक्री पूरी नहीं कर सकती। अमेरिकी विदेश विभाग ने जुलाई में कांग्रेस को भेजे पत्र में कहा था कि तुर्किये ने F-35 विमान पाने के लिए जरूरी कानूनी शर्तें अभी पूरी नहीं की हैं।
कांग्रेस भी इस प्रक्रिया में अहम बाधा है। कई सांसदों ने तुर्किये को F-35 बेचने पर गंभीर चिंता जताई है। इसलिए प्रशासन CAATSA प्रतिबंधों में राहत को तुर्किये की F-35 कार्यक्रम में स्वतः वापसी के बराबर नहीं मान सकता।
निर्णायक सवाल यह नहीं है कि S-400 सक्रिय है या निष्क्रिय, अथवा उसे किसी गोदाम में रखा गया है। मुख्य सवाल यह है कि क्या तुर्किये के पास वह प्रणाली और उससे जुड़े उपकरण अब भी हैं। अमेरिकी कानून में “कब्जे” और संबंधित उपकरणों का उल्लेख है। कानून दोबारा खरीद न करने का भरोसेमंद आश्वासन भी मांगता है।
सार्वजनिक रिपोर्टों में इन प्रणालियों को किसी दूसरे देश को हस्तांतरित करने या उनका किसी अन्य तरीके से निपटारा करने की संभावनाओं पर चर्चा हुई है। लेकिन उपलब्ध स्रोतों में ऐसा कोई अंतिम और सार्वजनिक रूप से पुष्ट समझौता दर्ज नहीं है, जो अमेरिकी कानून की शर्तें पूरी करता हो। अगस्त की एक रिपोर्ट में F-35 खरीद को अटका हुआ बताया गया, क्योंकि S-400 से जुड़ी शर्त अब भी अनसुलझी थी।
जब तक अंकारा S-400 को लेकर अपनी कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं करता और अमेरिकी प्रशासन आवश्यक प्रमाणन जारी नहीं करता, ट्रंप का वादा बातचीत की शुरुआत तो है, लेकिन F-35 हस्तांतरण का लागू आदेश नहीं।
F-35 विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब एर्दोआन तुर्किये को एक साथ NATO सहयोगी और स्वतंत्र क्षेत्रीय सुरक्षा शक्ति के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। अगस्त में तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा और तीनों देशों के बीच सामूहिक रक्षा का ढांचा बनेगा।
तुर्किये के अधिकारियों ने इस समझौते को रक्षात्मक बताया है और कहा है कि यह ईरान या किसी अन्य विशेष देश के खिलाफ नहीं है। एर्दोआन ने कहा है कि इसमें क्षेत्र के अन्य देश भी शामिल हो सकते हैं और इसकी दीर्घकालिक परिकल्पना केवल इन तीन हस्ताक्षरकर्ताओं तक सीमित नहीं है। मिस्र को संभावित कूटनीतिक संपर्क के संदर्भ में रिपोर्टों में चर्चा मिली है, लेकिन उपलब्ध स्रोत उसे समझौते का पुष्ट सदस्य नहीं बताते।
उपलब्ध रिपोर्टें एर्दोआन के क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग और क्षेत्रीय स्वामित्व पर जोर का समर्थन करती हैं। हालांकि, वे सीरिया की यात्रा, सीरिया के लिए किसी नई सहायता व्यवस्था या गाजा के पुनर्निर्माण के किसी निश्चित पैकेज से जुड़ी नई प्रतिबद्धताओं को स्थापित नहीं करतीं। इन दावों को इसलिए F-35 और मक्का समझौते से अलग देखा जाना चाहिए।
एर्दोआन के अनुसार ट्रंप ने तुर्किये को F-35 कार्यक्रम में वापस लाने का वादा किया है। ट्रंप ने प्रतिबंधों में राहत देने और संभावित F-35 बिक्री पर विचार करने की बात भी कही थी। लेकिन तुर्किये के सामने सबसे बड़ी बाधा अब भी कायम है: अमेरिकी कानून के मुताबिक उसे S-400 का कब्जा पूरी तरह छोड़ना होगा, जबकि विदेश विभाग कह चुका है कि जरूरी कानूनी शर्तें अभी पूरी नहीं हुई हैं।
यानी फिलहाल राजनीतिक संदेश और कानूनी स्थिति के बीच साफ अंतर है। तुर्किये की वापसी के लिए S-400 विवाद का सत्यापन योग्य समाधान, अमेरिकी प्रशासन का औपचारिक प्रमाणन और कांग्रेस की जांच-परख से गुजर सकने वाली बिक्री जरूरी होगी—सिर्फ NATO शिखर सम्मेलन में किया गया वादा पर्याप्त नहीं होगा।
बाद में ट्रंप ने संकेत दिया कि विदेश और वित्त विभाग 2020 में लगाए गए प्रतिबंध हटाने पर काम कर रहे हैं। हालांकि, प्रतिबंध हटाना और F-35 खरीदने की पात्रता दो अलग-अलग बातें हैं। प्रतिबंधों में राहत मिलने से अपने-आप वह कानूनी रोक खत्म नहीं होगी, जो इन विमानों को तुर्किये को हस्तांतरित करने से रोकती है।
विवाद की शुरुआत 2019 में तुर्किये द्वारा रूस की S-400 वायु रक्षा प्रणाली खरीदने से हुई। वॉशिंगटन का तर्क था कि NATO के F-35 संचालक देश के पास रूसी प्रणाली होने से विमान की संवेदनशील तकनीक और उससे जुड़ी जानकारी की सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है। साथ ही, S-400 और F-35 के बीच तकनीकी तालमेल से जुड़े जोखिम भी बताए गए।
S-400 खरीद के बाद तुर्किये को F-35 कार्यक्रम से बाहर कर दिया गया और अमेरिका ने Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act यानी CAATSA के तहत प्रतिबंध लगाए।
तुर्किये F-35 कार्यक्रम में साझेदार देश था और कम-से-कम 100 विमान खरीदने की योजना बना रहा था। कार्यक्रम से बाहर किए जाने से पहले उसने इसमें लगभग 1.4 अरब डॉलर का निवेश किया था।
वित्त वर्ष 2020 के National Defense Authorization Act की धारा 1245 तुर्किये को F-35 विमान हस्तांतरित करने पर रोक लगाती है। इस रोक से छूट तभी दी जा सकती है, जब अमेरिकी कार्यपालिका प्रमाणित करे कि:
इसके अलावा, छूट प्रभावी होने से पहले 90 दिन की अवधि भी जरूरी है।
इसका अर्थ है कि राष्ट्रपति की सार्वजनिक घोषणा अपने-आप बिक्री पूरी नहीं कर सकती। अमेरिकी विदेश विभाग ने जुलाई में कांग्रेस को भेजे पत्र में कहा था कि तुर्किये ने F-35 विमान पाने के लिए जरूरी कानूनी शर्तें अभी पूरी नहीं की हैं।
कांग्रेस भी इस प्रक्रिया में अहम बाधा है। कई सांसदों ने तुर्किये को F-35 बेचने पर गंभीर चिंता जताई है। इसलिए प्रशासन CAATSA प्रतिबंधों में राहत को तुर्किये की F-35 कार्यक्रम में स्वतः वापसी के बराबर नहीं मान सकता।
निर्णायक सवाल यह नहीं है कि S-400 सक्रिय है या निष्क्रिय, अथवा उसे किसी गोदाम में रखा गया है। मुख्य सवाल यह है कि क्या तुर्किये के पास वह प्रणाली और उससे जुड़े उपकरण अब भी हैं। अमेरिकी कानून में “कब्जे” और संबंधित उपकरणों का उल्लेख है। कानून दोबारा खरीद न करने का भरोसेमंद आश्वासन भी मांगता है।
सार्वजनिक रिपोर्टों में इन प्रणालियों को किसी दूसरे देश को हस्तांतरित करने या उनका किसी अन्य तरीके से निपटारा करने की संभावनाओं पर चर्चा हुई है। लेकिन उपलब्ध स्रोतों में ऐसा कोई अंतिम और सार्वजनिक रूप से पुष्ट समझौता दर्ज नहीं है, जो अमेरिकी कानून की शर्तें पूरी करता हो। अगस्त की एक रिपोर्ट में F-35 खरीद को अटका हुआ बताया गया, क्योंकि S-400 से जुड़ी शर्त अब भी अनसुलझी थी।
जब तक अंकारा S-400 को लेकर अपनी कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं करता और अमेरिकी प्रशासन आवश्यक प्रमाणन जारी नहीं करता, ट्रंप का वादा बातचीत की शुरुआत तो है, लेकिन F-35 हस्तांतरण का लागू आदेश नहीं।
F-35 विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब एर्दोआन तुर्किये को एक साथ NATO सहयोगी और स्वतंत्र क्षेत्रीय सुरक्षा शक्ति के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। अगस्त में तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा और तीनों देशों के बीच सामूहिक रक्षा का ढांचा बनेगा।
तुर्किये के अधिकारियों ने इस समझौते को रक्षात्मक बताया है और कहा है कि यह ईरान या किसी अन्य विशेष देश के खिलाफ नहीं है। एर्दोआन ने कहा है कि इसमें क्षेत्र के अन्य देश भी शामिल हो सकते हैं और इसकी दीर्घकालिक परिकल्पना केवल इन तीन हस्ताक्षरकर्ताओं तक सीमित नहीं है। मिस्र को संभावित कूटनीतिक संपर्क के संदर्भ में रिपोर्टों में चर्चा मिली है, लेकिन उपलब्ध स्रोत उसे समझौते का पुष्ट सदस्य नहीं बताते।
उपलब्ध रिपोर्टें एर्दोआन के क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग और क्षेत्रीय स्वामित्व पर जोर का समर्थन करती हैं। हालांकि, वे सीरिया की यात्रा, सीरिया के लिए किसी नई सहायता व्यवस्था या गाजा के पुनर्निर्माण के किसी निश्चित पैकेज से जुड़ी नई प्रतिबद्धताओं को स्थापित नहीं करतीं। इन दावों को इसलिए F-35 और मक्का समझौते से अलग देखा जाना चाहिए।
एर्दोआन के अनुसार ट्रंप ने तुर्किये को F-35 कार्यक्रम में वापस लाने का वादा किया है। ट्रंप ने प्रतिबंधों में राहत देने और संभावित F-35 बिक्री पर विचार करने की बात भी कही थी। लेकिन तुर्किये के सामने सबसे बड़ी बाधा अब भी कायम है: अमेरिकी कानून के मुताबिक उसे S-400 का कब्जा पूरी तरह छोड़ना होगा, जबकि विदेश विभाग कह चुका है कि जरूरी कानूनी शर्तें अभी पूरी नहीं हुई हैं।
यानी फिलहाल राजनीतिक संदेश और कानूनी स्थिति के बीच साफ अंतर है। तुर्किये की वापसी के लिए S-400 विवाद का सत्यापन योग्य समाधान, अमेरिकी प्रशासन का औपचारिक प्रमाणन और कांग्रेस की जांच-परख से गुजर सकने वाली बिक्री जरूरी होगी—सिर्फ NATO शिखर सम्मेलन में किया गया वादा पर्याप्त नहीं होगा।