अलग-अलग घटनाओं पर आधारित इन आंकड़ों को जोड़कर एक अंतिम समेकित मृतक संख्या नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि, सभी रिपोर्टों से यह स्पष्ट है कि हिंसा में सैन्य नुकसान के साथ-साथ नागरिकों की कीमत भी बढ़ रही है।
अप्रैल 2022 में UN की मध्यस्थता से बनी युद्धविराम व्यवस्था ने सीमा पार और अग्रिम मोर्चों पर बड़ी लड़ाई को काफी कम कर दिया था। लेकिन इससे यमन के राजनीतिक विवाद का स्थायी समाधान नहीं निकला। युद्धविराम अवधि के बाद भी देश अंतिम शांति समझौते के बजाय लंबे राजनीतिक और सुरक्षा गतिरोध में फंसा रहा।
यही वजह है कि उस समय बनी शांति को औपचारिक समाधान के बजाय एक व्यवहारिक या de facto शांति कहा जा सकता है। यह तब तक कायम रह सकती थी, जब तक पक्ष सैन्य गतिविधियां सीमित रखते और बातचीत के रास्ते खुले रहते। मारिब, हद्रामौत और मोचा में हमलों के बाद सरकारी जवाबी कार्रवाई और सैन्य लामबंदी ने इस संयम को तोड़ दिया और हमले-जवाबी हमले का चक्र शुरू हो गया।
ग्रुंडबर्ग ने इसे 2022 के युद्धविराम के बाद सैन्य गतिविधियों में सबसे बड़ा तेज उछाल बताया। उन्होंने UN सुरक्षा परिषद को कहा कि यमन अब उस समझौते के बाद से किसी भी समय की तुलना में बड़े पैमाने के संघर्ष में लौटने के अधिक गंभीर खतरे का सामना कर रहा है।
ग्रुंडबर्ग ने बढ़ती हिंसा रोकने और बातचीत से समाधान की संभावना बचाए रखने का आह्वान किया। उन्होंने सुरक्षा परिषद को जानकारी देते हुए चेताया कि अग्रिम मोर्चों पर सैन्य गतिविधियां बढ़ने से यमन फिर व्यापक युद्ध में जा सकता है।
तुर्क का जोर तत्काल मानवीय नुकसान पर था। उन्होंने सभी पक्षों से संयम बरतने, तनाव कम करने और ऐसे कदम रोकने को कहा जो यमन को पूर्ण युद्ध की ओर धकेल सकते हैं। UN ने नागरिकों और समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा पर भी चिंता जताई, क्योंकि हिंसा जमीन से आगे बढ़कर बंदरगाहों और वाणिज्यिक समुद्री मार्गों तक पहुंच रही है।
ये बयान इस बात का प्रमाण नहीं हैं कि यमन में पूर्ण युद्ध पहले ही शुरू हो चुका है। वे UN के उस आकलन को दर्शाते हैं कि राजनीतिक समझौता न होने के बीच व्यापक संघर्ष की परिस्थितियां तेजी से खतरनाक हो रही हैं।
यमन की राष्ट्रपति नेतृत्व परिषद के अध्यक्ष राशद अल-अलीमी ने एक और अस्थायी युद्धविराम व्यवस्था के विचार को खारिज कर दिया। उनका कहना है कि स्थायी और टिकाऊ शांति तभी संभव है, जब हथियारों और संप्रभुता पर राज्य का नियंत्रण हो तथा हौथी हथियार डालकर राजनीतिक प्रक्रिया में एक राजनीतिक पक्ष के रूप में शामिल हों।
यह रुख UN की तत्काल प्राथमिकता से अलग है। UN पहले हिंसा रोकने और वार्ता बहाल करने पर जोर दे रहा है, जबकि यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का तर्क है कि बिना राजनीतिक समझौते के नया विराम हौथियों को अपनी सैन्य क्षमता बनाए रखने या फिर मजबूत करने का अवसर दे सकता है।
यही मतभेद तनाव कम करने की कोशिश को कठिन बनाता है। एक ओर तत्काल लड़ाई रोकने की मांग है, तो दूसरी ओर सरकार कह रही है कि केवल अस्थायी विराम स्थायी शांति की गारंटी नहीं देता।
यमन का संघर्ष अब केवल देश की सीमाओं के भीतर का संकट नहीं रह गया है। मोचा जैसे लाल सागर बंदरगाह पर हमला और एक वाणिज्यिक जहाज को निशाना बनाए जाने से अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी की सुरक्षा पर सवाल उठे हैं।
यमन के पास बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य स्थित है, जो लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां नए हमले होने पर जहाजरानी कंपनियां अपने रास्ते बदल सकती हैं, बीमा और परिवहन लागत बढ़ सकती है तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर दबाव पड़ सकता है। UN ने वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों को अस्वीकार्य बताया है और समुद्री कर्मचारियों की जान जाने पर चिंता जताई है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यापक क्षेत्रीय संकट निश्चित है। लेकिन यमन में लड़ाई बढ़ने से स्थानीय संघर्ष, लाल सागर की असुरक्षा, बाहरी नौसैनिक गतिविधियां और मध्य-पूर्व के व्यापक तनाव एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं।
यमन अभी अतीत के पूर्ण पैमाने वाले युद्ध में वापस नहीं लौटा है, लेकिन हालिया हमलों ने 2022 के बाद बनी व्यावहारिक शांति की बची हुई रोकथाम को कमजोर कर दिया है। सैन्य ठिकानों पर हमले, नागरिकों की मौत, बंदरगाहों को नुकसान और समुद्र में हिंसा अब एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई दे रहे हैं।
तुर्क की चेतावनी तत्काल भी है और शर्त पर आधारित भी: व्यापक युद्ध को अभी टाला जा सकता है, लेकिन इसके लिए सभी पक्षों को सैन्य विस्तार रोकना होगा। ग्रुंडबर्ग का आकलन इस खतरे की गंभीरता स्पष्ट करता है—2022 के युद्धविराम के बाद कायम राजनीतिक गतिरोध ने यमन को तेज गिरावट के प्रति असुरक्षित बना दिया है, और अगस्त की घटनाएं उस नाजुक शांति की अब तक की सबसे गंभीर परीक्षा हैं।