औपचारिक और पारस्परिक रूप से सत्यापित युद्धविराम के अभाव में कोई स्थानीय हमला, जवाबी कार्रवाई या समुद्री घटना तेजी से व्यापक क्षेत्रीय टकराव का रूप ले सकती है। इससे खाड़ी क्षेत्र में बंदरगाहों, टैंकरों, अमेरिकी सैन्य ठिकानों और ईरान-समर्थित सशस्त्र समूहों पर जोखिम बढ़ सकता है।
होरमुज़ जलडमरूमध्य इस संकट में एक साथ सबसे बड़ा बातचीत का हथियार और तत्काल आर्थिक जोखिम बन गया है। ईरान का यह दावा कि जलडमरूमध्य उसके नियंत्रण में है, तथा कूटनीति विफल होने पर अधिक “आक्रामक” रुख अपनाने की धमकी, वाणिज्यिक जहाज़रानी पर दबाव बढ़ा सकती है।
पूरी तरह नाकेबंदी न होने की स्थिति में भी युद्ध-जोखिम बीमा महंगा हो सकता है, जहाज़ संचालक मार्ग बदलने या पारगमन रोकने पर विचार कर सकते हैं, माल की डिलीवरी में देरी हो सकती है और कच्चे तेल की कीमतों में भू-राजनीतिक प्रीमियम जुड़ सकता है।
खाड़ी देश, ऊर्जा आयातक और नौसैनिक शक्तियां वाणिज्यिक जहाज़ों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के दबाव में हैं। लेकिन ऐसे कदम उठाना भी जोखिमपूर्ण है जिन्हें तेहरान तनाव बढ़ाने वाली कार्रवाई के रूप में पेश कर सकता है। समझौते के टूटने से क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था और अधिक अस्थिर हो सकती है।
नहीं, लेकिन संभावना पहले से कमजोर जरूर हुई है। किसी नए और विश्वसनीय प्रक्रिया के लिए कम-से-कम इन बिंदुओं पर सहमति जरूरी होगी:
फिलहाल वॉशिंगटन और तेहरान की सार्वजनिक मांगों में काफी अंतर है, इसलिए इन बुनियादी शर्तों पर सहमति बनाना कठिन दिखाई देता है।
इस 60-दिन के ढांचे के समाप्त होने का सबसे बड़ा असर यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव को सीमित करने वाला साझा राजनीतिक तंत्र कमजोर पड़ गया है। जब तक दोनों सरकारें विस्तार की अवधि, शर्तें और युद्धविराम संबंधी दायित्व संयुक्त रूप से प्रकाशित नहीं करतीं, तब तक किसी देर से आए विस्तार के दावे को आधिकारिक समझौता नहीं माना जा सकता। उपलब्ध जानकारी में ऐसा कोई स्पष्ट प्रतिस्थापन समझौता प्रभावी होता नहीं दिखता।