इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, उपप्रधानमंत्री मत्तेओ साल्विनी और विदेश मंत्री अंतोनियो ताजानी ने स्पेन के शेंगेन दर्जे को निलंबित करने या उसकी सदस्यता की समीक्षा तक की मांग उठाई।
ताजानी ने कहा कि स्पेन को इटली की बजाय “मोरक्को को लेकर चिंतित होना चाहिए।” उनका तर्क था कि संकट का मूल स्रोत मोरक्को से होने वाला सीमा-पार आवागमन है, न कि इटली की अस्थायी जांच।
इस बयान ने विवाद को और तीखा कर दिया, क्योंकि इससे स्पेन की प्रवासन नीति और सीमा-प्रबंधन पर सीधे सवाल उठे। ताजानी ने बाद में यह भी कहा कि इटली स्पेन के खिलाफ कोई “जंग” नहीं लड़ रहा, बल्कि सेउता से नई आवक के जोखिम को लेकर सावधानी बरत रहा है।
स्पेन की सरकार ने इटली की कार्रवाई को अनुचित, राजनीतिक रूप से प्रेरित और यूरोप में मुक्त आवाजाही के लिए नुकसानदेह बताया। मैड्रिड का कहना है कि अचानक पैदा हुए सीमा संकट के बाद स्पेन को दंडित करने के बजाय यूरोपीय साझेदारों को सहयोग करना चाहिए।
स्पेन ने सेउता में सैनिकों और पुलिस की तैनाती की, मोरक्को लौटने वाले लोगों की संख्या बढ़ाई और बाद में इटली के खिलाफ जवाबी सीमा जांच शुरू कर दी। 8 अगस्त से 7 सितंबर तक स्पेन ने इटली से आने वाली सभी हवाई और समुद्री सीमाओं पर जांच लागू की। यूरोपीय आयोग के शेंगेन रिकॉर्ड में इसका आधार सार्वजनिक व्यवस्था, आंतरिक सुरक्षा और तीसरे देशों के नागरिकों की बड़े पैमाने पर आवाजाही से जुड़े प्रवासन जोखिम बताए गए हैं।
नहीं। शेंगेन क्षेत्र यूरोप के उन देशों का समूह है जहां आम तौर पर आंतरिक सीमाओं पर नियमित पासपोर्ट जांच नहीं होती। हालांकि, असाधारण सुरक्षा या प्रवासन संकट के दौरान देश सीमित अवधि के लिए आंतरिक सीमा नियंत्रण फिर शुरू कर सकते हैं—बशर्ते वे यूरोपीय संघ के नियमों और निगरानी के अधीन रहें।
इस मामले में इटली की जांच 1 अगस्त से 1 सितंबर तक और स्पेन की जांच 8 अगस्त से 7 सितंबर तक तय की गई है। इसलिए ये कदम स्पेन को शेंगेन क्षेत्र से बाहर करना या दोनों देशों के बीच मुक्त आवाजाही को स्थायी रूप से खत्म करना नहीं हैं।
फिर भी, दो बड़े ईयू देशों के बीच एक-दूसरे के खिलाफ सीमा नियंत्रण का इस्तेमाल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यदि ऐसे कदम बार-बार उठाए गए या लंबे समय तक बढ़ाए गए, तो इससे शेंगेन की विश्वसनीयता और यूरोप में मुक्त आवाजाही पर भरोसा कमजोर हो सकता है।
सेउता संकट ने दिखाया कि यूरोप की प्रवासन नीति मोरक्को जैसे पारगमन देशों के सहयोग पर कितनी निर्भर है। स्पेन को सीमा-नियंत्रण और लोगों की वापसी के लिए रबात के सहयोग की जरूरत है। दूसरी ओर, इटली का कहना है कि यूरोपीय संघ को ऐसे देशों पर अधिक प्रभावी दबाव और उनके साथ अधिक व्यवस्थित सहयोग की नीति बनानी चाहिए।
मोरक्को के अधिकारियों द्वारा फ्नीदेक से सेउता पहुंचने की कोशिश कर रहे 100 से अधिक लोगों को रोकना यह भी दर्शाता है कि इस मार्ग पर मोरक्को की कार्रवाई निर्णायक बनी हुई है।
ईयू के गृह मंत्रियों ने मानव-तस्करी नेटवर्क के खिलाफ कड़ी कार्रवाई, अधिक प्रभावी वापसी नीतियों और मूल तथा पारगमन देशों के साथ करीबी सहयोग की मांग की है।
इटली और उसके समान रुख रखने वाली सरकारें तीसरे देशों में ईयू समर्थित वापसी केंद्र जैसे विकल्पों की वकालत करती हैं। आलोचक इन योजनाओं पर कानूनी वैधता, मानवाधिकार और व्यावहारिक अमल को लेकर सवाल उठाते हैं।
इसलिए विवाद सिर्फ यह नहीं है कि सेउता में कौन जिम्मेदार था। असली सवाल यह भी है कि यूरोप अनियमित प्रवासन को रोकने के लिए किस मॉडल को अपनाए—कठोर रोकथाम और बाहरी देशों को जिम्मेदारी सौंपने वाला मॉडल, या साझा यूरोपीय जिम्मेदारी, कानूनी रास्तों और नियमितीकरण पर अधिक जोर देने वाला मॉडल।
यह टकराव इटली की दक्षिणपंथी सरकार और स्पेन की केंद्र-वाम सरकार के बीच प्रवासन नीति के वैचारिक अंतर को भी सामने लाता है। मेलोनी सरकार रोकथाम, निरोध और बाहरी देशों के साथ समझौतों पर जोर देती है। प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज़ की सरकार साझा ईयू जिम्मेदारी और कानूनी प्रवासन-प्रबंधन के साधनों को अधिक महत्व देती है।
अभी तक यह एक सीमित अवधि वाला द्विपक्षीय शेंगेन टकराव है, न कि यूरोपीय मुक्त आवाजाही का पूर्ण संकट। लेकिन अगर सदस्य देश हर बड़े प्रवासन या सुरक्षा झटके के बाद एक-दूसरे पर सीमा नियंत्रण लगाने लगें, तो यह शेंगेन व्यवस्था के लिए गंभीर राजनीतिक मिसाल बन सकती है।
फिनलैंड, डेनमार्क या चेक गणराज्य द्वारा सेउता संकट से सीधे जुड़े समान प्रतिबंध या प्रस्ताव अपनाने के दावे उपलब्ध मजबूत स्रोतों से स्थापित नहीं होते। इसलिए उन्हें इटली-स्पेन की इसी द्विपक्षीय कार्रवाई का हिस्सा मानना उचित नहीं है।