इसका मतलब यह नहीं है कि आइसलैंड उसी दिन EU का सदस्य बनने का फैसला करेगा। ‘हां’ मिलने पर 2013 में स्थगित की गई बातचीत दोबारा शुरू होगी। अगर वार्ताओं के बाद सदस्यता की शर्तों पर समझौता बनता है, तो उसे मंजूर या खारिज करने के लिए एक अलग जनमत-संग्रह कराया जाएगा।
इसलिए यह वोट तत्काल सदस्यता के बजाय यह तय करने के बारे में है कि आइसलैंड संभावित समझौते की वास्तविक शर्तों—मछली पालन, कृषि, मुद्रा, व्यापार और वित्तीय योगदान—पर बातचीत करना चाहता है या नहीं। आधिकारिक तौर पर यह जनमत-संग्रह सलाहकारी प्रकृति का है।
आइसलैंड ने 2009 में वैश्विक बैंकिंग संकट के तुरंत बाद EU सदस्यता के लिए आवेदन किया था। देश की बैंकिंग व्यवस्था के ढहने से अर्थव्यवस्था पर गहरा दबाव पड़ा था और उस समय EU सदस्यता तथा आगे चलकर यूरो अपनाने को आर्थिक स्थिरता का संभावित रास्ता माना गया।
वार्ताएं आगे बढ़ीं और 27 अध्याय खोले गए, जिनमें से 11 को अस्थायी रूप से बंद भी कर दिया गया था। लेकिन कुछ सबसे संवेदनशील विषयों पर बातचीत निर्णायक चरण तक नहीं पहुंच सकी:
2013 में चुनी गई केंद्र-दक्षिणपंथी और EU-संदेहवादी सरकार ने सदस्यता वार्ताएं स्थगित कर दीं। उस समय EU सदस्यता और यूरोजोन को लेकर आइसलैंड में उत्साह कम हो रहा था, जबकि यूरोजोन संकट ने भी सदस्यता के आर्थिक लाभों पर सवाल खड़े किए थे।
विरोधियों की प्रमुख दलील थी कि आइसलैंड पहले से ही यूरोपीय आर्थिक क्षेत्र (EEA) के जरिए EU के एकल बाजार से काफी हद तक जुड़ा है। ऐसे में पूर्ण सदस्यता से मिलने वाले अतिरिक्त लाभों की तुलना में मछली पालन, कृषि, व्यापार नीति और आर्थिक फैसलों पर नियंत्रण खोने का जोखिम अधिक हो सकता है।
आज का भू-राजनीतिक माहौल 2009 या 2013 से अलग है। रूस का यूक्रेन पर युद्ध, आर्कटिक और उत्तर अटलांटिक में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तथा अमेरिका की विश्वसनीयता को लेकर अनिश्चितता ने यूरोप के साथ अधिक गहरे राजनीतिक संबंधों के पक्ष में तर्क मजबूत किया है।
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी दबाव और वहां के रणनीतिक महत्व ने इस बहस को और संवेदनशील बना दिया है। ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और ग्रीनलैंड-आइसलैंड-ब्रिटेन के बीच का उत्तर अटलांटिक क्षेत्र सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।
आइसलैंड पहले से NATO का सदस्य है। EU समर्थकों का कहना है कि EU सदस्यता NATO की सुरक्षा भूमिका के अतिरिक्त राजनीतिक और आर्थिक वजन दे सकती है। विरोधियों का जवाब है कि सुरक्षा की असली गारंटी NATO है, EU नहीं।
फिर भी चुनावी बहस केवल भू-राजनीति से तय नहीं होगी। मछली पालन, महंगाई, कीमतें, मुद्रा की स्थिरता और राष्ट्रीय संप्रभुता जैसे आर्थिक मुद्दे आम मतदाताओं के लिए अधिक तात्कालिक हैं।
हाल के सर्वेक्षणों में सदस्यता वार्ताएं फिर शुरू करने पर जनमत-संग्रह कराने के लिए अपेक्षाकृत मजबूत समर्थन दिखता है। लेकिन EU की पूर्ण सदस्यता के सवाल पर राय अधिक बंटी हुई है। यूरोपीय संसद की हालिया ब्रीफिंग के अनुसार, वार्ता शुरू करने पर वोट कराने के पक्ष में बहुमत है, जबकि सदस्यता को लेकर समर्थन और विरोध में स्पष्ट सहमति नहीं है।
यह अंतर अहम है। कोई मतदाता वार्ताएं शुरू करने के पक्ष में वोट दे सकता है, लेकिन अंतिम रूप से EU में शामिल होने के खिलाफ भी हो सकता है। दूसरे जनमत-संग्रह का प्रावधान इसी अंतर को ध्यान में रखता है: मतदाता किसी अमूर्त विकल्प के बजाय वास्तविक समझौते—विशेषकर मछली पालन की शर्तों—का मूल्यांकन कर सकेंगे।
उपलब्ध सर्वेक्षण-सारांशों के आधार पर इसे आइसलैंड का निर्णायक EU-समर्थक बदलाव कहना जल्दबाजी होगी। अलग-अलग सवालों की भाषा और अनिर्णीत मतदाताओं को शामिल करने के तरीके से आंकड़े बदलते हैं, इसलिए किसी एक निश्चित प्रतिशत को अंतिम तस्वीर मानने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।
EEA की सदस्यता के कारण आइसलैंड 1994 से EU के एकल बाजार में बड़े पैमाने पर भाग लेता है और मुक्त आवाजाही समेत EU से जुड़े अनेक नियम लागू करता है।
आइसलैंड शेंगेन क्षेत्र में भी शामिल है, इसलिए वहां से शेंगेन क्षेत्र के अन्य देशों में पासपोर्ट-मुक्त यात्रा संभव है।
लेकिन EEA, EU की पूर्ण सदस्यता के बराबर नहीं है। आइसलैंड:
पूर्ण सदस्यता से EU संस्थानों में प्रतिनिधित्व और वोटिंग अधिकार, EU बजट में योगदान, साझा बाहरी व्यापार नीति तथा साझा कृषि नीति और साझा मत्स्य नीति लागू होने जैसी व्यवस्थाएं सामने आएंगी।
समर्थकों का कहना है कि आइसलैंड EEA के जरिए EU के अनेक नियम अपनाता है, लेकिन उन्हें बनाने की प्रक्रिया में उसका सीधा वोट नहीं है। सदस्यता से वह नियमों का केवल पालन करने वाले देश से बदलकर उन्हें तय करने वाली संस्थाओं में प्रतिनिधित्व रखने वाला देश बन सकता है।
उनके अनुसार, अस्थिर उत्तर अटलांटिक माहौल में EU आइसलैंड को बड़ा राजनीतिक और आर्थिक आधार दे सकता है। वार्ताओं में देश की विशिष्ट अर्थव्यवस्था के लिए विशेष व्यवस्थाएं तलाशने का अवसर भी मिलेगा।
समर्थक यह भी कहते हैं कि असली शर्तें केवल बातचीत से ही स्पष्ट हो सकती हैं। मछली पालन, कृषि, मुद्रा, बजट योगदान और आर्थिक नियमों पर समझौता कैसा होगा, यह पहले से तय नहीं है। इसलिए वार्ता शुरू करने को वे अंतिम सदस्यता निर्णय नहीं, बल्कि जानकारी हासिल करने का चरण मानते हैं।
विरोधियों का तर्क है कि आइसलैंड को पहले ही एकल बाजार का बड़ा व्यावसायिक लाभ मिल रहा है, जबकि पूर्ण सदस्यता से राजनीतिक और आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्हें EU बजट में संभावित शुद्ध योगदान और घरेलू नियमों व आर्थिक नीति पर कम नियंत्रण की चिंता है।
EU सदस्यता का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह होगा कि आइसलैंड अपनी स्वतंत्र बाहरी व्यापार नीति खो देगा, क्योंकि व्यापार नीति EU के अधिकार क्षेत्र में आती है। इसका अर्थ है कि देश अपने स्तर पर व्यापार समझौते करने की मौजूदा स्वतंत्रता नहीं रख पाएगा।
किसानों को EU से आने वाले कृषि उत्पादों की अधिक प्रतिस्पर्धा और घरेलू सुरक्षा उपायों पर दबाव का डर है। यही संवेदनशीलता बताती है कि पहली सदस्यता प्रक्रिया में कृषि अध्याय क्यों नहीं खोला गया था।
लेकिन सबसे बड़ी आपत्ति मछली पालन को लेकर है। आइसलैंड के लिए मछली भंडार आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ राष्ट्रीय पहचान और संप्रभुता का भी प्रतीक है। आलोचकों को डर है कि साझा मत्स्य नीति के तहत कोटा तय करने और मछली पकड़ने की पहुंच से जुड़े फैसले EU ढांचे में चले जाएंगे।
मैकेरल इस पूरे विवाद का प्रतीक बन चुका है। मछलियों के झुंड के क्षेत्रीय वितरण में बदलाव और उसके बाद कोटा को लेकर हुए विवादों ने इसे आइसलैंड-EU संबंधों का खासा संवेदनशील मुद्दा बना दिया था।
विरोधियों को आशंका है कि EU के जहाजों को आइसलैंड के जलक्षेत्र में पहुंच मिल सकती है और देश द्वारा स्वतंत्र रूप से तय किए जाने वाले पकड़ कोटे साझा मत्स्य नीति से सीमित हो सकते हैं।
समर्थकों का कहना है कि सदस्यता वार्ताओं में अस्थायी या विशेष सुरक्षा प्रबंधों पर बातचीत की जा सकती है। लेकिन यह अभी एक संभावित लक्ष्य है, पक्की गारंटी नहीं।
आइसलैंड की विदेश मंत्री Þorgerður Katrín Gunnarsdóttir ने सरकार का रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि किसी भी समझौते में आइसलैंड अपने सभी मत्स्य संसाधनों पर “संप्रभु नियंत्रण” की मांग करेगा।
आइसलैंड सरकार इस मतदान को दो चरणों वाली लोकतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में पेश कर रही है: पहले वार्ता की अनुमति, फिर अंतिम सदस्यता समझौते पर जनता का फैसला।
EU समर्थक नेता इस बात पर जोर देते हैं कि ‘हां’ वोट EU में शामिल होने का अपरिवर्तनीय निर्णय नहीं होगा। दूसरी ओर, संदेहवादी नेताओं का कहना है कि वार्ता दोबारा शुरू होने से सदस्यता के पक्ष में राजनीतिक गति बनेगी और देश के मूल राष्ट्रीय हित बातचीत की मेज पर आ जाएंगे।
EU की विस्तार आयुक्त मार्ता कोस ने कहा है कि सदस्यता वार्ताओं के दौरान मछली पालन पर “रचनात्मक समाधान” खोजे जा सकते हैं। हालांकि उन्होंने आइसलैंड की मांगों को पहले से स्वीकार करने का कोई वादा नहीं किया है।
ब्रसेल्स सार्वजनिक रूप से सावधानी बरत रहा है और ऐसा नहीं दिखाना चाहता कि वह आइसलैंड के मतदान में हस्तक्षेप कर रहा है। फिर भी EU के अधिकारी सकारात्मक परिणाम को एक संभावित सफलता के रूप में देखते हैं—खासकर ऐसे समय में जब अन्य देशों में विस्तार प्रक्रिया कठिन बनी हुई है।
अंततः 29 अगस्त का सवाल सरल है, लेकिन उसके पीछे बहस गहरी है: क्या आइसलैंड यूरोप के साथ अपने संबंधों को मौजूदा आर्थिक एकीकरण से आगे ले जाकर राजनीतिक सदस्यता की संभावनाओं को परखना चाहता है, या फिर मछली, व्यापार और राष्ट्रीय नियंत्रण पर अपनी मौजूदा स्वतंत्रता को प्राथमिकता देगा?
इसका मतलब यह नहीं है कि आइसलैंड उसी दिन EU का सदस्य बनने का फैसला करेगा। ‘हां’ मिलने पर 2013 में स्थगित की गई बातचीत दोबारा शुरू होगी। अगर वार्ताओं के बाद सदस्यता की शर्तों पर समझौता बनता है, तो उसे मंजूर या खारिज करने के लिए एक अलग जनमत-संग्रह कराया जाएगा।
इसलिए यह वोट तत्काल सदस्यता के बजाय यह तय करने के बारे में है कि आइसलैंड संभावित समझौते की वास्तविक शर्तों—मछली पालन, कृषि, मुद्रा, व्यापार और वित्तीय योगदान—पर बातचीत करना चाहता है या नहीं। आधिकारिक तौर पर यह जनमत-संग्रह सलाहकारी प्रकृति का है।
आइसलैंड ने 2009 में वैश्विक बैंकिंग संकट के तुरंत बाद EU सदस्यता के लिए आवेदन किया था। देश की बैंकिंग व्यवस्था के ढहने से अर्थव्यवस्था पर गहरा दबाव पड़ा था और उस समय EU सदस्यता तथा आगे चलकर यूरो अपनाने को आर्थिक स्थिरता का संभावित रास्ता माना गया।
वार्ताएं आगे बढ़ीं और 27 अध्याय खोले गए, जिनमें से 11 को अस्थायी रूप से बंद भी कर दिया गया था। लेकिन कुछ सबसे संवेदनशील विषयों पर बातचीत निर्णायक चरण तक नहीं पहुंच सकी:
2013 में चुनी गई केंद्र-दक्षिणपंथी और EU-संदेहवादी सरकार ने सदस्यता वार्ताएं स्थगित कर दीं। उस समय EU सदस्यता और यूरोजोन को लेकर आइसलैंड में उत्साह कम हो रहा था, जबकि यूरोजोन संकट ने भी सदस्यता के आर्थिक लाभों पर सवाल खड़े किए थे।
विरोधियों की प्रमुख दलील थी कि आइसलैंड पहले से ही यूरोपीय आर्थिक क्षेत्र (EEA) के जरिए EU के एकल बाजार से काफी हद तक जुड़ा है। ऐसे में पूर्ण सदस्यता से मिलने वाले अतिरिक्त लाभों की तुलना में मछली पालन, कृषि, व्यापार नीति और आर्थिक फैसलों पर नियंत्रण खोने का जोखिम अधिक हो सकता है।
आज का भू-राजनीतिक माहौल 2009 या 2013 से अलग है। रूस का यूक्रेन पर युद्ध, आर्कटिक और उत्तर अटलांटिक में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तथा अमेरिका की विश्वसनीयता को लेकर अनिश्चितता ने यूरोप के साथ अधिक गहरे राजनीतिक संबंधों के पक्ष में तर्क मजबूत किया है।
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी दबाव और वहां के रणनीतिक महत्व ने इस बहस को और संवेदनशील बना दिया है। ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और ग्रीनलैंड-आइसलैंड-ब्रिटेन के बीच का उत्तर अटलांटिक क्षेत्र सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।
आइसलैंड पहले से NATO का सदस्य है। EU समर्थकों का कहना है कि EU सदस्यता NATO की सुरक्षा भूमिका के अतिरिक्त राजनीतिक और आर्थिक वजन दे सकती है। विरोधियों का जवाब है कि सुरक्षा की असली गारंटी NATO है, EU नहीं।
फिर भी चुनावी बहस केवल भू-राजनीति से तय नहीं होगी। मछली पालन, महंगाई, कीमतें, मुद्रा की स्थिरता और राष्ट्रीय संप्रभुता जैसे आर्थिक मुद्दे आम मतदाताओं के लिए अधिक तात्कालिक हैं।
हाल के सर्वेक्षणों में सदस्यता वार्ताएं फिर शुरू करने पर जनमत-संग्रह कराने के लिए अपेक्षाकृत मजबूत समर्थन दिखता है। लेकिन EU की पूर्ण सदस्यता के सवाल पर राय अधिक बंटी हुई है। यूरोपीय संसद की हालिया ब्रीफिंग के अनुसार, वार्ता शुरू करने पर वोट कराने के पक्ष में बहुमत है, जबकि सदस्यता को लेकर समर्थन और विरोध में स्पष्ट सहमति नहीं है।
यह अंतर अहम है। कोई मतदाता वार्ताएं शुरू करने के पक्ष में वोट दे सकता है, लेकिन अंतिम रूप से EU में शामिल होने के खिलाफ भी हो सकता है। दूसरे जनमत-संग्रह का प्रावधान इसी अंतर को ध्यान में रखता है: मतदाता किसी अमूर्त विकल्प के बजाय वास्तविक समझौते—विशेषकर मछली पालन की शर्तों—का मूल्यांकन कर सकेंगे।
उपलब्ध सर्वेक्षण-सारांशों के आधार पर इसे आइसलैंड का निर्णायक EU-समर्थक बदलाव कहना जल्दबाजी होगी। अलग-अलग सवालों की भाषा और अनिर्णीत मतदाताओं को शामिल करने के तरीके से आंकड़े बदलते हैं, इसलिए किसी एक निश्चित प्रतिशत को अंतिम तस्वीर मानने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।
EEA की सदस्यता के कारण आइसलैंड 1994 से EU के एकल बाजार में बड़े पैमाने पर भाग लेता है और मुक्त आवाजाही समेत EU से जुड़े अनेक नियम लागू करता है।
आइसलैंड शेंगेन क्षेत्र में भी शामिल है, इसलिए वहां से शेंगेन क्षेत्र के अन्य देशों में पासपोर्ट-मुक्त यात्रा संभव है।
लेकिन EEA, EU की पूर्ण सदस्यता के बराबर नहीं है। आइसलैंड:
पूर्ण सदस्यता से EU संस्थानों में प्रतिनिधित्व और वोटिंग अधिकार, EU बजट में योगदान, साझा बाहरी व्यापार नीति तथा साझा कृषि नीति और साझा मत्स्य नीति लागू होने जैसी व्यवस्थाएं सामने आएंगी।
समर्थकों का कहना है कि आइसलैंड EEA के जरिए EU के अनेक नियम अपनाता है, लेकिन उन्हें बनाने की प्रक्रिया में उसका सीधा वोट नहीं है। सदस्यता से वह नियमों का केवल पालन करने वाले देश से बदलकर उन्हें तय करने वाली संस्थाओं में प्रतिनिधित्व रखने वाला देश बन सकता है।
उनके अनुसार, अस्थिर उत्तर अटलांटिक माहौल में EU आइसलैंड को बड़ा राजनीतिक और आर्थिक आधार दे सकता है। वार्ताओं में देश की विशिष्ट अर्थव्यवस्था के लिए विशेष व्यवस्थाएं तलाशने का अवसर भी मिलेगा।
समर्थक यह भी कहते हैं कि असली शर्तें केवल बातचीत से ही स्पष्ट हो सकती हैं। मछली पालन, कृषि, मुद्रा, बजट योगदान और आर्थिक नियमों पर समझौता कैसा होगा, यह पहले से तय नहीं है। इसलिए वार्ता शुरू करने को वे अंतिम सदस्यता निर्णय नहीं, बल्कि जानकारी हासिल करने का चरण मानते हैं।
विरोधियों का तर्क है कि आइसलैंड को पहले ही एकल बाजार का बड़ा व्यावसायिक लाभ मिल रहा है, जबकि पूर्ण सदस्यता से राजनीतिक और आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्हें EU बजट में संभावित शुद्ध योगदान और घरेलू नियमों व आर्थिक नीति पर कम नियंत्रण की चिंता है।
EU सदस्यता का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह होगा कि आइसलैंड अपनी स्वतंत्र बाहरी व्यापार नीति खो देगा, क्योंकि व्यापार नीति EU के अधिकार क्षेत्र में आती है। इसका अर्थ है कि देश अपने स्तर पर व्यापार समझौते करने की मौजूदा स्वतंत्रता नहीं रख पाएगा।
किसानों को EU से आने वाले कृषि उत्पादों की अधिक प्रतिस्पर्धा और घरेलू सुरक्षा उपायों पर दबाव का डर है। यही संवेदनशीलता बताती है कि पहली सदस्यता प्रक्रिया में कृषि अध्याय क्यों नहीं खोला गया था।
लेकिन सबसे बड़ी आपत्ति मछली पालन को लेकर है। आइसलैंड के लिए मछली भंडार आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ राष्ट्रीय पहचान और संप्रभुता का भी प्रतीक है। आलोचकों को डर है कि साझा मत्स्य नीति के तहत कोटा तय करने और मछली पकड़ने की पहुंच से जुड़े फैसले EU ढांचे में चले जाएंगे।
मैकेरल इस पूरे विवाद का प्रतीक बन चुका है। मछलियों के झुंड के क्षेत्रीय वितरण में बदलाव और उसके बाद कोटा को लेकर हुए विवादों ने इसे आइसलैंड-EU संबंधों का खासा संवेदनशील मुद्दा बना दिया था।
विरोधियों को आशंका है कि EU के जहाजों को आइसलैंड के जलक्षेत्र में पहुंच मिल सकती है और देश द्वारा स्वतंत्र रूप से तय किए जाने वाले पकड़ कोटे साझा मत्स्य नीति से सीमित हो सकते हैं।
समर्थकों का कहना है कि सदस्यता वार्ताओं में अस्थायी या विशेष सुरक्षा प्रबंधों पर बातचीत की जा सकती है। लेकिन यह अभी एक संभावित लक्ष्य है, पक्की गारंटी नहीं।
आइसलैंड की विदेश मंत्री Þorgerður Katrín Gunnarsdóttir ने सरकार का रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि किसी भी समझौते में आइसलैंड अपने सभी मत्स्य संसाधनों पर “संप्रभु नियंत्रण” की मांग करेगा।
आइसलैंड सरकार इस मतदान को दो चरणों वाली लोकतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में पेश कर रही है: पहले वार्ता की अनुमति, फिर अंतिम सदस्यता समझौते पर जनता का फैसला।
EU समर्थक नेता इस बात पर जोर देते हैं कि ‘हां’ वोट EU में शामिल होने का अपरिवर्तनीय निर्णय नहीं होगा। दूसरी ओर, संदेहवादी नेताओं का कहना है कि वार्ता दोबारा शुरू होने से सदस्यता के पक्ष में राजनीतिक गति बनेगी और देश के मूल राष्ट्रीय हित बातचीत की मेज पर आ जाएंगे।
EU की विस्तार आयुक्त मार्ता कोस ने कहा है कि सदस्यता वार्ताओं के दौरान मछली पालन पर “रचनात्मक समाधान” खोजे जा सकते हैं। हालांकि उन्होंने आइसलैंड की मांगों को पहले से स्वीकार करने का कोई वादा नहीं किया है।
ब्रसेल्स सार्वजनिक रूप से सावधानी बरत रहा है और ऐसा नहीं दिखाना चाहता कि वह आइसलैंड के मतदान में हस्तक्षेप कर रहा है। फिर भी EU के अधिकारी सकारात्मक परिणाम को एक संभावित सफलता के रूप में देखते हैं—खासकर ऐसे समय में जब अन्य देशों में विस्तार प्रक्रिया कठिन बनी हुई है।
अंततः 29 अगस्त का सवाल सरल है, लेकिन उसके पीछे बहस गहरी है: क्या आइसलैंड यूरोप के साथ अपने संबंधों को मौजूदा आर्थिक एकीकरण से आगे ले जाकर राजनीतिक सदस्यता की संभावनाओं को परखना चाहता है, या फिर मछली, व्यापार और राष्ट्रीय नियंत्रण पर अपनी मौजूदा स्वतंत्रता को प्राथमिकता देगा?