यहां जानिए अदालत ने क्या फैसला सुनाया, उसके पीछे क्या कानूनी कारण थे, मैक्रों ने क्या प्रतिक्रिया दी, और यह पूरा मामला दुनिया भर में युवाओं पर सोशल मीडिया प्रतिबंधों की चल रही बहस में कहां फिट बैठता है।
संवैधानिक परिषद ने इस कानून को पूरी तरह से अवरुद्ध कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह प्रतिबंध इतना व्यापक (blanket ban) था कि इसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किए बिना लागू नहीं किया जा सकता । अदालत ने यह भी कहा कि प्रस्तावित विधेयक में प्रत्येक नाबालिग की व्यक्तिगत स्थिति या प्रत्येक प्लेटफॉर्म के विशिष्ट जोखिमों पर विचार नहीं किया गया था ।
यह विधेयक 21 जुलाई 2026 को फ्रांस की संसद द्वारा पारित किया गया था, जिसमें नेशनल असेंबली ने 279 वोटों के मुकाबले 81 वोटों से और सीनेट ने 243 वोटों के मुकाबले सिर्फ 2 वोटों से इसे मंजूरी दी थी ।
अदालत ने माना कि 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को ऑनलाइन सेवाओं तक पहुंचने से रोकना उनके संवैधानिक रूप से संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है । संवैधानिक परिषद ने स्पष्ट कहा कि यह प्रतिबंध "अभिव्यक्ति और संचार की स्वतंत्रता का हनन किए बिना नाबालिगों को सोशल मीडिया से पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं कर सकता" ।
कानून के अनुसार, सोशल मीडिया का उपयोग करने से पहले हर व्यक्ति को, चाहे वह वयस्क ही क्यों न हो, अपनी आयु साबित करनी होती । परिषद ने इसे सभी उपयोगकर्ताओं, न कि केवल नाबालिगों के लिए निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक असंगत उल्लंघन पाया ।
अपने फैसले में अदालत ने कहा: "पंद्रह वर्ष से कम आयु के नाबालिगों को कुछ ऑनलाइन सेवाओं तक पहुंचने से प्रतिबंधित करके, कानून स्वाभाविक रूप से प्रत्येक व्यक्ति, यहां तक कि एक वयस्क को भी, उन सेवाओं तक पहुंचने से पहले अपनी आयु साबित करने के लिए बाध्य करता है" । परिषद ने निष्कर्ष निकाला कि विधायिका "यह निर्दिष्ट करने में विफल रही कि ऐसा प्रमाण किन परिस्थितियों और सीमाओं के तहत प्रदान किया जाना चाहिए" और निजता आवश्यकताओं के अनुपालन के लिए आवश्यक कानूनी सुरक्षा उपाय स्थापित नहीं किए ।
परिषद ने फैसला सुनाया कि यह विधेयक प्रत्येक नाबालिग की व्यक्तिगत स्थिति या प्रत्येक प्लेटफॉर्म के विशिष्ट जोखिमों पर विचार करने के लिए बहुत व्यापक था । एक सीएनएन रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने कहा कि प्रतिबंध "बहुत व्यापक है और लोगों की निजता में हस्तक्षेप किए बिना इसे लागू नहीं किया जा सकता" ।
फैसले के तुरंत बाद, राष्ट्रपति मैक्रों ने अपनी सरकार को कानून दोबारा लिखने का आदेश दिया। इतालवी प्रेस रिपोर्टों के अनुसार, मैक्रों के कार्यालय ने कहा कि इस वर्ष के वसंत तक एक नया और संवैधानिक रूप से अनुपालन योग्य समाधान तैयार किया जाना चाहिए । मैक्रों ने प्रधान मंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू को विधेयक में संशोधन करने का काम सौंपा, जिसका लक्ष्य 2027 के राष्ट्रपति चुनावों से पहले इसे लागू करना है ।
इससे पहले, मैक्रों ने संसद में विधेयक पारित होने पर इसे "एक बड़ा कदम" बताते हुए कहा था कि "फ्रांस अपने बच्चों और किशोरों की रक्षा करने के मामले में यूरोप में अग्रणी है" ।
फ्रांस में यह झटका ऐसे समय आया है जब दुनिया भर में युवाओं के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधों को लेकर एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रयास चल रहा है:
ऑस्ट्रेलिया – दुनिया का पहला देश बन गया जिसने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए पूर्ण प्रतिबंध लागू किया। Online Safety Amendment (Social Media Minimum Age) Act 2024 के तहत यह प्रतिबंध 10 दिसंबर, 2025 से प्रभावी हुआ, जो TikTok, Instagram, Facebook, YouTube, Snapchat, Reddit और X सहित प्रमुख प्लेटफार्मों पर लागू होता है ।
यूनाइटेड किंगडम – जून 2026 में, ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि वह ऑस्ट्रेलिया के मॉडल पर 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध लागू करेगी ।
यूरोपीय परिदृश्य – फ्रांस का विधेयक किसी यूरोपीय संघ सदस्य राज्य द्वारा पारित पहला ऐसा प्रतिबंध था। इसका संवैधानिक पतन अब यह स्पष्ट करता है कि यूरोप में, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा मजबूत है, इस तरह के कानूनों को न्यायिक समीक्षा में बचने के लिए कैसे तैयार किया जाना चाहिए ।
मुख्य तनाव – इन सभी प्रयासों के पीछे मुख्य कानूनी चुनौती बाल संरक्षण के लक्ष्यों को मौलिक अधिकारों के साथ संतुलित करना है। ऑस्ट्रेलिया के प्रतिबंध की भी इसी तरह आलोचना हुई है, लेकिन अभी तक किसी समान संवैधानिक निकाय ने इसे खारिज नहीं किया है। फ्रांस का फैसला संकेत करता है कि पूर्ण प्रतिबंध और सार्वभौमिक आयु-सत्यापन को यूरोपीय मानवाधिकार ढांचे के तहत कड़ी कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है ।
यहां जानिए अदालत ने क्या फैसला सुनाया, उसके पीछे क्या कानूनी कारण थे, मैक्रों ने क्या प्रतिक्रिया दी, और यह पूरा मामला दुनिया भर में युवाओं पर सोशल मीडिया प्रतिबंधों की चल रही बहस में कहां फिट बैठता है।
संवैधानिक परिषद ने इस कानून को पूरी तरह से अवरुद्ध कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह प्रतिबंध इतना व्यापक (blanket ban) था कि इसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किए बिना लागू नहीं किया जा सकता । अदालत ने यह भी कहा कि प्रस्तावित विधेयक में प्रत्येक नाबालिग की व्यक्तिगत स्थिति या प्रत्येक प्लेटफॉर्म के विशिष्ट जोखिमों पर विचार नहीं किया गया था ।
यह विधेयक 21 जुलाई 2026 को फ्रांस की संसद द्वारा पारित किया गया था, जिसमें नेशनल असेंबली ने 279 वोटों के मुकाबले 81 वोटों से और सीनेट ने 243 वोटों के मुकाबले सिर्फ 2 वोटों से इसे मंजूरी दी थी ।
अदालत ने माना कि 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को ऑनलाइन सेवाओं तक पहुंचने से रोकना उनके संवैधानिक रूप से संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है । संवैधानिक परिषद ने स्पष्ट कहा कि यह प्रतिबंध "अभिव्यक्ति और संचार की स्वतंत्रता का हनन किए बिना नाबालिगों को सोशल मीडिया से पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं कर सकता" ।
कानून के अनुसार, सोशल मीडिया का उपयोग करने से पहले हर व्यक्ति को, चाहे वह वयस्क ही क्यों न हो, अपनी आयु साबित करनी होती । परिषद ने इसे सभी उपयोगकर्ताओं, न कि केवल नाबालिगों के लिए निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक असंगत उल्लंघन पाया ।
अपने फैसले में अदालत ने कहा: "पंद्रह वर्ष से कम आयु के नाबालिगों को कुछ ऑनलाइन सेवाओं तक पहुंचने से प्रतिबंधित करके, कानून स्वाभाविक रूप से प्रत्येक व्यक्ति, यहां तक कि एक वयस्क को भी, उन सेवाओं तक पहुंचने से पहले अपनी आयु साबित करने के लिए बाध्य करता है" । परिषद ने निष्कर्ष निकाला कि विधायिका "यह निर्दिष्ट करने में विफल रही कि ऐसा प्रमाण किन परिस्थितियों और सीमाओं के तहत प्रदान किया जाना चाहिए" और निजता आवश्यकताओं के अनुपालन के लिए आवश्यक कानूनी सुरक्षा उपाय स्थापित नहीं किए ।
परिषद ने फैसला सुनाया कि यह विधेयक प्रत्येक नाबालिग की व्यक्तिगत स्थिति या प्रत्येक प्लेटफॉर्म के विशिष्ट जोखिमों पर विचार करने के लिए बहुत व्यापक था । एक सीएनएन रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने कहा कि प्रतिबंध "बहुत व्यापक है और लोगों की निजता में हस्तक्षेप किए बिना इसे लागू नहीं किया जा सकता" ।
फैसले के तुरंत बाद, राष्ट्रपति मैक्रों ने अपनी सरकार को कानून दोबारा लिखने का आदेश दिया। इतालवी प्रेस रिपोर्टों के अनुसार, मैक्रों के कार्यालय ने कहा कि इस वर्ष के वसंत तक एक नया और संवैधानिक रूप से अनुपालन योग्य समाधान तैयार किया जाना चाहिए । मैक्रों ने प्रधान मंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू को विधेयक में संशोधन करने का काम सौंपा, जिसका लक्ष्य 2027 के राष्ट्रपति चुनावों से पहले इसे लागू करना है ।
इससे पहले, मैक्रों ने संसद में विधेयक पारित होने पर इसे "एक बड़ा कदम" बताते हुए कहा था कि "फ्रांस अपने बच्चों और किशोरों की रक्षा करने के मामले में यूरोप में अग्रणी है" ।
फ्रांस में यह झटका ऐसे समय आया है जब दुनिया भर में युवाओं के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधों को लेकर एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रयास चल रहा है:
ऑस्ट्रेलिया – दुनिया का पहला देश बन गया जिसने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए पूर्ण प्रतिबंध लागू किया। Online Safety Amendment (Social Media Minimum Age) Act 2024 के तहत यह प्रतिबंध 10 दिसंबर, 2025 से प्रभावी हुआ, जो TikTok, Instagram, Facebook, YouTube, Snapchat, Reddit और X सहित प्रमुख प्लेटफार्मों पर लागू होता है ।
यूनाइटेड किंगडम – जून 2026 में, ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि वह ऑस्ट्रेलिया के मॉडल पर 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध लागू करेगी ।
यूरोपीय परिदृश्य – फ्रांस का विधेयक किसी यूरोपीय संघ सदस्य राज्य द्वारा पारित पहला ऐसा प्रतिबंध था। इसका संवैधानिक पतन अब यह स्पष्ट करता है कि यूरोप में, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा मजबूत है, इस तरह के कानूनों को न्यायिक समीक्षा में बचने के लिए कैसे तैयार किया जाना चाहिए ।
मुख्य तनाव – इन सभी प्रयासों के पीछे मुख्य कानूनी चुनौती बाल संरक्षण के लक्ष्यों को मौलिक अधिकारों के साथ संतुलित करना है। ऑस्ट्रेलिया के प्रतिबंध की भी इसी तरह आलोचना हुई है, लेकिन अभी तक किसी समान संवैधानिक निकाय ने इसे खारिज नहीं किया है। फ्रांस का फैसला संकेत करता है कि पूर्ण प्रतिबंध और सार्वभौमिक आयु-सत्यापन को यूरोपीय मानवाधिकार ढांचे के तहत कड़ी कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है ।