तेहरान की प्रतिक्रिया एक समान नहीं थी। विभिन्न अधिकारियों और मीडिया ने पहले दिनों में विरोधाभासी संकेत भेजे।
विदेश मंत्री अब्बास अराघ्ची ने 7 अगस्त को समझौते का स्वागत किया। उन्होंने मुस्लिम देशों से एकता और आत्मनिर्भरता का आह्वान किया। उन्होंने ईरान के सशस्त्र बलों की भी प्रशंसा की और इसे क्षेत्रीय आत्म-निर्भरता के व्यापक आह्वान से जोड़ा ।
हालांकि, हस्ताक्षर के कुछ घंटों के भीतर ही ईरानी सांसद इब्राहिम रजाई, जो संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के सदस्य हैं, ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने समझौते को 'कागजी समझौता' करार देते हुए कहा कि इससे सऊदी अरब को सुरक्षा नहीं मिलेगी, बल्कि रियाद को अपनी नीतियां बदलनी चाहिए ।
10 अगस्त तक सरकारी लहजा नरम हो गया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने संवाददाताओं से कहा कि तेहरान को 'कोई चिंता नहीं है कि यह संधि ईरान के खिलाफ है' और इसे मुस्लिम एकता की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह संधि इस बात का सबूत है कि मध्य पूर्व के देशों ने समझ लिया है कि 'सुरक्षा कोई वस्तु नहीं है जिसे झूठे सुरक्षा दलालों से खरीदा जा सकता है' ।
सबसे कड़ी चेतावनी ईरान के कट्टरपंथी अखबार कायहान ने 10 अगस्त को जारी की। अखबार ने स्पष्ट लाल रेखा खींची: यदि इस संधि का इस्तेमाल ईरान-समर्थित समूहों, जिसमें यमन के हूती भी शामिल हैं, के खिलाफ किया गया तो युद्ध के मैदान में 'निर्णायक जवाब' दिया जाएगा ।
ईरानी राज्य मीडिया ने समझौते को अलग नजरिए से देखा। उसने इसे 'ग्रेटर इज़राइल के खिलाफ गठबंधन' और अमेरिका-प्रभुत्व वाली सुरक्षा व्यवस्था से हटने का संकेत बताया ।
कुल मिलाकर, ईरान का आधिकारिक रुख इस संधि को गैर-धमकी भरा बताने वाला था, जबकि कट्टरपंथी आवाजें तीखी आलोचनात्मक थीं। विश्लेषकों ने कहा कि ईरान में कई लोग मानते हैं कि यह गठबंधन तेहरान को भी निशाना बनाता है ।
मक्का संयुक्त रक्षा समझौता एक साल पहले सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए द्विपक्षीय समझौते का विस्तार है, जिसमें अब तुर्की भी शामिल हो गया है । इसकी प्रमुख बातें इस प्रकार हैं:
अंकारा और इस्लामाबाद दोनों ने सार्वजनिक बयानों में स्पष्ट किया कि यह संधि ईरान या किसी विशिष्ट देश के खिलाफ नहीं है।