तस्वीरों में सर्वव्यापी मैग्नेटाइज्ड केल्विन-हेल्महोल्ट्ज़ इंस्टेबिलिटीज (KHI) दिखाई दीं । KHI एक क्लासिकल द्रव-गतिकी (fluid dynamics) की घटना है, जो तब होती है जब अलग-अलग गति से बहने वाली प्लाज्मा की परतें एक-दूसरे से रगड़ खाकर लहरदार और फिर घूमते हुए भंवर पैटर्न बनाती हैं। पहले SMI की मौजूदगी के केवल अस्थायी संकेत मिले थे, लेकिन अब ये भंवर पूरे दृश्य क्षेत्र में, चुंबकीय फ्लक्स सांद्रता की सीमाओं पर, बड़ी संख्या में देखे गए । ये भंवर लगभग 19 से 170 किलोमीटर चौड़े हैं ।
यह सूरज के फोटोस्फीयर पर केल्विन-हेल्महोल्ट्ज़ इंस्टेबिलिटी का पहला प्रत्यक्ष अवलोकन प्रमाण है, जो लंबे समय से चली आ रही एक सैद्धांतिक भविष्यवाणी की पुष्टि करता है । शोधकर्ताओं ने इन तस्वीरों की तुलना उच्च-रिज़ॉल्यूशन मैग्नेटोहाइड्रोडायनामिक (MHD) सिमुलेशन से की, जिसमें बिल्कुल वैसा ही फ्रिंज-टू-वोर्टेक्स व्यवहार और स्पेसिंग दिखा, जिससे यह पुष्टि हुई कि ये पैटर्न वास्तविक KHI हैं न कि कोई छवि दोष ।
सूरज की सतह (फोटोस्फीयर) का तापमान लगभग 5,500°C होता है, लेकिन इसका बाहरी वायुमंडल (कोरोना) लाखों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। दशकों से यह 'कोरोनल हीटिंग प्रॉब्लम' (Coronal Heating Problem) सौर भौतिकी के सबसे बड़े अनसुलझे सवालों में से एक था । इस खोज ने इसका एक नया और ठोस तंत्र प्रदान किया है:
संक्षेप में, यह खोज एक पहले से अदृश्य, निरंतर तंत्र - छोटे पैमाने पर KHI भंवर जो पूरी सौर सतह को कवर करते हैं - की पहचान करती है जो कोरोना को गर्म करने के लिए आवश्यक लापता ऊर्जा की व्याख्या कर सकता है। यह उस रहस्य को सुलझाने में मदद कर सकता है जिसने विज्ञान की पीढ़ियों को हैरान कर रखा था ।