यह अमेरिकी-इजरायली अभियान 28 फरवरी 2026 को रात 1:15 बजे (अमेरिकी समय) शुरू हुआ, जब अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने ईरानी ठिकानों पर हमले शुरू किए । आधिकारिक उद्देश्य थे: ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता और उत्पादन को नष्ट करना, और ईरानी शासन की सुरक्षा व्यवस्था को तहस-नहस करना ।
इजरायल ने अपना समानांतर अभियान कोड-नेम 'ऑपरेशन रोअरिंग लायन' के तहत चलाया। इजरायली अधिकारियों ने इसे अपने वायुसेना के इतिहास का सबसे बड़ा परिचालन अभियान बताया, जिसमें लगभग 200 युद्धक विमानों ने करीब 500 ठिकानों को निशाना बनाया ।
पहले ही हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनई सहित कई शीर्ष अधिकारी मारे गए । इसके जवाब में ईरान ने 'ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस IV' के तहत सैकड़ों मिसाइलों और हजारों ड्रोनों से जवाबी हमला किया । पहले दस दिनों में ही अमेरिका और इजरायल ने सामूहिक रूप से 15,000 से अधिक ईरानी ठिकानों पर हमला किया। 13 मार्च को पेंटागन की ब्रीफिंग में कहा गया कि ईरान का मिसाइल प्रक्षेपण 90 प्रतिशत और ड्रोन हमले 80 प्रतिशत तक कम हो गए थे ।
विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने 5 मई 2026 को घोषणा की कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के बाद समाप्त हो गया है, और वाशिंगटन अब "शांति का रास्ता" अपनाना चाहता है । ब्रिटानिका ने भी ऑपरेशन के 5 मई को समाप्त होने की पुष्टि की है ।
जून 2026 के अंत तक - जब अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रारंभिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हो चुका था - उपराष्ट्रपति वेंस और विदेश मंत्री रुबियो के बीच एक स्पष्ट वैचारिक विभाजन उभर कर सामने आया ।
जे.डी. वेंस का पक्ष: वेंस ने ईरान के साथ शांति समझौते का बचाव करते हुए मीडिया में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने इसे "अच्छी प्रगति" बताया और इस बात पर जोर दिया कि अंतिम समझौते के लिए एक "सत्यापनीय ढांचा" तैयार है । उन्होंने बेरूत में हिजबुल्लाह ठिकानों पर इजरायली हमलों की खुले तौर पर आलोचना की, बताई गई नागरिक हताहतों को "अस्वीकार्य" करार दिया और चेतावनी दी कि इस तरह की बढ़ोत्तरी से चल रहे कूटनीतिक प्रयासों को नुकसान पहुंच सकता है ।
मार्को रुबियो का पक्ष: रुबियो ने यह रुख अपनाया कि इजरायल को अपनी सुरक्षा का पूरा अधिकार है और वे इजरायल और लेबनान के बीच एक अलग समझौता करने में जुटे रहे, जिसका उद्देश्य हिजबुल्लाह पर नकेल कसना और दक्षिणी लेबनान से इजरायली सेना को वापस बुलाना था । वे अधिक हॉकिश (युद्धोन्मुख) रुख पर कायम रहे और इजरायली कार्रवाइयों की आलोचना करने से बचते हुए ईरानी सरकार पर हमलावर रहे ।
दरार की जड़: ये दोनों नेता रिपब्लिकन पार्टी के दो प्रतिस्पर्धी विदेश नीति विचारधाराओं से आते हैं। वेंस संशयवादी, संयम-उन्मुख (restraint-oriented) विचारधारा के प्रतिनिधि हैं, जबकि रुबियो हस्तक्षेपवादी, इजरायल-समर्थक प्रतिष्ठान (establishment) विंग से जुड़े हैं । यह विभाजन 2028 के रिपब्लिकन राष्ट्रपति पद के नामांकन के लिए जल्दी शुरू हो चुकी राजनीतिक दौड़ को भी दर्शाता है। वेंस, जो इस दौड़ में फिलहाल आगे हैं, सक्रिय संघर्ष के दौरान युद्ध पर खुद को खुलकर नहीं बोलते थे, लेकिन अब शांति के उम्मीदवार के रूप में उभरे हैं ।
अमेरिकी-इजरायल युद्ध ने ईरान पर अपने तत्काल सैन्य लक्ष्यों को एक उल्लेखनीय रूप से कम समय में हासिल कर लिया, लेकिन कूटनीतिक और राजनीतिक परिणाम कहीं अधिक जटिल साबित हो रहे हैं। प्रशासन अब एक विरोधाभासी नीति का संचालन कर रहा है - एक तरफ वेंस तेहरान के साथ तनाव कम करने (détente) की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ रुबियो इजरायल और खाड़ी देशों के साथ गठबंधन के जरिए ईरान के प्रभाव को सीमित करने में लगे हैं। ये प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोण, हिजबुल्लाह, ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और महत्वपूर्ण वैश्विक शिपिंग मार्गों की अनसुलझी स्थिति के साथ मिलकर इस क्षेत्र को अस्थिर बनाए हुए हैं। पर्यवेक्षकों के लिए, वेंस-रुबियो विभाजन सिर्फ वाशिंगटन का एक सत्ता संघर्ष नहीं है, बल्कि मध्य पूर्व में अमेरिकी शक्ति की दो मौलिक रूप से भिन्न दृष्टियों की एक झलक है।