कई प्रमुख फसलों की पैदावार 30°C से ऊपर घटने लगती है। सूअर और मुर्गियों जैसे पशु इससे भी कम तापमान पर गर्मी के तनाव का शिकार हो सकते हैं, जिससे उनकी वृद्धि और दूध उत्पादन प्रभावित होता है; गंभीर मामलों में अंगों के काम करना बंद करने का जोखिम रहता है ।
समुद्र में गर्म पानी घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा कम कर सकता है। इससे मछलियों की सांस लेने की क्षमता पर दबाव पड़ता है और वे हृदयाघात जैसी स्थिति का सामना कर सकती हैं ।
दक्षिण कोरिया इस समय करीब 40°C तक पहुंचने वाले महसूस किए गए तापमान वाली रिकॉर्ड गर्मी का सामना कर रहा है । इसका असर सीधे बाजार और घर के बजट पर दिख रहा है:
दक्षिण कोरियाई मीडिया और सरकारी बयानों में इन घटनाओं के लिए ‘हीटफ्लेशन’ शब्द का इस्तेमाल अब नियमित रूप से हो रहा है ।
जून 2026 में यूरोप में आई भीषण गर्मी से गेहूं, जौ, मक्का और जई समेत अनुमानित 1 करोड़ टन अनाज की फसल नष्ट हुई। अनाज और तिलहन व्यापार से जुड़ी यूरोपीय संस्था Coceral के अनुसार, किसानों को करीब €2 अरब के राजस्व का नुकसान हुआ ।
यूरोपीय संघ के 27 देशों और ब्रिटेन की कुल फसल अब गर्मी से पहले लगाए गए अनुमान से 90 लाख टन कम रहने की संभावना है। यह 2018 के बाद सबसे छोटी फसल हो सकती है ।
यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) के शोध के मुताबिक, 2022 की गर्मियों की चरम गर्मी ने यूरोप की खाद्य महंगाई में 0.67 प्रतिशत अंक जोड़े थे। 2035 तक तापमान बढ़ने की स्थिति में ऐसे ही मौसमीय झटकों का असर 50% तक अधिक हो सकता है ।
यूरो क्षेत्र में खाद्य महंगाई 2025 में औसतन 2.9% रही, जो महामारी से पहले के 2.2% के दीर्घकालिक औसत से अब भी अधिक थी । Oxford Economics के आकलन में यूरोप की इस गर्मी की लहरें अगले साल खाद्य कीमतों पर ईरान में चल रहे युद्ध से भी ज्यादा ऊपर की ओर दबाव डाल सकती हैं। उसके आधार पर यूरो क्षेत्र की खाद्य महंगाई जून 2026 के 1.5% से बढ़कर 2027 में करीब 3% हो सकती है ।
मौजूदा गर्मी के संकट के ऊपर अब अल नीनो का खतरा भी मंडरा रहा है। यह मौसमीय घटना मई-जून 2026 में उभरी और कुछ वैज्ञानिक इसे ‘सुपर अल नीनो’ कह रहे हैं। अमेरिकी Climate Prediction Center के अनुसार, वर्ष के अंत तक इसके ‘बहुत मजबूत’ या ‘सुपर’ अल नीनो बनने की संभावना 81% है । इसके उत्तरी गोलार्ध की सर्दियों में चरम पर पहुंचने और 2027 तक जारी रहने की आशंका है ।
अर्थशास्त्रियों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कई चेतावनियां दी हैं:
सबसे बड़ी चिंता यह है कि एक ही समय में कई झटके एक-दूसरे पर असर डाल रहे हैं। अत्यधिक गर्मी और अल नीनो के साथ ईरान तथा यूक्रेन के युद्धों से ऊर्जा और उर्वरक महंगे हो रहे हैं। इससे खेती की लागत बढ़ती है और परिवहन, भंडारण तथा खाद्य प्रसंस्करण भी महंगा होता है।
Bloomberg के विश्लेषण के अनुसार, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के उभरते बाजारों को महंगे तेल आयात, दबाव में आई आपूर्ति शृंखलाओं और अल नीनो से अनिश्चित बारिश तथा गर्मी—तीनों का सामना करना पड़ सकता है । विश्व बैंक ने भी चेताया है कि अल नीनो, ऊर्जा और उर्वरक लागत, जैव ईंधन की बढ़ती मांग तथा संभावित व्यापार प्रतिबंध खाद्य कीमतों को मौजूदा अनुमानों से काफी ऊपर ले जा सकते हैं ।
Schroders की एक रिपोर्ट के अनुसार, मई 2026 के अंत तक अमेरिका के आधे से अधिक हिस्से में सूखे की स्थिति थी और करीब 25 करोड़ एकड़ कृषि भूमि प्रभावित हुई थी। इससे वैश्विक खाद्य कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है ।
विश्व बैंक ने यह भी अनुमान लगाया है कि अल नीनो लंबे समय तक रहने पर प्रभावित क्षेत्रों में चावल का उत्पादन 20% से 50% तक घट सकता है। दक्षिण एशिया, दक्षिणी अफ्रीका और पूर्वी एशिया के कुछ हिस्से सबसे अधिक जोखिम में हैं ।
‘हीटफ्लेशन’ कोई सैद्धांतिक शब्द भर नहीं है। दक्षिण कोरिया में खीरे और अन्य सब्जियों की कीमतों से लेकर यूरोप के अनाज नुकसान और मछली पालन संकट तक, चरम गर्मी का असर उपभोक्ताओं और किसानों दोनों पर पड़ रहा है।
अगर शक्तिशाली अल नीनो, युद्धों से बढ़ी ऊर्जा-उर्वरक लागत और कमजोर आपूर्ति शृंखलाएं एक साथ बनी रहती हैं, तो वैश्विक खाद्य महंगाई 2026 के अंत से 2028 तक तेज रह सकती है। इसका सबसे भारी बोझ उन परिवारों पर पड़ेगा जिनकी आय का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा के भोजन पर खर्च होता है।