पक्षियों के जीनोम में कई बेहद छोटे माइक्रोक्रोमोसोम होते हैं। इनमें कुछ और भी छोटे “डॉट क्रोमोसोम” शामिल हैं। साथ ही, इनके डीएनए में दोहराए जाने वाले अनुक्रमों की लंबी श्रृंखलाएं होती हैं। सामान्य short-read sequencing तकनीक इन दोहरावों को सही क्रम में पढ़ने में अक्सर असफल रहती है ।
ज़ेब्रा फिंच के 11 सबसे छोटे गुणसूत्रों को पहले पूरी तरह असेंबल करना संभव नहीं हो पाया था। इसलिए पुराने जीनोम संदर्भों में कई खाली हिस्से थे और यह पता लगाना मुश्किल था कि किसी जीन का वास्तव में पक्षी में अभाव है या वह केवल अधूरे मानचित्र के कारण दिखाई नहीं दे रहा ।
रॉकफेलर टीम ने एरिख जार्विस की प्रयोगशाला के नेतृत्व में PacBio HiFi और Oxford Nanopore जैसी long-read sequencing तकनीकों को मिलाकर काम किया । दोहराए जाने वाले डीएनए के कारण sequencing मशीनों के छिद्र रुक जाते थे। इसे दूर करने के लिए टीम ने रन के दौरान इन छिद्रों को बार-बार साफ करने की प्रक्रियाएं विकसित कीं। इसके बाद शोधकर्ताओं ने हर गुणसूत्र की मैन्युअल समीक्षा कर बचे हुए अंतराल बंद किए ।
पूर्ण असेंबली में 2,710 पहले से अज्ञात जीन मिले। इनमें 972 ऐसे जीन हैं जो प्रोटीन बनाने के निर्देश देते हैं ।
एक उल्लेखनीय उदाहरण तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संचार में शामिल जीन का है। वैज्ञानिकों को लगता था कि यह जीन ज़ेब्रा फिंच में मौजूद ही नहीं है। लेकिन वह वास्तव में गुणसूत्र 31 पर छिपा था—एक ऐसा छोटा और अत्यधिक दोहराव वाला गुणसूत्र, जिसे पहले पूरी तरह पढ़ना संभव नहीं हुआ था ।
शोधकर्ताओं ने मादा पक्षियों में पाए जाने वाले W सेक्स गुणसूत्र को भी पूरा मानचित्रित किया। इसके लगभग 83% हिस्से में दोहराया जाने वाला डीएनए है और इसके अनुक्रम का करीब एक-तिहाई हिस्सा पहले कभी असेंबल नहीं हुआ था ।
Z और W सेक्स गुणसूत्रों पर ऐसे जीन अपेक्षाकृत अधिक पाए जाते हैं, जो स्वर-अधिगम में नर-मादा के अंतर से जुड़े हो सकते हैं और जिनका संबंध एस्ट्रोजन नियंत्रण से बताया गया है। अब पूर्ण जीनोम के कारण इन जीनों की व्यवस्थित जांच की जा सकेगी ।
अध्ययन का एक अप्रत्याशित निष्कर्ष सेंترोमियर से जुड़ा है। सेंترोमियर वह संरचना है, जो कोशिका विभाजन के दौरान बहन क्रोमैटिड्स को साथ रखने में मदद करती है।
टीम ने ज़ेब्रा फिंच के हर गुणसूत्र के सेंترोमियर में 716 बेस-पेयर वाला एक दोहराव पाया। इसमें ऐसे मोटिफ मौजूद हैं, जो मानव CENP-B प्रोटीन के docking site से काफी मिलते-जुलते हैं । शोधकर्ताओं ने उसी प्राचीन mobile DNA परिवार से जुड़े एक संभावित binding protein की पहचान की, जिसने स्तनधारियों में CENP-B को जन्म दिया था। इससे संकेत मिलता है कि पक्षियों और स्तनधारियों के सेंترोमियर की संरचना पहले की अपेक्षा अधिक व्यवस्थित और साझा विकासवादी इतिहास वाली हो सकती है ।
माइक्रोक्रोमोसोम की संरचना भी महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इनमें कशेरुकी जीनोम की बहुत पुरानी, यानी ancestral, बनावट की झलक मिल सकती है। इससे करोड़ों वर्षों में जीनोम के विकास को समझने में मदद मिलेगी ।
ज़ेब्रा फिंच अपनी आवाज़ सुनकर और उसकी नकल करके गीत सीखता है। यही क्षमता इसे स्वर-अधिगम और भाषा के जैविक आधार का अध्ययन करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण पशु मॉडल्स में से एक बनाती है ।
इस पूर्ण जीनोम के साथ ज़ेब्रा फिंच मनुष्यों के बाद पूर्ण संदर्भ जीनोम वाला केवल दूसरा स्वर-अधिगम करने वाला जीव बन गया है ।
रॉकफेलर यूनिवर्सिटी की Laboratory of Neurogenetics of Language के प्रमुख एरिख जार्विस ने कहा कि यदि कोई महत्वपूर्ण अणु स्वर सीखने वाली और स्वर न सीखने वाली प्रजातियों के बीच अंतर करता है, तो वह “कहीं न कहीं इसी में मौजूद है।” पूर्ण जीनोम अब वैज्ञानिकों को ऐसे जीनों की सीधे जांच करने का अवसर देता है ।
हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि 2,710 नए मिले जीनों में से किसी को पहले ही स्वर-अधिगम का कारण साबित कर दिया गया है। फिलहाल यह जीनोम एक अधिक सटीक शोध-मानचित्र उपलब्ध कराता है, जिससे वैज्ञानिक यह जांच सकेंगे कि कौन-से जीन गीत सीखने, मस्तिष्क के विकास और सामाजिक व्यवहार में भूमिका निभाते हैं।
नया जीनोम यह स्पष्ट करने में भी मदद करेगा कि पक्षियों में किसी जीन का अभाव वास्तविक विकासवादी बदलाव है या अधूरे जीनोम असेंबली की गलती। पहले कई “लुप्त” माने गए जीन वास्तव में केवल ऐसे हिस्सों में छिपे थे, जिन्हें पढ़ा नहीं जा सका था ।
यह उपलब्धि Vertebrate Genomes Project की उस व्यापक कोशिश का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य हजारों कशेरुकी प्रजातियों के पूर्ण जीनोम तैयार करना है । जैसे-जैसे और प्रजातियों के T2T जीनोम उपलब्ध होंगे, शोधकर्ता जीनोम विकास, स्वर-अधिगम और जटिल व्यवहारों के आनुवंशिक आधार पर अधिक सटीक सवाल पूछ सकेंगे।
फिलहाल, ज़ेब्रा फिंच का यह जीनोम वैज्ञानिकों को एक ऐसा विस्तृत नक्शा देता है, जिसकी मदद से वे पक्षियों के गीत सीखने की आनुवंशिक नींव और उससे जुड़े मस्तिष्कीय तंत्रों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।