विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 30 जुलाई 2026 तक डीआर कांगो में 3,605 पुष्ट मामले और 1,587 मौतें दर्ज की गईं। इससे केस-फैटलिटी रेट यानी संक्रमित लोगों में मृत्यु का अनुपात करीब 44% बैठता है ।
यह प्रकोप डीआर कांगो के इतिहास का सबसे बड़ा और दुनिया में अब तक दर्ज इबोला महामारियों में दूसरा सबसे बड़ा है । संक्रमण पांच प्रांतों—इतुरी, नॉर्थ किवु, साउथ किवु, हाउत-उएले और त्शोपो—तक फैल चुका है । पूर्वी डीआर कांगो के संघर्ष-प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं और आवाजाही पर असर पड़ने से निगरानी, मरीजों को अलग रखने और संपर्कों का पता लगाने का काम और कठिन हो गया है।
इतुरी अब भी महामारी का केंद्र बना हुआ है। जुलाई के मध्य तक देश के कुल मामलों में इस प्रांत की हिस्सेदारी करीब 90% थी ।
6 अगस्त 2026 को सामने आई जानकारी के अनुसार, डीआर कांगो सरकार अपने इबोला-रोधी अभियान में व्यापक बदलाव की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित योजना में प्रभावित पूर्वी प्रांतों में मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं, प्रायोगिक वैक्सीनों का परीक्षण बढ़ाना और गांवों की अगुवाई वाला स्थानीय प्रतिक्रिया मॉडल शामिल है ।
गांव-केंद्रित मॉडल का उद्देश्य स्थानीय भरोसे और भागीदारी को मजबूत करना है। ऐसे क्षेत्रों में केवल अस्पतालों या केंद्रीय प्रशासन पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होता, खासकर तब जब संघर्ष के कारण कई समुदायों तक पहुंच सीमित हो।
फिलहाल बुंडिबुग्यो वायरस के खिलाफ प्रतिक्रिया मुख्य रूप से इन उपायों पर निर्भर है:
इबोला वायरस के ज़ायरे स्ट्रेन के लिए लाइसेंस प्राप्त वैक्सीन और उपचार मौजूद हैं, लेकिन बुंडिबुग्यो वायरस रोग के लिए अभी कोई लाइसेंस प्राप्त वैक्सीन या विशिष्ट दवा नहीं है । इसका अर्थ है कि स्वास्थ्यकर्मियों के पास संक्रमण रोकने के लिए पहले से प्रमाणित टीकाकरण-उपकरण उपलब्ध नहीं है।
इस स्थिति में शुरुआती पहचान, बेहतर क्लिनिकल देखभाल और संक्रमण-नियंत्रण का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। लेकिन संघर्ष-प्रभावित इलाकों में प्रशिक्षित कर्मियों, जांच सुविधाओं, सुरक्षित परिवहन और भरोसेमंद स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच बनाए रखना अपने-आप में बड़ी चुनौती है।
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने जुलाई 2026 में बुंडिबुग्यो वायरस के खिलाफ पहला मानव वैक्सीन परीक्षण शुरू किया। BD-Ebov नाम के शुरुआती चरण के इस परीक्षण में 18 से 55 वर्ष की आयु वाले 50 स्वस्थ वयस्कों में ChAdOx1 BDBV वैक्सीन की सुरक्षा और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया जांची जा रही है ।
इस उम्मीदवार का निर्माण सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के साथ साझेदारी में किया जा रहा है । यह अभी शुरुआती चरण का परीक्षण है; इसलिए इसके प्रभावी और व्यापक इस्तेमाल के लिए आगे के परीक्षणों और नियामकीय मंजूरियों की जरूरत होगी।
मॉडर्ना ने 4 अगस्त 2026 को mRNA-1469 नामक प्रायोगिक वैक्सीन का फेज़ 1 मानव परीक्षण शुरू किया। हेल्थ कनाडा से मंजूरी मिलने के बाद पहले स्वयंसेवकों को टीका दिया गया। कनाडा के तीन केंद्रों पर होने वाले इस परीक्षण में करीब 80 स्वस्थ वयस्कों को शामिल किया जाना है, ताकि वैक्सीन की सुरक्षा और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का आकलन किया जा सके ।
WHO द्वारा बुलाए गए विशेषज्ञ समूहों ने बुंडिबुग्यो वायरस रोग के उपचार के लिए तीन उम्मीदवारों को क्लिनिकल ट्रायल में प्राथमिकता देने की सिफारिश की है:
WHO ने स्पष्ट किया है कि इन उम्मीदवारों का इस्तेमाल शोध और क्लिनिकल ट्रायल के दायरे में ही किया जाना चाहिए, ताकि उनकी सुरक्षा और प्रभावशीलता के ठोस आंकड़े जुटाए जा सकें ।
PARTNERS प्लेटफॉर्म ट्रायल में डीआर कांगो के मरीजों का नामांकन 2 जुलाई 2026 से शुरू हुआ। इस अध्ययन में MBP134 और remdesivir जैसे उपचारों को अकेले और संयोजन में परखा जा रहा है । WHO के अनुसार, IAVI द्वारा विकसित rVSV-आधारित बुंडिबुग्यो वैक्सीन को क्लिनिकल इस्तेमाल तक पहुंचने में अभी 7 से 9 महीने लग सकते हैं ।
वैक्सीन विकास में तेजी लाने के लिए CEPI ने अधिकतम 5 करोड़ डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई है। यह सहायता ऑक्सफोर्ड-सीरम इंस्टीट्यूट, मॉडर्ना और IAVI के तीन उम्मीदवारों के प्रीक्लिनिकल परीक्षण तथा फेज़ 1 ट्रायल के लिए है ।
अमेरिकी विदेश विभाग ने 5 अगस्त 2026 को तत्काल इबोला प्रतिक्रिया, तैयारी और क्षेत्र में मानवीय सहायता के लिए अतिरिक्त 24.2 करोड़ डॉलर देने का इरादा जताया । इसके साथ इबोला प्रतिक्रिया के लिए अमेरिका की प्रत्यक्ष सहायता 51.2 करोड़ डॉलर से अधिक हो गई है ।
अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, वह इस प्रकोप के शुरू होने के बाद से प्रतिक्रिया के लिए सबसे बड़ा वित्तीय योगदान देने वाला देश रहा है ।
डीआर कांगो ने इबोला प्रकोप की आधिकारिक घोषणा 15 मई 2026 को की थी। उस समय तक आठ प्रयोगशाला-पुष्ट मामले और 246 संदिग्ध मामले सामने आ चुके थे ।
हालांकि, महामारी-विज्ञान से जुड़े संकेत बताते हैं कि वायरस 2025 के अंत या 2026 की शुरुआत से ही बिना पहचाने फैल रहा हो सकता है । यानी आधिकारिक घोषणा से कई सप्ताह या महीने पहले संक्रमण समुदायों में मौजूद था। इस देरी ने वायरस को कई प्रांतों में जड़ें जमाने का मौका दिया और बाद में शुरू हुई समन्वित प्रतिक्रिया के सामने चुनौती बढ़ गई।
अभी संकट का अगला चरण दो मोर्चों पर निर्भर करेगा: एक ओर गांवों और संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों तक भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना, और दूसरी ओर प्रायोगिक वैक्सीन व उपचारों से जल्द, लेकिन सुरक्षित तरीके से वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना।