इन अतिरिक्त मौतों में 90% से अधिक का संबंध सीधे तौर पर मच्छरों के नए इलाकों में पहुंचने से नहीं, बल्कि चरम मौसम से होने वाली क्षति और स्वास्थ्य सेवाओं में रुकावट से जोड़ा गया है । 2050 तक अफ्रीका में करीब 1.3 अरब लोग ऐसे इलाकों में रह सकते हैं जहां जलवायु परिवर्तन के कारण मलेरिया का उन्मूलन आज की तुलना में अधिक कठिन होगा ।
बढ़ता तापमान पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका के ठंडे ऊंचाई वाले क्षेत्रों को Anopheles मच्छरों के लिए अधिक अनुकूल बना रहा है। 2050 तक मलेरिया संचरण का जोखिम रिफ्ट वैली, इथियोपियाई हाइलैंड्स और दक्षिणी अफ्रीका के तटीय हिस्सों तक बढ़ने का अनुमान है । सदी के अंत तक कुछ क्षेत्रों में मामले 20% तक बढ़ सकते हैं ।
हालांकि, यह पूरे महाद्वीप में एक जैसा विस्तार नहीं होगा। पश्चिमी और मध्य अफ्रीका के कुछ अधिक गर्म व शुष्क हिस्से मच्छरों के लिए कम अनुकूल हो सकते हैं, क्योंकि वहां की परिस्थितियां उनके जीवित रहने के लिए बहुत शुष्क हो जाएंगी ।
भविष्य में मलेरिया संचरण के लिए उपयुक्त कुल क्षेत्रफल में मामूली बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन सबसे अनुकूल क्षेत्र बदल जाएंगे। सालभर उच्च जोखिम वाले क्षेत्र पश्चिमी अफ्रीका के तटीय हिस्सों से हटकर कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा के बीच स्थित अल्बर्टाइन रिफ्ट की ओर खिसक सकते हैं ।
मलेरिया पर चर्चा में अक्सर तापमान और बारिश में धीरे-धीरे होने वाले बदलावों पर ध्यान दिया जाता है। लेकिन नए विश्लेषण के मुताबिक, बाढ़, चक्रवात और गर्मी की लहरों से होने वाला नुकसान कहीं अधिक गंभीर हो सकता है। ये घटनाएं स्वास्थ्य केंद्रों को नुकसान पहुंचाती हैं, मच्छरदानी वितरण रोकती हैं, आबादी को विस्थापित करती हैं और मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल जलभराव पैदा कर सकती हैं ।
उप-सहारा अफ्रीका में 2050 तक बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र-दिनों में 13% से 18% तक वृद्धि का अनुमान है । मलेरिया एटलस प्रोजेक्ट के अनुसार, यदि बाढ़ और चक्रवातों के बढ़ते विघटनकारी प्रभावों से निपटने की तैयारी नहीं की गई, तो वे अगले 25 वर्षों में जलवायु-जनित अतिरिक्त मलेरिया मामलों में 79% और अतिरिक्त मौतों में 93% तक योगदान दे सकते हैं ।
मुख्य बात: खतरा केवल मच्छरों के नए इलाकों में पहुंचने का नहीं है; उससे भी बड़ा खतरा यह है कि चरम मौसम उन इलाकों में मलेरिया नियंत्रण की अब तक की प्रगति को पीछे धकेल दे जहां बीमारी पहले से फैली हुई है।
जलवायु परिवर्तन के साथ जोखिम में रहने वाली आबादी भी बढ़ सकती है। उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में 2080 तक पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में 7.59 करोड़ अतिरिक्त लोग सालभर चलने वाले, यानी स्थानिक मलेरिया संचरण के जोखिम में आ सकते हैं । एक अन्य विश्लेषण के अनुसार, पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में पहले प्रभावित न हुए 19.7 करोड़ तक लोग किसी न किसी स्तर के जोखिम में आ सकते हैं ।
पश्चिमी अफ्रीका में सदी के मध्य तक मलेरिया के मौसम की अवधि घटने का अनुमान होने के बावजूद, कुल मिलाकर 5.13 करोड़ अतिरिक्त लोगों के किसी स्तर के जोखिम में आने की संभावना है ।
शोधकर्ता ऐसे “क्लाइमेट-स्मार्ट” मलेरिया कार्यक्रमों की मांग कर रहे हैं जो मौसम के प्रभाव, समय-अंतराल और स्थानीय सीमाओं के आधार पर अपने उपायों को बदल सकें। इसके तहत बाढ़ के मौसम से पहले दवाओं, जांच किट और मच्छरदानियों का भंडार प्रभावित क्षेत्रों के पास पहुंचाना, स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना और बदलती परिस्थितियों के अनुसार रणनीति में तुरंत बदलाव करना शामिल है ।
इस तरह की व्यवस्था स्थिर, एक जैसी योजना के बजाय पहले से अनुमान लगाकर की जाने वाली और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप कार्रवाई पर जोर देती है ।
कीटनाशक-युक्त मच्छरदानियां (LLINs) और घरों के भीतर कीटनाशक छिड़काव (IRS) जैसे बुनियादी उपायों को बनाए रखना बेहद जरूरी रहेगा। मॉडलिंग के अनुसार, IRS और LLINs को मिलाकर इस्तेमाल करने से जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों में भी मलेरिया का बोझ 76% तक घटाया जा सकता है ।
इसके विपरीत, यदि मच्छर नियंत्रण उपायों को लगातार जारी नहीं रखा गया, तो 2050 के दशक तक सालाना मलेरिया मामलों में 25% से 30% तक बढ़ोतरी हो सकती है ।
मलेरिया निगरानी तंत्र में मौसमी जलवायु पूर्वानुमान और वास्तविक समय के मौसम आंकड़े शामिल किए जा सकते हैं। इससे स्वास्थ्य विभाग संभावित प्रकोप का पहले अनुमान लगाकर दवाएं, जांच और कर्मचारी समय रहते तैनात कर सकेंगे ।
शोधकर्ता जोर देते हैं कि कम अवधि वाले और स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए पूर्वानुमानों को नियमित स्वास्थ्य योजना का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इससे कार्रवाई नुकसान होने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय चरम मौसम से पहले शुरू की जा सकेगी।
सरकारों को ऐसे स्वास्थ्य ढांचे में निवेश करना होगा जो बाढ़, चक्रवात और गर्मी की लहरों का सामना कर सके। स्वास्थ्य केंद्रों, दवाओं की कोल्ड चेन और मच्छरदानी के भंडार को चरम मौसम में नष्ट होने से बचाना जरूरी होगा।
मलेरिया नियंत्रण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी और जागरूकता भी अहम है । निगरानी, मॉडलिंग और जलवायु पूर्वानुमान से जुड़े क्षेत्रों में अलग-अलग विभागों के कर्मचारियों को संयुक्त प्रशिक्षण देना भी तत्काल प्राथमिकता के रूप में सुझाया गया है ।
अनुकूलन के साथ-साथ ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती भी जरूरी है। यदि दुनिया तापमान वृद्धि को 2°C तक सीमित कर पाती है, तो अधिक उत्सर्जन वाले रास्तों की तुलना में दक्षिणी अफ्रीका में हर 1,000 बच्चों पर मलेरिया के करीब 5 अतिरिक्त मामलों को रोका जा सकता है। पूर्वी अफ्रीका के ऊंचाई वाले इलाकों में यह लाभ और अधिक हो सकता है ।
इसका मतलब है कि तापमान वृद्धि की हर छोटी-सी कमी स्वास्थ्य व्यवस्था और समुदायों पर पड़ने वाले बोझ को घटा सकती है। मलेरिया से निपटने के लिए बेहतर तैयारी जरूरी है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए जलवायु परिवर्तन की गति को कम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण रहेगा ।