यह उपलब्धि किसी बड़े समारोह के बिना आई, लेकिन इसका महत्व गहरा है। सौर ऊर्जा अब केवल तेजी से बढ़ने वाली स्वच्छ तकनीक नहीं रही; इसका पैमाना इतना बड़ा हो चुका है कि यह बिजली बाजारों, ग्रिड निवेश और ऊर्जा नीति को नए सिरे से प्रभावित कर रही है।
वैश्विक सौर विस्तार की समय-सीमा लगातार छोटी होती गई है। 2012 में दुनिया की सौर क्षमता 100 गीगावॉट पार कर गई थी। वहां से पहले 1 टेरावॉट तक पहुंचने में एक दशक से अधिक समय लगा। इसके बाद दूसरा टेरावॉट तीन साल से भी कम समय में जुड़ गया, जबकि तीसरे टेरावॉट के लिए दो साल से भी कम समय लगा ।
सालाना नई क्षमता जोड़ने की रफ्तार भी इसी बदलाव को दिखाती है। 2016 में दुनिया में 100 गीगावॉट से कम सौर क्षमता जोड़ी गई थी, जो 2025 तक बढ़कर 650 गीगावॉट से अधिक हो गई ।
हालांकि, 2026 में इस रफ्तार में मामूली ठहराव का अनुमान है। BloombergNEF (BNEF) ने 2026 में 649 गीगावॉट नई सौर क्षमता जुड़ने का अनुमान लगाया है—2025 की तुलना में 0.9% कम और आधुनिक उद्योग के इतिहास में पहली सालाना गिरावट । SolarPower Europe के मध्यम परिदृश्य में यह गिरावट 8% तक, यानी 612 गीगावॉट, रहने का अनुमान है ।
विश्लेषकों के मुताबिक, यह कमी मांग घटने की वजह से नहीं, बल्कि ग्रिड जाम, अनुमति प्रक्रियाओं में देरी और प्रमुख बाजारों में नीतिगत बदलावों से जुड़ी है । दोनों पूर्वानुमान 2027 से फिर वृद्धि शुरू होने की उम्मीद जताते हैं ।
चीन वैश्विक सौर विस्तार का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। वह दुनिया के बाकी सभी देशों और क्षेत्रों से मिलाकर जितनी पवन और सौर क्षमता बनाते हैं, उससे भी अधिक क्षमता जोड़ रहा है । 2025 में वैश्विक नई सौर पीवी क्षमता का करीब 60% चीन से आया ।
लेकिन उत्पादन बढ़ने की तुलना में उसका बिजली ग्रिड उतनी तेजी से तैयार नहीं हो पाया है। चीन के उत्तर-पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में बड़े सौर पार्क स्थित हैं, जबकि बिजली की सबसे बड़ी मांग पूर्वी औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों में है। लंबी दूरी की ट्रांसमिशन लाइनों की कमी के कारण वहां पैदा हुई पूरी बिजली पूर्व तक नहीं पहुंच पाती ।
इसी समस्या को ‘कर्टेलमेंट’ कहा जाता है—अर्थात बिजली पैदा तो हुई, लेकिन उसे ग्राहकों तक नहीं पहुंचाया जा सका। चीन में जनवरी-फरवरी 2026 के दौरान सौर बिजली कर्टेलमेंट बढ़कर 9.2% हो गया, जो एक साल पहले 6.1% था। पवन ऊर्जा के मामले में यह दर 8.5% रही, जबकि पिछले साल 6.2% थी । संसाधन-संपन्न कुछ प्रांतों में सौर कर्टेलमेंट 10% से 17% तक पहुंच गया ।
Carbon Brief के विश्लेषण के अनुसार, समस्या केवल ट्रांसमिशन ढांचे की कमी नहीं है। कोयला बिजली संयंत्रों और ग्रिड का कम लचीला संचालन भी बड़ी वजह है । कठोर बाजार नियम और कोयला बिजली के लिए बने प्रोत्साहन ऐसे हालात पैदा करते हैं, जिनमें नई सौर परियोजनाएं जुड़ने के बावजूद अक्षय ऊर्जा उत्पादन को कम करना पड़ता है । चीन की अल्ट्रा-हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों से गुजरने वाली बिजली में पवन और सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी करीब 20% है, जबकि कोयले की हिस्सेदारी 42% है ।
नतीजा एक गंभीर विरोधाभास के रूप में सामने आ रहा है: अक्षय ऊर्जा क्षमता रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ रही है, लेकिन कोयला उत्पादन और उत्सर्जन भी ऊपर जा रहे हैं। 2026 की शुरुआत में चीन का CO₂ उत्सर्जन 2% बढ़ा। Carbon Brief के मुताबिक, इसकी एक वजह यह थी कि बर्बाद हुई पवन और सौर बिजली की भरपाई के लिए जीवाश्म ईंधन आधारित उत्पादन बढ़ाना पड़ा । चीन का सौर बाजार 2026 में 2019 के बाद पहली सालाना गिरावट का सामना कर सकता है ।
जहां चीन बड़े पैमाने की ग्रिड समस्या से जूझ रहा है, वहीं ग्लोबल साउथ के कुछ हिस्सों में सौर क्रांति घरों, दुकानों और छोटे व्यवसायों की छतों से आगे बढ़ रही है। महंगी ग्रिड बिजली, सस्ते होते सौर पैनल और बिजली आपूर्ति की अनिश्चितता ने रूफटॉप सोलर को आकर्षक विकल्प बनाया है।
पाकिस्तान इसका प्रमुख उदाहरण है। देश में नेट-मीटरिंग वाली रूफटॉप सौर क्षमता 2023 में 1 गीगावॉट से कम थी, जो मार्च 2025 तक करीब 4.9 गीगावॉट हो गई। 2024 में पाकिस्तान ने लगभग 16 गीगावॉट सौर पैनल आयात किए । एक अन्य आकलन के अनुसार, अप्रैल 2025 तक नेट-मीटरिंग वाली रूफटॉप क्षमता 5.3 गीगावॉट पहुंच गई थी ।
कुछ आकलनों में रूफटॉप सोलर को देश की बिजली आपूर्ति का लगभग एक-चौथाई बताया गया है । पाकिस्तान के एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने Reuters को बताया कि अगले वर्ष कई प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में दिन के समय रूफटॉप सौर उत्पादन राष्ट्रीय ग्रिड की मांग से भी अधिक हो सकता है ।
इस विस्तार के पीछे खुदरा बिजली की ऊंची कीमतें, नेट-मीटरिंग से जुड़े प्रोत्साहन और हाल के वर्षों में चीनी सौर पैनलों की कीमतों में आधे से अधिक की गिरावट जैसे कारक हैं । हालांकि, 2026 में पाकिस्तान के नए Prosumer Regulations ने पुराने यूनिट-फॉर-यूनिट नेट-मीटरिंग मॉडल में बदलाव किया है, जिससे इस तेजी के आगे नियामकीय चुनौती भी खड़ी हो सकती है ।
अफ्रीका ने 2025 में सौर ऊर्जा वृद्धि का अपना सबसे तेज साल दर्ज किया। महाद्वीप में करीब 4.5 गीगावॉट नई सौर पीवी क्षमता जोड़ी गई, जो साल-दर-साल 54% अधिक थी । दक्षिण अफ्रीका 1.6 गीगावॉट के साथ सबसे आगे रहा, उसके बाद नाइजीरिया 803 मेगावॉट और मिस्र 500 मेगावॉट पर रहे ।
नाइजीरिया की संचयी स्थापित सौर क्षमता 2024 के अंत के करीब 385 मेगावॉट से बढ़कर 2025 के अंत तक लगभग 1.19 गीगावॉट हो गई—यानी एक साल में 141% वृद्धि । यह वृद्धि दिखाती है कि कई विकासशील बाजारों में सौर ऊर्जा का विस्तार बड़े केंद्रीय बिजली संयंत्रों के बजाय वितरित प्रणालियों के जरिये हो रहा है।
3 टेरावॉट का आंकड़ा सौर ऊर्जा की सफलता तो दिखाता है, लेकिन साथ ही उसकी अगली बड़ी चुनौती भी सामने लाता है। जब दोपहर में बड़ी मात्रा में सौर बिजली पैदा होती है और मांग अपेक्षाकृत कम रहती है, तो बिजली की कीमतें गिर सकती हैं। कुछ बाजारों में थोक बिजली की कीमतें शून्य से नीचे जाने लगी हैं। California और Australia जैसे क्षेत्रों में सीमित भंडारण, ग्रिड बाधाओं और ऊंची सौर हिस्सेदारी के कारण कर्टेलमेंट और नकारात्मक कीमतों का दबाव बढ़ा है ।
इसे ‘वैल्यू डिफ्लेशन’ या ‘प्राइस कैनिबलाइजेशन’ कहा जाता है—सौर उत्पादन इतना अधिक हो जाता है कि उसी समय सौर बिजली की बाजार कीमत और परियोजनाओं का संभावित राजस्व घटने लगता है।
BNEF के New Energy Outlook 2026 के अनुसार, इस समस्या का सबसे अहम समाधान बैटरी स्टोरेज का तेज विस्तार है। रिपोर्ट में अनुमान है कि बैटरी भंडारण क्षमता 2025 के 223 गीगावॉट से 2035 तक 3.8 टेरावॉट हो सकती है—लगभग 17 गुना वृद्धि ।
बैटरियां दिन के समय अतिरिक्त सौर बिजली को संचित कर शाम और रात में उपलब्ध करा सकती हैं। इससे ग्रिड पर दबाव घटेगा, बिजली की कीमतों में अत्यधिक गिरावट का जोखिम कम होगा और सौर परियोजनाओं के निवेश रिटर्न को सहारा मिलेगा ।
निकट अवधि में स्थापना की रफ्तार थोड़ी धीमी होने के बावजूद दीर्घकालिक तस्वीर बेहद मजबूत है। BNEF का अनुमान है कि सौर ऊर्जा 2032 तक दुनिया में बिजली उत्पादन का सबसे बड़ा एकल स्रोत बन जाएगी। इसके पीछे सस्ते पैनल, तकनीकी प्रगति और वैश्विक आपूर्ति की अधिकता जैसे कारक होंगे ।
BloombergNEF के अनुसार, वैश्विक संचयी सौर क्षमता 2030 तक 6 से 7 टेरावॉट और 2036 तक 9 टेरावॉट से अधिक हो सकती है । SolarPower Europe के मध्यम परिदृश्य में 2030 तक वैश्विक सौर बेड़े का आकार करीब 6.6 टेरावॉट रहने का अनुमान है ।
IEA Photovoltaic Power Systems Programme के मुताबिक, 2025 के अंत तक स्थापित क्षमता के आधार पर सौर पीवी की सैद्धांतिक हिस्सेदारी वैश्विक बिजली मांग में करीब 10.5% पहुंच चुकी थी ।
3 टेरावॉट का मुकाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि सौर ऊर्जा अब ऊर्जा व्यवस्था की परिधि पर मौजूद तकनीक नहीं है। यह ग्रिड की संरचना, बिजली बाजारों के नियम, बैटरी भंडारण और ट्रांसमिशन निवेश को प्रभावित करने वाली केंद्रीय शक्ति बन चुकी है। अब सवाल यह नहीं है कि दुनिया कितनी सौर क्षमता बना सकती है; असली सवाल यह है कि उस बिजली को सही जगह, सही समय और आर्थिक रूप से टिकाऊ तरीके से कैसे इस्तेमाल किया जाए।