नाकेबंदी की खबर के बाद 12 जुलाई को Brent क्रूड एक ही दिन में 9% उछलकर 83 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया । इसके बाद:
ऊर्जा बाजार में “बैकवर्डेशन”—यानी तत्काल डिलीवरी वाले कॉन्ट्रैक्ट की कीमत का भविष्य की डिलीवरी से महंगा होना—ने कच्चे तेल, गैसोलीन और डीजल में रिटर्न को और मजबूत किया ।
ईरान से जुड़े हूती समूहों ने लाल सागर के तेल मार्ग को बंद करने की धमकी दी। इससे हॉर्मुज़ संकट के साथ एक दूसरा अहम वैश्विक शिपिंग कॉरिडोर भी जोखिम में आ गया ।
निवेशकों के लिए इसका मतलब केवल तेल की महंगाई नहीं था। जहाजों के रास्ते बदलने, बीमा लागत बढ़ने और डिलीवरी में देरी की आशंका ने ऊर्जा, ईंधन और औद्योगिक कच्चे माल की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव डाला।
जुलाई की रैली मुख्य रूप से ऊर्जा और कृषि क्षेत्रों में केंद्रित रही । कृषि जिंसों को 2026 में उभर रहे सुपर El Niño मौसम पैटर्न से भी समर्थन मिला। इससे अनाज और अन्य सॉफ्ट कमोडिटीज़ की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी।
वहीं, सप्लाई-चेन जोखिमों के कारण स्टील जैसी धातुएं कई वर्षों के उच्च स्तर तक पहुंचीं । यानी तेजी सिर्फ तेल तक सीमित नहीं रही; परिवहन, मौसम और औद्योगिक आपूर्ति से जुड़े जोखिमों ने कमोडिटी बाजार के कई हिस्सों को प्रभावित किया।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, बढ़ती महंगाई की आशंका, मजबूत अमेरिकी डॉलर, ऊंची अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड और सख्त मौद्रिक नीति की बढ़ती संभावना आम तौर पर कीमती धातुओं के लिए चुनौती होती है। इसके बावजूद सोने और चांदी ने साप्ताहिक बढ़त दर्ज की ।
यह संकेत देता है कि अत्यधिक भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच सुरक्षित निवेश की मांग अभी भी मजबूत थी।
Bloomberg US Dollar Index ने जून में साल का अपना सबसे अच्छा मासिक प्रदर्शन दर्ज किया और जुलाई में भी डॉलर की मांग बनी रही । जुलाई में संघर्ष बढ़ने के साथ महंगाई की आशंका तेज हुई, जिससे अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना पर बाजार की अपेक्षाएं तेजी से बढ़ीं ।
इससे बॉन्ड और ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील परिसंपत्तियों के लिए माहौल और जटिल हो गया।
तेल महंगा होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्टैगफ्लेशन—यानी महंगाई के साथ कमजोर आर्थिक वृद्धि—का डर बढ़ा। ऊंची तेल कीमतों, बढ़ती यील्ड और मजबूत डॉलर ने प्रमुख शेयर सूचकांकों पर दबाव डाला और वैश्विक इक्विटी बाजारों का प्रदर्शन मिश्रित से नकारात्मक हो गया ।
S&P Global Market Intelligence के विश्लेषण के अनुसार, बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान और लगातार बने भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण कमोडिटी कीमतें संघर्ष से पहले के स्तरों से ऊपर कम-से-कम 2028 तक रह सकती हैं ।
विश्व बैंक पहले ही 2026 में ऊर्जा कीमतों में 24% बढ़ोतरी का अनुमान दे चुका था—यह रूस के 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण के बाद सबसे बड़ी वार्षिक छलांग होती । जुलाई में संघर्ष के फिर तेज होने से यह अनुमान और प्रासंगिक हो गया।
UBS, Saxo Bank और Invesco के विश्लेषणों में भी यह बात सामने आई कि कूटनीतिक संकेतों के तुरंत बाद सैन्य तनाव बढ़ रहा है। ऐसे माहौल में बाजार हर युद्धविराम, नाकेबंदी या बातचीत की खबर पर तेजी से प्रतिक्रिया दे सकता है ।
इसलिए जुलाई की 12% तेजी को केवल मांग बढ़ने की कहानी समझना सही नहीं होगा। यह मुख्य रूप से आपूर्ति मार्गों, ऊर्जा सुरक्षा और युद्ध के जोखिम पर बाजार की तत्काल प्रतिक्रिया थी—और जब तक हॉर्मुज़ तथा लाल सागर से जुड़े जोखिम कम नहीं होते, कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव बने रहने की संभावना है।