2025 तक दुनिया के 10 सबसे बड़े ईवी निर्माताओं में छह चीनी कंपनियां थीं। चीन दुनिया के 60% से अधिक इलेक्ट्रिक वाहनों का उत्पादन करता है । 2024 में वैश्विक ईवी और ईवी बैटरी उत्पादन में चीन की हिस्सेदारी 70% से अधिक थी ।
इतने बड़े पैमाने से लागत कम रखने में मदद मिलती है—एक ऐसी बढ़त जिसकी बराबरी करना पश्चिमी प्रतिस्पर्धियों के लिए कम समय में मुश्किल है।
आधुनिक चीनी ईवी केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि एआई-आधारित ड्राइविंग, कनेक्टेड सेवाओं और डेटा संग्रह के प्लेटफॉर्म भी बनते जा रहे हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ जियोइकोनॉमिक्स के अनुसार, ईवी और एआई का यह मेल डेटा संग्रह तथा तकनीकी ‘लॉक-इन’ के नए रास्ते खोलता है और चीन का प्रभाव हार्डवेयर से आगे बढ़ाकर सॉफ्टवेयर इकोसिस्टम तक ले जाता है ।
चीनी ईवी कंपनियां यूरोप, एशिया और मध्य-पूर्व में विदेशी फैक्ट्री निवेश के मामले में अमेरिकी वाहन निर्माताओं से आगे निकल रही हैं । इससे मेजबान देशों में चीन की तकनीक, बैटरी और आपूर्ति शृंखलाओं पर लंबे समय की निर्भरता बन सकती है। ब्रुकिंग्स के एक फेलो ने CNBC से कहा कि BYD जैसी कंपनियां ईवी युग की नई GM और Ford बनती जा रही हैं ।
चीन अब केवल कम कीमत पर ईवी बनाने तक सीमित नहीं है। वह अपनी आपूर्ति शृंखला की ताकत को नीतिगत औजार के रूप में भी इस्तेमाल कर रहा है।
2025 में चीन ने ईवी बैटरी निर्माण में इस्तेमाल होने वाली अहम तकनीकों पर निर्यात प्रतिबंध लगाए। इनमें लिथियम-आयन बैटरी उत्पादन के उपकरण और बैटरी कैथोड तकनीक शामिल हैं । ये कदम केवल कच्चे खनिजों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उस उच्च-मूल्य प्रसंस्करण और विनिर्माण विशेषज्ञता को भी निशाना बनाते हैं जिसकी नकल करना अन्य देशों के लिए आसान नहीं है।
अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा अब चिप प्रतिबंधों से आगे बढ़कर उन कच्चे माल तक पहुंच गई है जो ईवी, ग्रिड स्टोरेज और रक्षा उद्योगों के लिए जरूरी हैं । यूएस-चीन इकोनॉमिक एंड सिक्योरिटी रिव्यू कमीशन के अनुसार, बीजिंग व्यापार वार्ताओं में रियायतें हासिल करने और दूसरे देशों को दंडित करने के लिए अहम खनिजों पर निर्यात नियंत्रण पहले ही लागू कर चुका है ।
ब्लूमबर्ग के अनुसार, बैटरी निर्यात पर चीन के नए प्रतिबंधों ने वॉशिंगटन के साथ व्यापार वार्ता में बीजिंग को एक नया और प्रभावशाली साधन दिया है। यह उसके पहले के दुर्लभ मृदा तत्वों से जुड़े दबाव से आगे की रणनीति है ।
वॉशिंगटन पोस्ट ने भी लिखा है कि चीन अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिलाफ अपने निर्यात नियंत्रण ढांचे का दायरा दुर्लभ मृदा तत्वों से आगे बढ़ाकर अन्य रणनीतिक वस्तुओं तक ‘धीरे-धीरे’ बढ़ा रहा है ।
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, विश्लेषकों का मानना है कि चीन अपनी ईवी बढ़त पर निर्भर देशों पर अधिक भू-राजनीतिक प्रभाव डालने की कोशिश कर सकता है । जिन देशों की तकनीक, बैटरी और आपूर्ति शृंखला चीन पर निर्भर होगी, उनके कूटनीतिक रुख पर भी बीजिंग का प्रभाव बढ़ सकता है—ताइवान से जुड़े मुद्दों से लेकर व्यापार नीति तक।
ईवी उद्योग कोई अलग-थलग क्षेत्र नहीं है। यह चीन की उस व्यापक रणनीति के केंद्र में है जिसका लक्ष्य भविष्य की अहम तकनीकों पर पकड़ बनाना है। ले मोंद के अनुसार, चीन औद्योगिक एआई, रोबोटिक्स, बैटरी, जैव-प्रौद्योगिकी तथा नवीकरणीय और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भारी शोध निवेश, लक्षित सरकारी सब्सिडी और पूरी मूल्य शृंखला पर नियंत्रण के जरिए अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है ।
ETH ज्यूरिख के सेंटर फॉर सिक्योरिटी स्टडीज के मुताबिक, चीन द्वारा अहम खनिजों पर निर्यात प्रतिबंधों का इस्तेमाल जवाबी कार्रवाई, बातचीत और बाजार नियंत्रण के लिए किया जाना ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्रों की वैश्विक कमजोरियों का लाभ उठाता है ।
अमेरिका और उसके सहयोगियों के सामने चुनौती केवल टैरिफ या व्यापार घाटे की नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या पश्चिमी देश चीन पर निर्भरता घटाने के लिए वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाएं पर्याप्त तेजी से बना पाएंगे।
आपूर्ति में विविधता, स्थानीय उत्पादन, ‘फ्रेंड-शोरिंग’ यानी भरोसेमंद साझेदार देशों में उत्पादन और वर्टिकल इंटीग्रेशन जैसी रणनीतियां शुरू हो चुकी हैं। लेकिन वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार, इन प्रयासों में भारी लागत आती है और इन्हें पूरा होने में समय लगता है ।
तब तक चीन की ईवी इकोसिस्टम पर पकड़ बीजिंग को अमेरिका के साथ तकनीकी मुकाबले में एक नया दबाव-बिंदु देती रहेगी—ऐसा दबाव जो कारों से आगे बढ़कर ऊर्जा, डेटा, रक्षा और वैश्विक व्यापार तक असर डाल सकता है।