ईरान के युद्धकालीन सैन्य कमान के प्रमुख मेजर जनरल अली अब्दोल्लाही ने कहा कि अमेरिका “पूर्ण पैमाने के क्षेत्रीय युद्ध की आग भड़काने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है” । उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका अपने हितों की रक्षा के लिए क्षेत्रीय पड़ोसी देशों की पूंजी, संसाधनों और बुनियादी ढांचे को ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहा है और इज़राइल की युद्ध क्षमता को मजबूत कर रहा है ।
सेंट्रल खातम अल-अनबिया मुख्यालय के एक प्रवक्ता ने इससे भी अधिक कड़ा संदेश दिया: “हमारे बुनियादी ढांचे पर हमला किया गया तो हम आपके और अधिक महत्वपूर्ण तथा अधिक संख्या में बुनियादी ढांचे पर हमला करेंगे” ।
ईरान की धमकी में ऊर्जा प्रतिष्ठान, सूचना-प्रौद्योगिकी प्रणालियां और समुद्री जल शोधन संयंत्र शामिल हैं। खाड़ी क्षेत्र में ये सुविधाएं सैन्य अभियानों के साथ-साथ आम नागरिकों की बिजली और पानी की जरूरतों के लिए भी अहम हैं ।
रॉयटर्स के अनुसार, CBS News ने 31 जुलाई को कई सूत्रों के हवाले से बताया कि अमेरिका और इज़राइल ईरान के ऊर्जा ढांचे के खिलाफ अब तक के “सबसे कड़े बमबारी अभियानों में से एक” की तैयारी कर रहे हैं । संभावित निशानों में तेल और गैस प्रतिष्ठान, बिजलीघर और रिफाइनरियां शामिल हैं; हमले 1-2 अगस्त के सप्ताहांत में कभी भी हो सकते हैं ।
Axios की अलग रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के ऊर्जा ढांचे पर कुछ ही दिनों में हवाई हमले शुरू करने पर विचार कर रहे हैं। बताया गया कि इसका उद्देश्य तेहरान पर अमेरिकी युद्धविराम शर्तें स्वीकार करने का दबाव बनाना है, लेकिन ट्रंप ने अभी अंतिम मंजूरी नहीं दी है ।
CBS News ने यह भी बताया कि अमेरिकी अधिकारियों के बीच इस बात पर चर्चा हुई कि हमले सोमवार को वित्तीय बाजार खुलने से पहले खत्म किए जाएं, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित असर को लेकर चिंता है। रिपोर्ट के अनुसार, इज़राइल को सूचना दे दी गई है और वह अमेरिका के साथ समन्वय कर रहा है ।
17 जून 2026 को राष्ट्रपति ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। इसमें लड़ाई रोकने और होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की रूपरेखा थी। ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर तकनीकी बातचीत के लिए 60 दिनों की अवधि तय की गई थी ।
लेकिन जुलाई की शुरुआत से ईरानी ठिकानों पर अमेरिकी हवाई हमले तेज़ होने लगे और यह कूटनीतिक पहल कमजोर पड़ गई । 15 जुलाई तक ईरान के शीर्ष वार्ताकार मोहम्मद बघेर ग़ालिबाफ ने समझौते को निरस्त घोषित कर दिया और कहा कि अमेरिकी “आक्रामकता” के खिलाफ ईरानी सशस्त्र बलों को “पूरी कार्रवाई की स्वतंत्रता” है । 18 जुलाई को ईरान के सरकारी प्रसारक ने MoU का पालन बंद करने की आधिकारिक घोषणा की ।
लगभग दो सप्ताह की तीखी लड़ाई के बाद 26 और 27 जुलाई को दोनों पक्षों ने हमले रोककर बातचीत का रास्ता तलाशने की कोशिश की । यह विराम बेहद नाजुक था। इस दौरान सामने आया कि अमेरिकी हमले में ईरान के एक समुद्री जल शोधन संयंत्र को नुकसान पहुंचा, जिससे करीब 10,000 लोग पानी से वंचित हो गए। इसके जवाब में ईरान ने अमेरिका के सहयोगी खाड़ी देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए ।
28 जुलाई को ईरान ने जॉर्डन स्थित एक अमेरिकी सैन्य अड्डे की ओर कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने इसे “अचानक किए गए हमले का प्रयास” बताया । अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सभी मिसाइलों को रोक लिया गया, लेकिन यह इस नए तनाव के दौरान अमेरिकी बलों के खिलाफ ईरान का पहला बैलिस्टिक मिसाइल हमला था ।
CENTCOM ने कहा कि हमला ईरान से शुरू हुआ और अमेरिकी बल सतर्क बने हुए हैं । इसके बाद ट्रंप ने ईरान को “जोरदार सबक” देने की बात कही । इस हमले ने दो दिन के विराम को खत्म कर दिया और बातचीत की बची-खुची गुंजाइश पर भी सवाल खड़े कर दिए।
इस संघर्ष में होर्मुज़ जलडमरूमध्य बार-बार बंद होने या खतरे में आने की स्थिति बनी है। ईरान इसे अपनी “अविच्छेद्य लाल रेखा” बता चुका है । यह जलमार्ग खाड़ी क्षेत्र से तेल की आवाजाही के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जुलाई के अंत तक विश्लेषकों ने चेतावनी दी कि यदि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के ऊर्जा ढांचे को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया, तो खाड़ी से वैश्विक तेल आपूर्ति गंभीर रूप से बाधित हो सकती है । ईरान के मुख्य वार्ताकार ग़ालिबाफ ने एक्स पर लिखा: “जिस क्षेत्र में हम तेल नहीं बेचेंगे, वहां कोई और भी तेल नहीं बेचेगा” ।
1 अगस्त तक अमेरिकी हमलों पर अंतिम फैसला लंबित था, लेकिन ईरान की जवाबी कार्रवाई की चेतावनी स्पष्ट है। अब किसी भी नए हमले से यह संघर्ष केवल अमेरिका और ईरान के बीच सीमित टकराव न रहकर पूरे खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा ढांचे और वैश्विक बाजारों को प्रभावित करने वाले व्यापक संकट में बदल सकता है।