कई फ्रांसीसी परमाणु रिएक्टर और अन्य ताप विद्युत संयंत्र ठंडा करने के लिए नदी के पानी पर निर्भर हैं। नदी का पानी अधिक गर्म होने और जलस्तर घटने से कुछ संयंत्रों को अपनी क्षमता कम करनी पड़ी या अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा । अत्यधिक गर्मी ने गैस से चलने वाले बिजली संयंत्रों की कार्यक्षमता पर भी असर डाला ।
यूरोप के बड़े हिस्से में लंबे समय तक हवा की गति कम रही। इससे पवन ऊर्जा का उत्पादन काफी घट गया और उस समय सस्ती बिजली का एक अहम स्रोत कमजोर पड़ गया, जब उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी । सबसे खराब शामों में जर्मनी का पवन उत्पादन करीब 2 गीगावाट रह गया—मौसमी औसत का लगभग 16 प्रतिशत । कम हवा और तेज गर्मी के इस मेल को कभी-कभी जर्मन शब्द “Hitzeflaute” यानी “गर्मी की हवा-रुकावट” कहा जाता है ।
दोपहर में सौर उत्पादन मजबूत रहा, लेकिन सूर्यास्त के बाद तस्वीर तेजी से बदल गई। एयर कंडीशनिंग की मांग शाम तक बनी रही, जबकि सौर उत्पादन गिर गया। मांग और सौर उत्पादन के इस असंतुलन ने “डक कर्व” जैसी स्थिति पैदा की, जिसे भरने के लिए महंगे गैस संयंत्रों को चलाना पड़ा ।
24 जून को रात 8:45 बजे बेल्जियम में थोक बिजली कीमत 1,000 यूरो प्रति मेगावाट-घंटा से ऊपर चली गई, जबकि उस दिन का औसत 257.5 यूरो था ।
गर्मी शुरू होने से पहले ही यूरोप के गैस भंडार मौसमी औसत से काफी नीचे थे। नॉर्डिक देशों के जलविद्युत जलाशय भी सामान्य स्तर से 8–12 अंक नीचे थे । इन परिस्थितियों के कारण सर्दियों के बिजली अनुबंध पहले ही अगले वर्ष के बेंचमार्क की तुलना में 20 प्रतिशत से अधिक प्रीमियम पर कारोबार कर रहे थे। ऐसे कमजोर आधार पर गर्मी से आया कोई भी आपूर्ति झटका कीमतों को और ऊपर ले गया।
यूरोप की बिजली व्यवस्था लंबे समय तक सर्दियों में हीटिंग की मांग के चरम को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। जून की लू ने दिखाया कि गर्मियों में कूलिंग की मांग अब सर्दियों की हीटिंग मांग के करीब पहुंच सकती है, लेकिन गर्म मौसम के चरम के लिए ग्रिड में वैसा ही अतिरिक्त रिजर्व नहीं है ।
इसके साथ ही डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन और हीट पंप बिजली की कुल मांग पर पहले से दबाव बढ़ा रहे हैं ।
इस घटना की सबसे गंभीर बात यह थी कि एक ही मौसम संबंधी परिस्थिति ने सिस्टम के दोनों सिरों पर दबाव डाला। गर्मी ने कूलिंग की मांग बढ़ाई, नदी-आधारित कूलिंग पर निर्भर ताप विद्युत उत्पादन सीमित किया, संयंत्रों की दक्षता घटाई और हवा की गति कम कर दी ।
यानी जिन परिस्थितियों में बिजली की सबसे अधिक जरूरत थी, उन्हीं परिस्थितियों ने कुछ प्रमुख उत्पादन स्रोतों को कमजोर कर दिया। एक विश्लेषण में इसे “संरचनात्मक फीडबैक लूप” बताया गया है ।
दोपहर में सौर बिजली की भरपूर उपलब्धता शाम के दामों को रोक नहीं सकी। इस घटना ने स्पष्ट किया कि बड़े पैमाने पर सौर और पवन ऊर्जा के साथ पर्याप्त बैटरी भंडारण, देशों के बीच बिजली पहुंचाने की इंटरकनेक्टर क्षमता और जरूरत पड़ने पर उपलब्ध कम-कार्बन बैकअप भी जरूरी है ।
एयर कंडीशनिंग की खपत सौर उत्पादन की समय-सारिणी का पालन नहीं करती। लोग दोपहर की धूप कम होने के बाद भी शाम और रात तक कूलिंग उपकरण चलाते रहते हैं ।
जून की लू को केवल एक अप्रत्याशित “ब्लैक स्वान” घटना मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह उन ज्ञात कमजोरियों का अनुमानित मेल था, जिनके बारे में जलवायु मॉडल पहले ही चेतावनी दे चुके हैं ।
यदि हीटवेव अधिक बार और अधिक तीव्र होती हैं, तो गर्मियों को कम मांग और कम कीमतों का मौसम मानने की पुरानी योजना काम नहीं करेगी। यूरोप के नियामकों और ग्रिड ऑपरेटरों को अब मौसमी योजना, ऊर्जा भंडारण के अनिवार्य लक्ष्य और क्षमता बाजार के डिजाइन पर फिर से विचार करना होगा ।
जून 2026 का बिजली संकट यह नहीं दिखाता कि नवीकरणीय ऊर्जा बेकार है। यह दिखाता है कि बिजली व्यवस्था को मौसम के अलग-अलग स्रोतों के बीच बेहतर तालमेल और पर्याप्त लचीलेपन की जरूरत है। गर्मियों के चरम के लिए भंडारण, मांग को कुछ घंटों के लिए आगे-पीछे करने की व्यवस्था, मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क और भरोसेमंद बैकअप के बिना सस्ती बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करना कठिन होगा।
यूरोप के लिए असली सबक यह है कि भविष्य का बिजली संकट केवल ठंडे जनवरी के दिनों में नहीं आएगा। वह गर्म, शांत और सूखे जून की शाम में भी पैदा हो सकता है।