उसी दिन जॉर्डन ने भी अपनी सीमा पार कर रहे ड्रोन को वायु रक्षा प्रणाली से रोकने की जानकारी दी। इससे संकेत मिला कि हमलों का असर सीधे तौर पर केवल सऊदी अरब तक सीमित नहीं था, बल्कि पड़ोसी देशों के लिए भी जोखिम बढ़ रहा था।
यह चेतावनी अचानक नहीं आई थी। मार्च 2026 में छह अरब देशों—कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सऊदी अरब, कतर और जॉर्डन—ने इराकी सरकार से कहा था कि वह सशस्त्र गुटों को अपनी जमीन से पड़ोसी देशों पर हमले करने से रोके। संयुक्त बयान में चेताया गया था कि कार्रवाई न होने पर तनाव और बढ़ सकता है।
29 जुलाई को सऊदी अरब और अमेरिका ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के समन्वय में इराक के भीतर ईरान समर्थित गुटों के ठिकानों पर हवाई हमले किए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, यह अमेरिकी-ईरान युद्धविराम टूटने के बाद इराक स्थित सशस्त्र गुटों के खिलाफ सऊदी अरब की पहली प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई थी।
30 जुलाई को रॉयटर्स ने दो क्षेत्रीय अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट किया कि सऊदी अरब और उसके क्षेत्रीय साझेदारों के आकलन के अनुसार, ईरान-संबद्ध हूतियों ने इराकी क्षेत्र से सऊदी अरब पर हमले किए। इन अभियानों में इराकी सशस्त्र गुट भी शामिल थे।
इन आकलनों का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि इससे ईरान से जुड़े अलग-अलग मिलिशिया नेटवर्कों के बीच बढ़ते संचालनात्मक तालमेल का संकेत मिलता है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान का इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) इन संयुक्त अभियानों की निगरानी कर रहा था।
कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि हूतियों ने इराक में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है और स्थानीय सशस्त्र गुटों को मिसाइल दागने में मदद की है। सऊदी तेल प्रतिष्ठानों पर हुए ड्रोन हमलों में उनकी प्रत्यक्ष भागीदारी का भी आकलन किया गया है।
क्रिटिकल थ्रेट्स प्रोजेक्ट की 30 जुलाई की समीक्षा के अनुसार, सऊदी अरब और कुछ क्षेत्रीय साझेदारों का मानना है कि हूतियों ने 27 जुलाई के हमलों में इराकी गुटों के साथ मिलकर और IRGC की निगरानी में हिस्सा लिया। समीक्षा में यह भी चेतावनी दी गई कि अमेरिकी-सऊदी हमलों के जवाब में इराकी मिलिशिया की संभावित कार्रवाई में हूती भी शामिल हो सकते हैं।
हमलों में सऊदी अरब के पूर्वी प्रांत की तेल सुविधाएं शामिल थीं। यह क्षेत्र राज्य का प्रमुख कच्चा तेल उत्पादन केंद्र है, इसलिए वहां की सुरक्षा का सीधा संबंध सऊदी निर्यात और वैश्विक ऊर्जा बाजार से है।
रियाद अब एक साथ तीन तरह के दबाव का सामना कर रहा है—यमन से हूती मिसाइल हमले, इराक स्थित ईरान-समर्थित गुटों के ड्रोन हमले और ईरान की ओर से बढ़ती धमकियां। CNN ने इस स्थिति को ऐसे देश के रूप में वर्णित किया है जो उस युद्ध में खिंचता जा रहा है, जिससे वह लंबे समय से बचने की कोशिश करता रहा है।
सऊदी अरब लाल सागर में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा के लिए करीब 50 देशों से संपर्क कर रहा है। इस प्रस्तावित सैन्य गठबंधन का अंतिम स्वरूप अभी तय नहीं हुआ है और दर्जनों देशों के साथ बातचीत जारी है।
30 जुलाई को सऊदी रक्षा मंत्रालय ने कहा कि तुर्की, पाकिस्तान, मिस्र, सूडान और जिबूती समेत 14 देशों ने समर्थन के संकेत दिए हैं। प्रस्तावित गठबंधन का मुख्यालय रियाद में होने की बात कही गई है।
लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य सऊदी तेल निर्यात के लिए महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग हैं। हूती हमलों से इन मार्गों पर जहाजरानी बाधित होने का खतरा बढ़ता है, जिसका असर क्षेत्रीय व्यापार और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है।
द गार्जियन ने यमनी सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट किया कि सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ समुद्र से और संभवतः मध्य यमन में जमीन से बड़ा सैन्य अभियान तैयार कर रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी सैनिकों की पूर्वी यमन से वापसी को संभावित सैन्य पुनर्स्थापन के रूप में देखा जा रहा है।
इन गतिविधियों में मध्य यमन के अल-बायदा प्रांत पर संभावित हमले के लिए सैनिकों को एकत्र करना शामिल बताया गया है। उद्देश्य दक्षिणी लाल सागर के रास्ते सऊदी तेल निर्यात पर हूतियों के दबाव को कम करना और समुद्री मार्गों को सुरक्षित करना हो सकता है। हालांकि, जमीनी अभियान की अंतिम मंजूरी या उसके समय की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं है।
सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने 4 जुलाई को ही कहा था कि सऊदी अरब को निशाना बनाने की किसी भी कोशिश का जवाब “अभूतपूर्व दृढ़ता और ताकत” से दिया जाएगा। 29 जुलाई के अमेरिकी-सऊदी हमलों के बाद यह बयान अब केवल चेतावनी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सैन्य नीति में बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
इराक से जुड़े इन हमलों ने ईरान-समर्थित गुटों के बीच सहयोग के नए स्तर को उजागर किया है। पारंपरिक क्षेत्रीय खिलाड़ियों, जैसे हिजबुल्लाह और सीरिया की सरकार, की भूमिका में बदलाव के बीच इराक इन नेटवर्कों के लिए एक अहम पड़ाव बनता जा रहा है। इससे सीमा-पार हमलों और जवाबी कार्रवाई का खतरा बढ़ सकता है।
यदि लाल सागर में सैन्य गठबंधन बनता है या सऊदी अरब यमन में समुद्री अथवा जमीनी अभियान शुरू करता है, तो संघर्ष का दायरा और व्यापक हो सकता है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी यह दिखाती है कि रियाद अपनी प्रतिक्रिया को केवल हवाई रक्षा तक सीमित रखने के बजाय इराक, यमन और लाल सागर—तीनों मोर्चों पर एक साथ तैयार कर रहा है।