2026 में भी स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। 17 सबसे बड़े खननकर्ताओं के उत्पादन अनुमान में कुल 1,99,000 टन की कटौती कर इसे 1.38 करोड़ टन किया गया है। First Quantum और Rio Tinto समेत कुछ कंपनियों के अनुमान में आगे भी कमी की गई ।
एक और महत्वपूर्ण संकेतक तांबे के कंसंट्रेट पर लगने वाले ट्रीटमेंट और रिफाइनिंग चार्ज हैं। ये शुल्क लगभग शून्य तक गिर गए हैं, जो बताता है कि स्मेल्टरों को संसाधित करने के लिए पर्याप्त कंसंट्रेट नहीं मिल रहा । International Copper Study Group को 2026 में रिफाइंड तांबे के उत्पादन में केवल 0.9% वृद्धि की उम्मीद है ।
तांबे की मांग अब केवल निर्माण और पारंपरिक उद्योगों पर निर्भर नहीं है।
AI डेटा सेंटरों में बिजली आपूर्ति, वायरिंग, कूलिंग और पावर ट्रांसमिशन के लिए बड़ी मात्रा में तांबा इस्तेमाल होता है। अनुमान के मुताबिक, एक AI डेटा सेंटर में 40,000–50,000 टन तक तांबे की खपत हो सकती है । दुनिया भर में AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ते निवेश ने मांग के अनुमान को ऊपर खिसकाया है।
ऊर्जा संक्रमण भी तांबे के पक्ष में काम कर रहा है। इलेक्ट्रिक वाहन, स्मार्ट ग्रिड, सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं तथा ग्रिड के आधुनिकीकरण में तांबा महत्वपूर्ण है। S&P Global के अनुमान के अनुसार, 2040 तक वैश्विक तांबा मांग 50% बढ़कर 4.2 करोड़ टन हो सकती है ।
चीन की अर्थव्यवस्था में सुधार और बुनियादी ढांचे पर संभावित सरकारी खर्च की उम्मीद ने भी कीमतों को सहारा दिया है ।
तांबे की कीमतें आमतौर पर डॉलर में तय होती हैं। इसलिए अमेरिकी डॉलर कमजोर होने पर अन्य मुद्राओं में कमाई करने वाले खरीदारों के लिए तांबा अपेक्षाकृत सस्ता हो जाता है। इससे मांग और कीमत—दोनों को समर्थन मिल सकता है।
2025 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने सितंबर, अक्टूबर और दिसंबर में लगातार 25 बेसिस पॉइंट की तीन कटौतियां कीं। इस आसान मौद्रिक नीति चक्र ने डॉलर पर दबाव डाला और कमोडिटी बाजार में निवेश को बढ़ावा दिया । फेड ने 2026 की शुरुआत तक इस नरम रुख को आगे बढ़ाने का संकेत भी दिया था ।
ब्याज दरें घटने से कमोडिटी रखने की ‘अवसर लागत’ भी कम होती है। यानी निवेशकों को बिना ब्याज वाली परिसंपत्ति रखने के बदले कम नुकसान महसूस होता है। इस वजह से औद्योगिक धातुओं में सट्टा पूंजी का प्रवाह बढ़ सकता है।
रिफाइंड तांबे पर संभावित अमेरिकी टैरिफ ने बाजार में एक अलग तरह की हलचल पैदा की। अमेरिकी कंपनियों ने टैरिफ लागू होने से पहले आयात बढ़ाना शुरू किया, जिसे फ्रंट-लोडिंग कहा जाता है। इससे अमेरिका में स्टॉक बढ़ा, लेकिन अमेरिकी बाजार के बाहर उपलब्ध तांबे की मात्रा पर अस्थायी दबाव पड़ा ।
इस स्थिति ने क्षेत्रीय कीमतों के बीच अंतर बढ़ाया और LME कीमतों में नीति-आधारित प्रीमियम जोड़ा। Saxo ने इस अनिश्चितता को ‘टैरिफ रूलेट’ कहा है—यानी कारोबारियों को यह स्पष्ट नहीं है कि टैरिफ कब, कितना और किस रूप में लागू होंगे ।
तांबे की कीमत बढ़ने का असर खनन कंपनियों के शेयरों पर सीधे पड़ता है। ऊंची कीमतों से उत्पादकों का राजस्व और मुनाफे का मार्जिन बढ़ सकता है, इसलिए निवेशकों ने कॉपर माइनर्स और तांबा-केंद्रित ETF में भी खरीदारी की।
2025 में तांबे की कीमत 43.93% बढ़ी और यह साल खनन शेयरों के लिए भी बेहद मजबूत रहा । कॉपर माइनर्स की तेजी ने बाजार की उम्मीदों को बदल दिया है—अब निवेशक तांबे को केवल चक्रीय धातु नहीं, बल्कि ऊर्जा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की दीर्घकालिक जरूरत के रूप में भी देख रहे हैं।
BHP के CEO ने संकेत दिया है कि ऊंची कीमतें जल्द सामान्य नहीं हो सकतीं। कुछ निवेश बैंकों का मानना है कि सप्लाई की संरचनात्मक समस्याओं के कारण तेजी 2026 तक जारी रह सकती है ।
यहीं सबसे बड़ा सवाल है। Goldman Sachs और Macquarie समेत कुछ संस्थानों ने चेतावनी दी है कि हालिया उछाल का एक बड़ा हिस्सा वास्तविक भौतिक मांग के बजाय सट्टा निवेश और टैरिफ से पहले की गई स्टॉकपाइलिंग से आया हो सकता है ।
2025 की शुरुआत से प्रमुख एक्सचेंजों पर दिखने वाला तांबा स्टॉक 8.7 लाख टन से अधिक बढ़ चुका है। इसमें 2025 में जुड़ा 4.44 लाख टन और 2026 में अब तक जुड़ा 4.29 लाख टन शामिल है ।
यदि अमेरिकी टैरिफ का मुद्दा सुलझ जाता है, आयात की अग्रिम खरीद धीमी पड़ती है या खदानों का उत्पादन अनुमान से तेजी से सुधरता है, तो कीमतों में करेक्शन संभव है । दूसरी ओर, AI, बिजली ग्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों से जुड़ी वास्तविक मांग लंबे समय तक मजबूत बनी रहती है तो तांबे के लिए बुनियादी समर्थन कायम रह सकता है।
फिलहाल बाजार दो ताकतों के बीच फंसा है: एक तरफ वास्तविक सप्लाई संकट और दीर्घकालिक औद्योगिक मांग, दूसरी तरफ स्टॉकपाइलिंग और सट्टेबाजी से पैदा हुई तेजी। यही टकराव तांबे को 2026 के सबसे चर्चित कमोडिटी बाजारों में बनाए हुए है।