शोधकर्ताओं का मानना है कि ये रहस्यमयी वलय किसी धूल या बर्फ के छल्ले नहीं हैं, बल्कि ये ग्रह-स्तरीय गुरुत्व तरंगों (planet-scale gravity waves) के कारण बनते हैं। गुरुत्व तरंगें वायुमंडल में उठने वाली वैसी ही लहरें हैं, जैसे समुद्र में पानी के ऊपर उठने वाली लहरें होती हैं। ये लहरें शुक्र के ऊपरी वायुमंडल (upper atmosphere) में गैस के घनत्व (density) में मामूली बदलाव लाती हैं।
वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर सिमुलेशन की मदद से यह पता लगाया कि शुक्र के बादलों के ऊपर गैस के घनत्व में मात्र 5 से 10 प्रतिशत का उतार-चढ़ाव (variation) इस प्रकार का ध्रुवीकरण पैटर्न (polarization pattern) बनाने के लिए काफी है। यानी, जब सूर्य का प्रकाश इन मोटी और पतली गैस की परतों से होकर गुज़रता है, तो वह इस तरह से ध्रुवित हो जाता है कि शुक्र के चारों ओर ये अदृश्य वलय दिखाई देने लगते हैं ।
हालांकि यह खोज बेहद रोमांचक है, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसे अभी पूरी तरह से पुष्ट (confirmed discovery) नहीं माना है, बल्कि इसे 'कैंडिडेट डिटेक्शन' यानी एक 'संभावित खोज' का दर्जा दिया है। इसके दो प्रमुख कारण हैं :
वैज्ञानिकों ने अपने निष्कर्ष और सिमुलेशन इस उम्मीद के साथ प्रकाशित किए हैं ताकि भविष्य में इसी तरह के ध्रुवीकरण अभियान (polarimetric campaigns) चलाए जा सकें, जो इन ग्रह-व्यापी तरंगों के अस्तित्व की पुष्टि कर सकें ।
yeh खोज शुक्र के जटिल और रहस्यमयी वायुमंडल को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और यह हमें बताता है कि किस तरह के अदृश्य चमत्कार हमारे पड़ोसी ग्रहों पर छिपे हो सकते हैं।