14 जुलाई, मंगलवार की सुबह, ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, "मैंने 20% अमेरिकी प्रतिपूर्ति शुल्क को विभिन्न खाड़ी राज्यों द्वारा अमेरिका में किए जाने वाले व्यापार और निवेश सौदों से बदलने का फैसला किया है" । सीबीएस न्यूज ने भी इस बदलाव की पुष्टि की
। इस त्वरित बदलाव का सीधा कारण वैश्विक स्तर पर हुए जबरदस्त विरोध को माना जा रहा है।
20% शुल्क के प्रस्ताव को कई मोर्चों से तुरंत और कड़ा विरोध झेलना पड़ा:
17 जून, 2026 को एक 60-दिवसीय अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके तहत ईरान द्वारा जलडमरूमध्य में सुरक्षित मार्ग की गारंटी देने के बदले में अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी हटा ली । यह युद्धविराम कभी भी पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर उल्लंघन का आरोप लगाया। ईरान ने 28 जून को कुवैत और बहरीन में अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया और अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की
। 8 जुलाई को, ट्रंप ने जलडमरूमध्य के पास अमेरिकी हमलों के बाद युद्धविराम को खत्म घोषित कर दिया
।
जून के अंत से जुलाई के मध्य तक, अमेरिका और ईरान ने दर्जनों हमले किए। अमेरिकी सेना ने ईरानी सैन्य और नौसैनिक प्रतिष्ठानों पर बमबारी की, जबकि ईरान ने अमेरिकी ठिकानों और जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों पर हमला किया । इसके परिणामस्वरूप, होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग गतिविधि में भारी गिरावट आई। जुलाई की शुरुआत तक, जहाजों की आवाजाही संघर्ष से पहले के स्तर से 'काफी कम' थी
। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार, 2026 की पहली दो तिमाहियों में, होर्मुज के माध्यम से तेल प्रवाह में पिछली तिमाही में लगभग 30% की गिरावट आई थी
। ब्लूमबर्ग ने इस व्यवधान को 'इतिहास का सबसे बड़ा तेल आपूर्ति झटका' बताया
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इस संघर्ष के दौरान तेल की कीमतों में जबरदस्त उतार-चढ़ाव देखा गया। जून के अंत में, एक संक्षिप्त युद्धविराम के दौरान डब्ल्यूटीआई कच्चा तेल $70 प्रति बैरल से नीचे आ गया था , लेकिन युद्धविराम के पतन और 20% शुल्क की घोषणा के बाद कीमतें फिर से बढ़ गईं
। विश्लेषकों ने चेतावनी दी कि बाजार बहुत आशावादी है और आपूर्ति में जोखिम के कारण कीमतें और भी ऊपर जा सकती हैं
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यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने होर्मुज शुल्क पर अपनी स्थिति बदली है। तीन महीनों में यह चौथा बदलाव था। इतनी तेजी से नीति बदलने से साफ है कि किस तरह अंतरराष्ट्रीय कानूनी विरोध, उद्योग जगत के दबाव और बाजार की प्रतिक्रिया ने एक उच्च-दांव वाली नीति को वापस लेने पर मजबूर कर दिया।
14 जुलाई, 2026 तक, 20% शुल्क अब नीति नहीं है। इसकी जगह खाड़ी देशों के साथ व्यापार और निवेश सौदों का वादा किया गया है। लेकिन, सवाल यह है कि क्या ये सौदे साकार होंगे और क्या वे एक ऐसे जलमार्ग को स्थिर कर पाएंगे, जहाँ एक ही तिमाही में तेल प्रवाह में लगभग 30% की गिरावट आई है? यह देखना बाकी है।