संसद की ITRE समिति (उद्योग, अनुसंधान और ऊर्जा) ने इस अधिनियम को अस्वीकार करने की सिफारिश की, जिसे EPP और ECR राजनीतिक समूहों के आपत्ति प्रस्ताव का समर्थन प्राप्त था । पूर्ण सत्र (plenary) में भी इसी के अनुरूप वोट हुआ । इसके मुख्य कारण थे:
WTO पैनल पहले ही दो मामलों में EU के पाम तेल उपायों पर फैसला सुना चुका था:
सोया फेजआउट को रोककर, जबकि पाम तेल फेजआउट यथावत है, EU ने भेदभावपूर्ण व्यवहार का आभास दिया है: पाम तेल पर प्रतिबंध है, सोया पर नहीं। यह EU की कानूनी दलील (ILUC पद्धति वैज्ञानिक और गैर-भेदभावपूर्ण है) को कमजोर करता है । ट्रांसपोर्ट एंड एनवायरनमेंट (T&E) का तर्क है कि संसद के इस फैसले ने EU की WTO रक्षा में 'सुराख' कर दिया है । USDA विदेशी कृषि सेवा की रिपोर्ट के अनुसार, नई ILUC गणना में पाम तेल और सोयाबीन दोनों शामिल हैं , जिसका अर्थ है कि संसद के अस्वीकार ने एक सीधी असंगति पैदा कर दी है।
यह सबसे तात्कालिक परिणाम है:
संसद का यह निर्णय एक त्रिलेम्मा पैदा करता है: सोया फेजआउट को रोककर EU कृषि की रक्षा करता है और सोया निर्यातकों से तत्काल WTO दावों से बचता है, लेकिन यह साथ ही साथ पाम तेल WTO विवादों में अपनी कानूनी स्थिति को कमजोर करता है, इंडोनेशिया और मलेशिया को अरबों डॉलर की जवाबी कार्रवाई के लिए प्रोत्साहित करता है, और वनों की कटाई से जुड़े बायोफ्यूल पर EU की जलवायु महत्वाकांक्षा को कमजोर करता है। EU अब एक ऐसी पसंद के सामने है जहाँ वह एक साथ व्यापार, कृषि और जलवायु—तीनों को संतुष्ट नहीं कर सकता।