हमले 7 जुलाई को भी जारी रहे। कतर के स्वामित्व वाले तरल प्राकृतिक गैस (LNG) टैंकर 'अल रेकायत' (Al Rekayat) और सऊदी झंडे वाले सुपरटैंकर 'वेदयान' (Wedyan) को जलडमरूमध्य में प्रक्षेपास्त्रों से निशाना बनाया गया। दोनों जहाजों को नुकसान पहुंचा, लेकिन वे डूबे नहीं । एक अमेरिकी अधिकारी ने इन हमलों को हाल के शांति समझौते का "घोर उल्लंघन" बताया । ये हमले ठीक उस समय हुए जब होर्मुज में हमलों को रोकने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच हुआ एक सप्ताह का समझौता समाप्त हो चुका था ।
ये हमले कोई अलग-थलग घटना नहीं थे। पूरे 2026 के दौरान, ईरान ने जलडमरूमध्य को, जो वैश्विक तेल शिपमेंट के लिए एक महत्वपूर्ण चोकपॉइंट है, एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था। मार्च की शुरुआत तक, ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता ने इस जलमार्ग को अवरुद्ध करने का इरादा घोषित कर दिया था, और IRGC ने आवाजाही पर प्रतिबंध लगाने, जहाजों पर चढ़ाई करने और समुद्री बारूदी सुरंगें बिछाने की चेतावनी जारी कर दी थी । 6-7 जुलाई की घटनाएं शांति समझौते पर हस्ताक्षर के बाद से सबसे गंभीर थीं।
अमेरिका की प्रतिक्रिया तत्काल और कठोर थी। 7 जुलाई को, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान में कई ठिकानों पर हवाई हमले किए । पेंटागन ने इन हमलों को तीन वाणिज्यिक जहाजों पर ईरानी हमलों का सीधा जवाब बताया । अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने घोषणा की कि सेना ने "ईरान पर महत्वपूर्ण परिणाम लागू करने के लिए महत्वपूर्ण हमलों की एक श्रृंखला शुरू की है" ।
इसके साथ ही, अमेरिकी प्रशासन ने उस छूट को रद्द कर दिया जो ईरानी तेल की वैश्विक बिक्री की अनुमति देती थी, जिससे शांति समझौते के तहत आसान किए गए ईरानी कच्चे तेल के निर्यात पर प्रभावी रूप से फिर से प्रतिबंध लग गए । इस कार्रवाई ने सीधे तौर पर ईरान के प्रमुख राजस्व स्रोत को निशाना बनाया, जो यह संकेत था कि कूटनीतिक रास्ता गंभीर रूप से कमजोर हो गया है।
जो शांति समझौता अब खतरे में है, वह इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन (MoU) है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ द्वारा 17-18 जून, 2026 को हस्ताक्षरित, यह 14-सूत्रीय समझौता 109 दिनों के युद्ध को समाप्त करने के लिए था । इस समझौते में मुख्य रूप से पाकिस्तान ने मध्यस्थता की थी, जबकि कतर, सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र ने सुविधाकर्ता के रूप में भूमिका निभाई थी ।
समझौते के प्रमुख प्रावधानों का उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और वाणिज्यिक शिपिंग की सुरक्षा के बदले में ईरान पर अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी को हटाना था । इस समझौते ने अंतिम समझौते की दिशा में 60-दिवसीय रोडमैप तैयार किया, और दोहा, स्विट्जरलैंड और अन्य जगहों पर अनुवर्ती वार्ताएं हुईं । पाकिस्तान और कतर के संयुक्त बयानों में इन वार्ताओं को "सकारात्मक और रचनात्मक" बताया गया । हालांकि, यह MoU संघर्ष के मूल कारणों को हल करने के बजाय दर्द को प्रबंधित करने के लिए डिज़ाइन किया गया था और इसने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों में राहत जैसे सबसे कठिन सवालों को बाद की वार्ताओं पर छोड़ दिया ।
6-7 जुलाई के हमले MoU पर हस्ताक्षर के बाद से सबसे गंभीर उल्लंघन हैं, जिसने पूरे कूटनीतिक ढांचे को "नाजुक" स्थिति में डाल दिया है ।
सऊदी अरब एक मुश्किल स्थिति में है। पहले, सऊदी अरब ने होर्मुज जलडमरूमध्य की अमेरिकी नाकाबंदी का विरोध किया था, क्योंकि उसे डर था कि इससे ईरान हूतियों के ज़रिए लाल सागर (बाब अल-मंडब) के महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों को भी खतरा पैदा कर सकता है । अमेरिकी-सऊदी तनाव का एक बड़ा संकेत तब देखने को मिला जब रियाद ने मई 2026 में अमेरिका को अपने हवाई क्षेत्र का उपयोग करने से मना कर दिया । MoU पर हस्ताक्षर के बाद, सऊदी अरब ने तेजी से तेल शिपमेंट बढ़ाया और 17 जून से 2 जुलाई के बीच जलडमरूमध्य से लगभग 34 मिलियन बैरल तेल भेजा । सऊदी झंडे वाले 'वेदयान' पर हमले ने रियाद को सीधे तौर पर इस नए संघर्ष का शिकार बना दिया, जिससे उसकी चिंता और बढ़ गई ।
कतर, जो MoU का एक मुख्य मध्यस्थ है, भी सीधे तौर पर प्रभावित हुआ। 7 जुलाई के हमलों में उसके स्वामित्व वाले LNG टैंकर 'अल रेकायत' को निशाना बनाया गया । इसके बावजूद, कतरी अधिकारियों ने समझौते के प्रति कूटनीतिक प्रतिबद्धता पर जोर देना जारी रखा और पाकिस्तान के साथ मिलकर संयुक्त बयानों में तनाव कम करने का आह्वान किया ।