इस समझौते ने निवेशकों के दो सबसे बड़े डर को दूर किया: भू-राजनीतिक अनिश्चितता (Geopolitical Uncertainty) और ऊर्जा आपूर्ति का संकट (Energy Supply Shock). युद्ध के चलते तेल की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई थीं, जिससे दुनिया भर में मंहगाई बढ़ने का डर था। अब जब शांति की उम्मीद बनी, तो बाजारों ने तुरंत सकारात्मक प्रतिक्रिया दी ।
सोमवार, 15 जून को एशियाई बाजार खुलते ही हर तरफ हरियाली छा गई।
जब डॉलर कमजोर पड़ता है, तो एशियाई मुद्राएं स्वाभाविक रूप से मजबूत होती हैं। इस बार तो जैसे बांध टूट पड़ा ।
बाजार की इस तेजी को और बल मिला जब दुनिया के दिग्गज निवेश बैंकों ने अपने पूर्वानुमान बदल दिए।
हालांकि बाजार जश्न मना रहे थे, विशेषज्ञों ने जल्दबाजी के खिलाफ चेतावनी भी दी:
अमेरिका-ईरान शांति समझौते की घोषणा ने वैश्विक अर्थव्यवस्था से एक बड़े बोझ को कम किया है। इसने न केवल एशियाई मुद्राओं और शेयर बाजारों को पंख लगाए, बल्कि दुनिया भर में महंगाई के दबाव को कम करने की उम्मीद भी जगाई। आने वाले दिनों में सबकी निगाहें 19 जून के स्विट्जरलैंड समारोह और उसके बाद होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की वास्तविक आवाजाही पर टिकी रहेंगी। फिलहाल, एशियाई बाजारों ने शांति का स्वागत भारी तेजी के साथ किया है।