इस आशाजनक सफलता के बावजूद, दोनों देशों के बीच समझौते की व्याख्याओं में बड़ा अंतर बना हुआ है, जो दोनों तरफ के सार्वजनिक रुख और कट्टरपंथी घरेलू विरोध से भड़का है । यह समझौता एक व्यापक शांति से कोसों दूर है; यह कई मुख्य, और अभी भी गहराई से विवादित, मुद्दों के लिए केवल एक नाज़ुक ढाँचा है।
एमओयू को एक प्रदर्शन-आधारित ढाँचे के रूप में डिज़ाइन किया गया है। रियायतों के एकमुश्त आदान-प्रदान के बजाय, अमेरिकी रुख प्रतिबंधों में राहत और वित्तीय संपत्तियों को 'डीफ्रीज' करने को सीधे तौर पर ज़मीनी स्तर पर ईरानी सत्यापन योग्य कार्रवाइयों से जोड़ता है । सौदे के मुख्य, सार्वजनिक रूप से सहमत घटकों में शामिल हैं:
एक वरिष्ठ अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारी ने समझौते पर हस्ताक्षर होने की 80% से 85% संभावना जताई, लेकिन चेतावनी दी कि ईरानी कट्टरपंथी अभी भी इस सफलता को पटरी से उतारने की कोशिश कर रहे हैं ।
सबसे ज़्यादा विवाद का मुद्दा प्रतिबंधों में राहत और फ्रोजन ईरानी संपत्तियों को जारी करने का समय है। दोनों पक्ष मूल रूप से असंगत धारणाओं के साथ काम कर रहे हैं।
ईरान का रुख: उप विदेश मंत्री काज़िम ग़रीबाबादी जैसे नेताओं के नेतृत्व में ईरानी वार्ताकार स्पष्ट रहे हैं: एमओयू पर हस्ताक्षर होने पर तुरंत ईरान की कम-से-कम 50% फ्रोजन विदेशी संपत्तियां—12 अरब डॉलर की न्यूनतम सीमा—जारी की जानी चाहिए । शेष धनराशि, जो तेहरान के अनुसार कुल 24 अरब डॉलर है, 60 दिनों के भीतर मुक्त कर दी जानी चाहिए
। यह मांग कोई बातचीत की रणनीति नहीं बल्कि तेहरान के दृष्टिकोण से एक गैर-परक्राम्य पूर्व शर्त है
।
अमेरिकी रुख: वाशिंगटन ने पहले से धन जारी करने के विचार को सिरे से खारिज कर दिया है। अमेरिकी अधिकारी इस बात पर जोर देते हैं कि प्रतिबंधों में राहत, जिसमें किसी भी फ्रोजन संपत्ति तक पहुँच शामिल है, ईरान के सत्यापित अनुपालन के आधार पर चरणों में संरचित की जाएगी । एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने स्पष्ट रूप से कहा, "ईरानियों को कोई नकदी नहीं मिल रही है, और न ही कोई अग्रिम प्रतिबंध राहत की पेशकश की जा रही है"
। अमेरिका ने एक मानवीय तंत्र का सुझाव दिया है, जो संभवतः कतर की मदद से प्रबंधित हो, जिससे ईरान गैर-प्रतिबंधित खरीद के लिए कुछ धन का उपयोग कर सके, लेकिन यह तेहरान की मांगों से काफी कम है
।
परिसंपत्तियों की लड़ाई से परे, अमेरिकी और ईरानी अधिकारी सार्वजनिक रूप से दो अलग-अलग समझौतों का वर्णन कर रहे हैं, जिससे भ्रम और अविश्वास पैदा हो रहा है।
भले ही संपत्तियों पर कोई समझौता हो जाए, एक अलग, असमाधेय सी लगने वाली समस्या हस्ताक्षर की राह को रोक रही है। ईरान ने अमेरिका के साथ किसी भी सौदे को अंतिम रूप देने के लिए लेबनान में युद्धविराम को एक गैर-परक्राम्य शर्त घोषित कर दिया है ।
यह शर्त फिलहाल पूरी नहीं हुई है। 4 जून को, हिज़्बुल्लाह नेता नईम कासिम ने इज़राइल और लेबनान के बीच अमेरिकी-मध्यस्थता वाले युद्धविराम समझौते को औपचारिक रूप से खारिज कर दिया, इस सौदे को एकतरफा बताया और कहा कि इसके लिए उनके लड़ाकों को आत्मसमर्पण करना होगा । उन्होंने सभी लेबनानी क्षेत्र से इज़राइली सैनिकों की पूर्ण वापसी की मांग की
। इस अस्वीकृति ने नाजुक युद्धविराम को तुरंत ध्वस्त कर दिया, और इज़राइली बलों और हिज़्बुल्लाह के बीच नए सिरे से शत्रुता शुरू हो गई
।
यह सीधे तौर पर ईरान की अपनी पूर्व शर्त को पूरा करने की क्षमता को कमजोर करता है और अमेरिका-ईरान एमओयू को अधर में लटका देता है। जब तक लेबनान का मोर्चा सक्रिय है, ईरान इसका इस्तेमाल देरी करने के लिए कर सकता है, जबकि साथ ही उसे सीधे तौर पर एक व्यापक संघर्ष में घसीटे जाने का जोखिम भी है ।
इस प्रक्रिया को एक सक्रिय, दो-राष्ट्रीय मध्यस्थता टीम ने संभाल कर रखा है।
ईरान के विदेश मंत्रालय ने सार्वजनिक रूप से दोनों देशों की मध्यस्थता को स्वीकार किया है, भले ही उसने वाशिंगटन पर कूटनीतिक प्रक्रिया को कमजोर करने वाली कार्रवाइयों का आरोप लगाया हो । इस तीव्र शटल कूटनीति ने इस्लामाबाद और दोहा पर भारी भू-राजनीतिक बोझ डाल दिया है, जिनकी सफलता नोबेल शांति पुरस्कार की ओर ले जा सकती है, लेकिन जिनकी विफलता भयावह हो सकती है।
Comments
0 comments