मॉलिक्यूलर हाइड्रोजन (H₂) के अप्रत्यक्ष प्रभावों पर भी चर्चा होती है, लेकिन इसकी भूमिका को लेकर अभी पर्याप्त वैज्ञानिक सहमति नहीं है।
इनका खेल वायुमंडलीय रसायन विज्ञान से जुड़ा है। जीवाश्म ईंधन के जलने या औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकलकर, ये गैसें वायुमंडल में सूर्य के प्रकाश की मौजूदगी में अभिक्रिया करती हैं और ट्रोपोस्फेरिक (ज़मीन के नज़दीकी) ओज़ोन का निर्माण करती हैं।
नासा से जुड़े एक मॉडलिंग अध्ययन ने दिखाया कि पूर्व-औद्योगिक काल (1750) से लेकर वर्तमान (2010) तक ट्रोपोस्फेरिक ओज़ोन ने जितनी अतिरिक्त गर्मी (रेडिएटिव फोर्सिंग) पैदा की, उसका बड़ा हिस्सा इन अप्रत्यक्ष गैसों के बढ़ते उत्सर्जन की देन था। इस हीटिंग में NOₓ का योगदान ~31%, CO का ~15%, और NMVOCs का ~9% रहा ।
यह समझना ज़रूरी है कि आईपीसीसी (IPCC) की AR6 रिपोर्ट के अनुसार, ऐतिहासिक ग्लोबल वार्मिंग में मीथेन का योगदान लगभग 0.5°C और CO₂ का 0.8°C रहा है
। इस पूरी तस्वीर में इन अप्रत्यक्ष गैसों का कुल जोड़ (लगभग 0.3°C) बिल्कुल भी मामूली नहीं है।
यह सबसे बड़ा सवाल है। जवाब साफ़ नहीं है, लेकिन संभावित कारणों में वैज्ञानिक जटिलता और ऐतिहासिक प्राथमिकताएं शामिल हैं:
यूके जैसे कुछ देश अपनी राष्ट्रीय ग्रीनहाउस गैस सूची में इन अप्रत्यक्ष गैसों की रिपोर्टिंग करते हैं, ताकि संपूर्ण जलवायु प्रभाव का आकलन किया जा सके, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय संधियों के 'गैस बास्केट' में ये शामिल नहीं हैं ।
यहीं इन प्रदूषकों की सबसे बड़ी ताकत छिपी है। क्योंकि ट्रोपोस्फेरिक ओज़ोन एक अल्पकालिक ग्रीनहाउस गैस है (इसका वायुमंडलीय जीवनकाल महीनों या हफ़्तों में होता है, न कि CO₂ की तरह सदियों में), इसके पूर्ववर्तियों के उत्सर्जन में कटौती करने पर जलवायु पर असर बहुत तेज़ी से दिख सकता है [3, 8]।
इसके दोहरे फ़ायदे हैं:
नए अध्ययन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल CO₂ और मीथेन पर ध्यान केंद्रित करके हम जलवायु परिवर्तन की पूरी गुत्थी नहीं सुलझा सकते। अप्रत्यक्ष ग्रीनहाउस गैसों—कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, और नॉन-मीथेन VOCs—को जलवायु रणनीतियों में शामिल करना अब समय की मांग है। ये वो 'अंधेरे क्षेत्र' के प्रदूषक हैं, जिन पर कार्रवाई करके हम कम खर्चे में, तेज़ी से, और जन-स्वास्थ्य को लाभ पहुंचाते हुए ग्लोबल वार्मिंग की रफ़्तार को धीमा कर सकते हैं [13, 14]।
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