यहीं पर एक गहरी विडंबना (सस्टेनेबिलिटी पैराडॉक्स) सामने आती है। दुनिया जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए जीवाश्म ईंधन से दूर जाने की कोशिश कर रही है। इस स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लिए भारी मात्रा में तांबा, कोबाल्ट और लिथियम जैसे खनिजों की आवश्यकता है, जिनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरियों, सौर पैनलों और पवन टर्बाइनों में होता है।
नया अध्ययन दिखाता है कि इन्हीं खनिजों का खनन अफ्रीका में, विशेष रूप से कांगो बेसिन के वर्षावनों में, वनों की कटाई को तेज़ कर रहा है । इसका मतलब यह हुआ कि जो तकनीकें वैश्विक कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए बनाई गई हैं, वे अपने खनिज निष्कर्षण के बिंदु पर ही बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और CO₂ उत्सर्जन कर रही हैं। यह प्रक्रिया स्वच्छ ऊर्जा से मिलने वाले कुछ जलवायु लाभों को ही कमज़ोर कर रही है।
यह हमारे सामने एक कठिन प्रश्न रखता है: क्या हम एक पर्यावरणीय संकट को हल करने के लिए दूसरे को और गहरा कर रहे हैं?
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