इसका सीधा-सा मतलब है: बड़ी आघात तरंग, ज़्यादा ऊर्जावान कण।
वैज्ञानिकों ने इसी स्केलिंग संबंध को उन खगोलीय पिंडों पर लागू किया जहाँ हम सीधे मापन नहीं कर सकते। परिणाम चौंकाने वाले थे।
यह अनुमान वास्तविक अवलोकनों से मेल खाता है। उदाहरण के लिए, सुपरनोवा अवशेष SN 1006 से आने वाली एक्स-रे सिंक्रोट्रॉन विकिरण यह साबित करती है कि वहाँ इलेक्ट्रॉनों को लगभग 100 TeV (टेरा-इलेक्ट्रॉनवोल्ट) तक त्वरित किया जा रहा है। सुपरनोवा अवशेषों की आघात तरंगों को पहले से ही हमारी आकाशगंगा में उत्पन्न होने वाली ब्रह्मांडीय किरणों का एक प्रमुख स्रोत माना जाता रहा है।
शोधकर्ताओं की व्याख्या यह है कि फ़ोरशॉक या आघात-संबंधी त्वरण की यह प्रक्रिया बहुत भिन्न वातावरणों में एक समान रूप से काम कर सकती है—चाहे वह ग्रहीय बो शॉक हो या किसी मरे हुए तारे का विशाल विस्फोट अवशेष। इसका अर्थ है कि जूनो ने बृहस्पति पर जो बुनियादी भौतिकी देखी, वही प्रक्रिया ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली प्राकृतिक कण त्वरकों में भी काम कर रही होगी।
हालाँकि यह स्केलिंग बेहद आकर्षक और उपयोगी है, लेकिन यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि इसे सुपरनोवा अवशेषों पर लागू करना एक बौद्धिक विस्तार (एक्सट्रपलेशन) है, क्योंकि हमारे अंतरिक्ष यान उन दूरस्थ आघात तरंगों का सीधे (इन-सीटू) नमूना नहीं ले सकते। SN 1006 की ऊर्जा के साथ सामंजस्य इस विचार को विश्वसनीय बनाता है, लेकिन इसे अभी सुपरनोवा अवशेषों में त्वरण प्रक्रिया के प्रत्यक्ष प्रमाण के बजाय एक समर्थक साक्ष्य के रूप में ही लिया जाना चाहिए।
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