1. 'पर्सनैलिटी राइट' का अभाव: अमेरिका जैसे देशों के विपरीत, भारत में किसी शख्स के नाम, तस्वीर, आवाज़ या पहचान के व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगाने का कोई सीधा-सादा कानूनी अधिकार (Statutory Personality Right) नहीं है। अब तक, सेलिब्रिटी ट्रेडमार्क कानून या टॉर्ट्स के जटिल रास्ते पर निर्भर थे। अब हाल ही में, अदालतों ने इसे सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 (गरिमा और सम्मान का मौलिक अधिकार) से जोड़कर इस सुरक्षा को एक मज़बूत आधार दिया है ।
2. आईटी एक्ट की अधूरी पकड़: आईटी एक्ट की धारा 66C (पहचान की चोरी) और 66D (प्रतिरूपण) जैसे प्रावधान ‘आपराधिक इरादे’ (Criminal Intent) को साबित करने पर निर्भर करते हैं। जब कोई अनजान शख्स विदेशी सर्वर से बेहद जटिल डीपफेक मॉडल चलाता है, तो उसके इरादे को कानूनी तौर पर साबित करना लगभग नामुमकिन है। कानूनी विशेषज्ञ इसे कानून प्रवर्तन की एक ‘घातक खामी’ (Fatal Enforcement Gap) मानते हैं ।
3. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही में धुंधलापन: 2021 के आईटी नियमों के तहत शुरुआत में प्लेटफॉर्म्स पर एआई जनित कंटेंट की पहचान करने या उसे लेबल करने की बाध्यता नहीं थी। अक्टूबर 2025 में प्रस्तावित संशोधनों में ‘सिंथेटिकली जेनरेटेड इंफॉर्मेशन’ की अवधारणा लाई गई और कंटेंट की पहचान का दायित्व तय किया गया, पर आलोचकों का कहना है कि ये नियम कागज़ों पर मज़बूत हैं, लेकिन असल ज़िंदगी में इन्हें लागू करना बेहद मुश्किल है ।
संसद के कोई व्यापक कानून पारित करने का इंतजार करने की बजाय, दिल्ली हाई कोर्ट ने आपातकालीन राहत चाहने वाली मशहूर हस्तियों का पसंदीदा अड्डा बन गया है। इसकी कार्यशैली बेहद सुसंगत और आक्रामक है: पहले बिना विरोधी पक्ष को सुने (एक्स-पार्टे) तुरंत अंतरिम रोक लगाओ, फिर 72 घंटों के भीतर प्लेटफॉर्म्स को आपत्तिजनक सामग्री हटाने का आदेश दो, और साथ ही कंपनियों को यह हिदायत दो कि अदालत के इस फैसले को औपचारिक शिकायत की तरह लें ।
दिसंबर 2025 में, सुनील गावस्कर ने दिल्ली हाई कोर्ट से एक बड़ी कानूनी जीत हासिल की। वे पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए जिन्हें अदालत से अपनी पर्सनैलिटी राइट्स का कानूनी संरक्षण मिला। इस फैसले का मतलब साफ है: उनकी लिखित अनुमति के बिना कोई भी व्यक्ति, AI या किसी अन्य माध्यम से उनके नाम, आवाज़ या तस्वीर का इस्तेमाल व्यावसायिक फायदे के लिए नहीं कर सकता ।
कोर्ट ने इस मामले में X (पूर्व में ट्विटर), फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे बड़े प्लेटफॉर्मों को भी कड़ा आदेश दिया। उनसे कहा गया कि वे गावस्कर की शिकायत को IT नियम 2021 की धारा 3(2) के तहत एक औपचारिक शिकायत मानें और सात दिनों के भीतर इसका निपटारा करें। ध्यान देने वाली बात है कि यह समय-सीमा सामान्य प्रक्रिया से कहीं ज़्यादा तेज़ है ।
बच्चन परिवार ने इस मोर्चे पर सबसे पहले और सबसे व्यापक आदेश हासिल किए। सितंबर 2025 में ऐश्वर्या राय बच्चन के केस में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक अंतरिम रोक लगाई, जिसमें खासतौर पर कहा गया कि उनके नाम, तस्वीर, आवाज़ या पहचान का “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या डीपफेक तकनीकों” के माध्यम से इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। इसी तरह, अमिताभ और अभिषेक बच्चन के मामलों में भी जजों ने आदेश को पारंपरिक बौद्धिक संपदा कानून की बजाय संवैधानिक गरिमा के अधिकार पर आधारित किया ।
2026 आते-आते, यह सिलसिला बाढ़ में बदल गया। फरवरी में विवेक ओबेरॉय के मामले में अदालत ने नकली प्रोफाइल और मॉर्फ्ड कंटेंट के खिलाफ सख्त रुख अपनाया । मार्च में, पूर्व क्रिकेटर और सांसद रह चुके गौतम गंभीर ने AI जनित डीपफेक के खिलाफ एक दीवानी मुकदमा दायर कर ₹2.5 करोड़ का हर्जाना मांगा
। मई 2026 में अर्जुन कपूर के मामले में न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला ने ऐसे अश्लील डीपफेक वीडियो पर रोक लगाई और गूगल तथा मेटा (फेसबुक) को आदेश दिया कि वे न सिर्फ कंटेंट हटाएं बल्कि आरोपी यूज़र्स की जानकारी भी साझा करें
।
यह तरीका लंबे समय तक नहीं चल सकता। अदालतें एक-एक केस के हिसाब से फिलहाल एक बड़े खालीपन को भर रही हैं, लेकिन ये सब अंतरिम इंतजाम हैं। एक सच्चाई यह भी है कि यह सहारा सिर्फ उन्हीं को मिल रहा है जिनके पास लंबी कानूनी लड़ाई के लिए पैसा और संसाधन हैं। असल समस्या जस की तस बनी हुई है: न तो डीपफेक की कोई कानूनी परिभाषा है, न ही ‘पर्सनैलिटी राइट्स’ का कोई संहिताबद्ध कानून है, और न ही उन गुमनाम रचनाकारों के खिलाफ कार्रवाई का कोई सीधा आपराधिक रास्ता मौजूद है ।
अक्टूबर 2025 के प्रस्तावित संशोधन सरकार की पहली कोशिश ज़रूर हैं, जिसमें ‘सिंथेटिकली जेनरेटेड इंफॉर्मेशन’ को मान्यता देना, कम से कम 10% फ्रेम में दिखने वाली लेबलिंग अनिवार्य करना, और प्लेटफॉर्म्स पर पहचान तकनीक लगाने का दबाव डालना शामिल है। पर कानून के जानकारों का मानना है कि ये प्रावधान अब भी अस्पष्ट हैं, और ‘सुरक्षित पनाह’ (Safe Harbour) की शर्तों के ज़रिए कंपनियों को कंट्रोल करने का तरीका कमज़ोर साबित हो सकता है ।
कानूनी जानकारों और शिक्षाविदों के बीच इस बात पर आम सहमति बन रही है कि अब भारत को एक विशेष डीपफेक कानून की सख्त ज़रूरत है। या फिर कम से कम IT एक्ट और BNS में ऐसे बड़े संशोधन किए जाएं जो बिना अनुमति के डीपफेक बनाने को अपराध घोषित करें, सहमति और खुलासे को अनिवार्य बनाएं, और कंपनियों पर सीधी ज़िम्मेदारी तय करें । जब तक संसद में ऐसा कोई कानून नहीं बनता, तब तक दिल्ली हाई कोर्ट ही भारतीय सितारों का सबसे ताकतवर, भले ही थोड़ा बोझिल, हथियार बना रहेगा।