लगभग इसी समय, कैरिबियाई द्वीपीय देश बहामास ने भी प्रभावित तीनों देशों के निवासियों को अपने यहां प्रवेश करने से अस्थायी रूप से प्रतिबंधित कर दिया । कनाडा की तरह विस्तृत न भी हो, लेकिन सरकार ने पुष्टि की कि इबोला-प्रभावित क्षेत्रों से आने वाले यात्रियों के लिए स्वास्थ्य जांच शुरू कर दी गई है
। यह छोटा सा देश भी अब उन तमाम राष्ट्रों की श्रेणी में शामिल हो गया है, जो सीमाओं पर कड़ा नियंत्रण लागू कर रहे हैं।
यह रुख पूरी तरह से अचानक नहीं है। इससे पहले 18 मई को अमेरिका ने एक टाइटल 42 आदेश के तहत अपनी सीमा पर नियंत्रण कड़ा किया था ।
उपरोक्त सभी राष्ट्रीय उपाय WHO की स्पष्ट सलाह के ठीक उलट हैं। संगठन ने 17 मई 2026 को बुंडिबुग्यो वायरस प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल (PHEIC) तो घोषित कर दिया, लेकिन साथ ही यह सलाह लगातार दोहराई है कि सीमाएं बंद न करें या यात्रा प्रतिबंध न लगाएं ।
WHO की सिफारिशें बीमारी पर केंद्रित हैं, न कि देशों पर। उनका जोर अंतरराष्ट्रीय सड़कों और सीमाओं पर जांच बढ़ाने पर है। साथ ही, स्पष्ट कहा गया है कि पुष्ट या संदिग्ध मामलों और उनके संपर्क में आए लोगों की कोई अंतरराष्ट्रीय यात्रा नहीं होनी चाहिए । अंतरराष्ट्रीय नागर विमानन संगठन (ICAO) ने भी इसका समर्थन करते हुए कहा है कि हवाई सेवाएं सुरक्षित हैं और प्रभावित क्षेत्र के बाहर प्रवेश जांच जरूरी नहीं मानी जाती
।
समस्या की जड़:
यह मतभेद कोई सैद्धांतिक नहीं, बल्कि अस्तित्वगत चुनौती से जन्मा है। बुंडिबुग्यो स्ट्रेन, इबोला के आम और जाने-माने ज़ैरे स्ट्रेन से भिन्न है। और इसकी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अभी तक न तो इसके लिए कोई स्वीकृत वैक्सीन उपलब्ध है और न ही कोई विशेष कारगर इलाज । शायद यही वैज्ञानिक अनिश्चितता उन देशों को, जिनके पास साधन और क्षमता है, WHO की खुली सलाह के बजाय बंद दरवाजों की नीति अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।