इन बातचीतों के बाद ट्रंप ने कहा कि देश एक ऐसे दस्तावेज़ के करीब हैं जिसे उन्होंने “शांति से संबंधित मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग” बताया। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसे अभी अमेरिका, ईरान और शामिल अन्य देशों की अंतिम मंजूरी मिलनी बाकी है।
यह पहल 2026 में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़े सैन्य तनाव और उसके बाद हुए युद्धविराम प्रयासों के बाद सामने आई है, जब क्षेत्रीय युद्ध के खतरे को कम करने के लिए कूटनीतिक कोशिशें तेज हुईं।
रिपोर्टों के अनुसार वर्तमान प्रस्ताव एक छोटा ढांचा दस्तावेज़ है—कुछ जगह इसे एक‑पन्ने का समझौता भी बताया गया है—जो युद्धविराम और आगे की बातचीत के लिए बुनियादी सिद्धांत तय करता है।
मसौदे में कथित तौर पर ये प्रमुख बिंदु शामिल हैं:
अगर यह ढांचा लागू होता है तो इसका मतलब होगा कि मौजूदा सैन्य टकराव को रोका जाए और व्यापक कूटनीतिक प्रक्रिया शुरू की जाए।
होरमुज़ जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को वैश्विक समुद्री मार्गों से जोड़ने वाला एक संकरा लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुंचता है।
इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा का असर वैश्विक तेल कीमतों और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। इसलिए इसे फिर से खोलना संभावित समझौते का एक केंद्रीय बिंदु माना जा रहा है।
हालांकि इसके संचालन को लेकर मतभेद सामने आए हैं। अमेरिकी पक्ष नौवहन की स्वतंत्रता पर जोर देता है और कहता है कि किसी देश या संगठन को वहां से गुजरने पर शुल्क नहीं लगाना चाहिए।
दूसरी ओर, ईरान से जुड़े कुछ स्रोतों का कहना है कि जलडमरूमध्य के प्रबंधन या नियंत्रण में ईरान की भूमिका बनी रह सकती है—जो बातचीत में एक अहम विवाद बना हुआ है।
अमेरिका लंबे समय से यह स्पष्ट करता आया है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित नहीं कर सकता। यह अमेरिकी नीति का मुख्य उद्देश्य माना जाता है।
मौजूदा मसौदे में संवर्धन पर अस्थायी रोक की बात कही गई है, लेकिन इसकी अवधि, सीमा और निगरानी तंत्र पर अभी स्पष्ट सहमति नहीं है।
भले ही जहाज़रानी फिर शुरू हो जाए, लेकिन यह सवाल अभी भी खुला है कि मार्ग की सुरक्षा और नियंत्रण किसके हाथ में होगा।
अमेरिकी और ईरानी स्रोतों की अलग‑अलग व्याख्याएँ बताती हैं कि इस मुद्दे पर बातचीत अभी अधूरी है।
इन वार्ताओं में कई देशों ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान ने प्रमुख मध्यस्थ के रूप में काम किया, जिसने वाशिंगटन और तेहरान के बीच प्रस्तावों का आदान‑प्रदान कराने में मदद की।
इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र के कई देशों और कतर जैसे क्षेत्रीय साझेदारों की भी कूटनीतिक भागीदारी बताई गई है।
फिलहाल यह समझौता एक लगभग तय फ्रेमवर्क माना जा रहा है, न कि पूर्ण शांति समझौता। अंतिम शर्तों पर सहमति बनने के बाद ही आधिकारिक घोषणा की संभावना है।
अगर यह MOU औपचारिक रूप लेता है, तो यह हालिया संघर्ष को समाप्त करने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम, अमेरिकी प्रतिबंधों और फारस की खाड़ी में समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर व्यापक समझौते की दिशा में पहला बड़ा कदम हो सकता है।
अंततः यह देखना बाकी है कि परमाणु सीमाओं और होरमुज़ जलडमरूमध्य के नियंत्रण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर दोनों पक्ष किस तरह की अंतिम सहमति बना पाते हैं।