दुनिया की अधिकांश EV बैटरियाँ चीनी कंपनियाँ बनाती हैं और बैटरी निर्माण क्षमता का बड़ा हिस्सा भी चीन के पास है।
कार निर्माताओं के लिए बैटरी सप्लायर के पास ही उत्पादन करना लॉजिस्टिक्स लागत घटाता है और नए मॉडलों के विकास को तेज़ बनाता है।
चीन का EV बाज़ार बेहद प्रतिस्पर्धी है। दर्जनों कंपनियाँ लगातार नए मॉडल लॉन्च कर रही हैं और सॉफ्टवेयर, बैटरी डिजाइन तथा डिजिटल फीचर्स में तेज़ी से प्रयोग हो रहा है।
इस माहौल में काम करने वाली कंपनियाँ नई तकनीकों को जल्दी अपनाने में सक्षम होती हैं। इसी कारण चीन दुनिया का सबसे बड़ा EV बाज़ार और उत्पादक बन चुका है।
पिछले कुछ वर्षों में चीन से इलेक्ट्रिक वाहनों का निर्यात विस्फोटक गति से बढ़ा है।
अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग के अनुसार, 2018 से 2023 के बीच चीन के EV निर्यात में 1,016% की वृद्धि हुई और 2023 में लगभग 16 लाख वाहन विदेशों में भेजे गए।
निर्यात का आर्थिक मूल्य भी तेजी से बढ़ा है। 2023 में चीन के EV निर्यात का कुल मूल्य लगभग 70% बढ़कर करीब 38.5 अरब डॉलर पहुँच गया।
इस वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा उन वाहनों से आता है जिन्हें पश्चिमी कंपनियाँ चीन में बनाकर दुनिया के अन्य बाज़ारों में बेच रही हैं।
इस निर्यात उछाल में यूरोप की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। आज यूरोप चीन में बने EV के लिए सबसे बड़े बाज़ारों में से एक बन चुका है।
कई कंपनियाँ चीन से कम लागत में तैयार किए गए मॉडल सीधे यूरोपीय बाज़ार में भेज रही हैं। इससे यूरोपीय ग्राहकों को सस्ते इलेक्ट्रिक वाहन मिल रहे हैं—लेकिन साथ ही स्थानीय निर्माताओं पर प्रतिस्पर्धी दबाव भी बढ़ रहा है।
यूरोपीय अधिकारियों का कहना है कि कम कीमत वाले EV और चीन की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता यूरोप की ऑटो इंडस्ट्री के लिए जोखिम बन सकती है।
इन चिंताओं के जवाब में यूरोपीय संघ (EU) अब व्यापार और औद्योगिक नीति के मिश्रण का उपयोग कर रहा है।
एक एंटी‑सब्सिडी जांच के बाद यूरोपीय आयोग ने चीन में बने इलेक्ट्रिक वाहनों पर 7.8% से 35.3% तक के अतिरिक्त शुल्क लगाए हैं।
EU का तर्क है कि चीनी सरकारी सहायता से बने वाहन वैश्विक बाज़ार में कृत्रिम रूप से कम कीमत पर बिक सकते हैं।
सिर्फ टैरिफ लगाना ही समाधान नहीं माना जा रहा। यूरोप अपने EV इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए कई अन्य कदमों पर भी विचार कर रहा है, जैसे:
इस व्यापक रणनीति को अक्सर “डी‑रिस्किंग” कहा जाता है—यानी चीन से पूरी तरह अलग हुए बिना उस पर निर्भरता कम करना।
नीति‑निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी जटिलता यह है कि यूरोप में आयात होने वाले कई EV वास्तव में पश्चिमी कंपनियों द्वारा चीन में बनाए गए होते हैं।
यदि आयात पर बहुत कठोर प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो उसका असर यूरोपीय और अमेरिकी कंपनियों पर भी पड़ सकता है जो लागत कम रखने के लिए चीन में उत्पादन करती हैं।
इसलिए यूरोप को दो लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है—एक तरफ घरेलू उद्योग की सुरक्षा और दूसरी तरफ इलेक्ट्रिक वाहनों को इतना सस्ता रखना कि ऊर्जा संक्रमण की गति धीमी न पड़े।
चीन का वैश्विक EV निर्यात केंद्र बनना औद्योगिक नीति, मजबूत सप्लाई चेन और बड़े पैमाने के उत्पादन का परिणाम है। पश्चिमी ऑटो कंपनियाँ भी अब अपनी वैश्विक रणनीति में चीन के कारखानों को शामिल कर चुकी हैं।
यूरोप के लिए असली चुनौती यह है कि वह अपनी ऑटो इंडस्ट्री को प्रतिस्पर्धी बनाए रखते हुए इलेक्ट्रिक वाहनों को आम उपभोक्ताओं के लिए किफायती भी बनाए रखे। आने वाले वर्षों में यही संतुलन वैश्विक ऑटो उद्योग की दिशा तय कर सकता है।
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