Flatiron Institute और Boston University के शोधकर्ताओं ने दिखाया कि टेन्सर‑नेटवर्क एल्गोरिद्म D‑Wave के 2025 के स्पिन‑ग्लास क्वांटम ऐनिलिंग प्रयोगों जैसी डायनेमिक्स को क्लासिकल कंप्यूटर पर भी सिमुलेट कर सकते हैं।[1][23] एल्गोरिद्म ने टेन्सर‑नेटवर्क कम्प्रेशन और belief‑propagation तकनीकों का उपयोग करके क्वांटम एंटैंगल...

Create a landscape editorial hero image for this Studio Global article: How did physicists from the Flatiron Institute and Boston University demonstrate that a classical computer—even a laptop using tensor‑networ. Article summary: They challenged D‑Wave’s claim by showing that the same quantum annealing dynamics in disordered Ising spin glasses can be reproduced accurately and efficiently with classical tensor‑network simulations, rather than requ. Topic tags: general, academic, news, general web, government. Reference image context from search candidates: Reference image 1: visual subject "Their paper detailed an experiment simulating a system with an array of tiny flipping magnets evolving over time. The researchers claimed that" source context "From The Flatiron Institute : “The Surprising Reason a Classical Computer Beat a Quantum Computer at Its Own Game” – sci" Reference image 2: v
2025 में क्वांटम कंप्यूटिंग कंपनी D‑Wave ने एक बड़ा दावा किया। कंपनी ने कहा कि उसका Advantage2 quantum annealer जटिल स्पिन‑ग्लास सिस्टम की क्वांटम डायनेमिक्स को इतनी तेज़ी से सिमुलेट कर सकता है कि वही काम किसी क्लासिकल सुपरकंप्यूटर को करने में लगभग दस लाख साल लग सकते हैं।
लेकिन बाद में आए एक शोध ने इस कहानी को और दिलचस्प बना दिया। Flatiron Institute के Center for Computational Quantum Physics और Boston University के वैज्ञानिकों ने दिखाया कि वही भौतिकी सावधानी से डिज़ाइन किए गए क्लासिकल एल्गोरिद्म—खासकर tensor‑network simulations—से भी दोहराई जा सकती है। कुछ परीक्षणों में ये सिमुलेशन साधारण कंप्यूटिंग हार्डवेयर, यहाँ तक कि एक व्यक्तिगत लैपटॉप, पर भी चलाए गए।
यह नतीजा क्वांटम कंप्यूटिंग को गलत साबित नहीं करता। बल्कि यह दिखाता है कि क्लासिकल और क्वांटम कंप्यूटिंग के बीच की असली सीमा अपेक्षा से कहीं अधिक सूक्ष्म है।
D‑Wave के अध्ययन का फोकस था डिसऑर्डर्ड स्पिन सिस्टम्स—खासकर transverse‑field Ising models। ये मॉडल मैग्नेटिक मटेरियल और स्पिन‑ग्लास भौतिकी को समझने के लिए इस्तेमाल होते हैं।
इन सिस्टम्स को सिमुलेट करना कठिन माना जाता है क्योंकि जैसे‑जैसे स्पिन की संख्या बढ़ती है, क्वांटम स्टेट का आकार घातीय (exponential) रूप से बढ़ता है।
D‑Wave के अनुसार:
कंपनी ने इसे quantum computational advantage—या लोकप्रिय भाषा में quantum supremacy—का व्यावहारिक उदाहरण बताया।
Flatiron और Boston University के शोधकर्ताओं ने उसी तरह के स्पिन‑ग्लास सिस्टम को tensor‑network methods से दोबारा सिमुलेट किया।
टेन्सर नेटवर्क ऐसे गणितीय ढाँचे हैं जो बड़े क्वांटम स्टेट्स को एक संरचित और संपीड़ित (compressed) रूप में दर्शाते हैं।
उनके अध्ययन से पता चला कि:
क्योंकि क्वांटम स्टेट का प्रतिनिधित्व संपीड़ित रहा, सिमुलेशन अपेक्षाकृत कम संसाधनों पर भी चल सके—यहाँ तक कि एक व्यक्तिगत लैपटॉप पर।
इसका उत्तर छिपा है एंटैंगलमेंट की संरचना में।
D‑Wave के अपने विश्लेषण में पाया गया था कि इन सिस्टम्स में एंटैंगलमेंट area‑law scaling का पालन करता है।
इसका मतलब है:
यानी जहाँ एंटैंगलमेंट सीमित या संरचित रहती है, वहाँ क्लासिकल सिमुलेशन अपेक्षा से कहीं आसान हो सकता है।
यह परिणाम यह नहीं कहता कि क्लासिकल कंप्यूटर हर क्वांटम प्रक्रिया को सिमुलेट कर सकते हैं। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट करता है: सिर्फ क्यूबिट्स की संख्या बढ़ जाने से क्लासिकल बाधा अपने‑आप नहीं बनती।
असल फर्क इस बात से पड़ता है कि सिस्टम किस तरह की एंटैंगलमेंट पैदा करता है:
क्वांटम कंप्यूटिंग के इतिहास में यह पैटर्न कई बार देखा गया है। जैसे ही कोई नया quantum advantage दावा सामने आता है, क्लासिकल एल्गोरिद्म भी तेजी से बेहतर होते जाते हैं और वही समस्या हल करने लगते हैं।
दरअसल, यही वैज्ञानिक प्रक्रिया असली सीमा को स्पष्ट करती है। हर नया प्रयोग यह समझने में मदद करता है कि किस प्रकार के क्वांटम सिस्टम वास्तव में क्लासिकल सिमुलेशन से परे हैं।
Flatiron–Boston University के इस काम से संकेत मिलता है कि क्वांटम और क्लासिकल कंप्यूटिंग के बीच की रेखा उतनी सीधी नहीं है जितनी अक्सर प्रचार में दिखाई देती है—यह काफी हद तक एंटैंगलमेंट की संरचना पर निर्भर करती है।
आने वाले वर्षों में वैज्ञानिक ऐसे सिस्टम्स पर ध्यान केंद्रित करेंगे जहाँ टेन्सर‑नेटवर्क कम्प्रेशन विफल हो जाए—क्योंकि वहीं पर क्वांटम कंप्यूटर अपनी असली ताकत दिखा सकते हैं।
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Flatiron Institute और Boston University के शोधकर्ताओं ने दिखाया कि टेन्सर‑नेटवर्क एल्गोरिद्म D‑Wave के 2025 के स्पिन‑ग्लास क्वांटम ऐनिलिंग प्रयोगों जैसी डायनेमिक्स को क्लासिकल कंप्यूटर पर भी सिमुलेट कर सकते हैं।[1][23]
Flatiron Institute और Boston University के शोधकर्ताओं ने दिखाया कि टेन्सर‑नेटवर्क एल्गोरिद्म D‑Wave के 2025 के स्पिन‑ग्लास क्वांटम ऐनिलिंग प्रयोगों जैसी डायनेमिक्स को क्लासिकल कंप्यूटर पर भी सिमुलेट कर सकते हैं।[1][23] एल्गोरिद्म ने टेन्सर‑नेटवर्क कम्प्रेशन और belief‑propagation तकनीकों का उपयोग करके क्वांटम एंटैंगलमेंट को कुशलता से ट्रैक किया, जिससे सिमुलेशन अपेक्षाकृत साधारण हार्डवेयर पर संभव हुआ।[1][23][24]
यह परिणाम बताता है कि क्वांटम लाभ (quantum advantage) केवल क्यूबिट्स की संख्या पर निर्भर नहीं करता; असली फर्क अक्सर क्वांटम अवस्था की एंटैंगलमेंट संरचना से पड़ता है।[1][19]