हर सड़क इस तकनीक के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होती। REPS खासतौर पर उन जगहों को लक्ष्य बनाता है जहाँ वाहन बार‑बार धीमे होते या ब्रेक लगाते हैं। उदाहरण के लिए:
इन स्थानों पर वाहनों की गतिज ऊर्जा अधिक मात्रा में नष्ट होती है। जब उसी जगह सड़क में ऊर्जा‑संग्रह मॉड्यूल लगाए जाते हैं, तो उस ऊर्जा का एक हिस्सा सीधे बिजली में बदला जा सकता है।
विशेष रूप से बंदरगाह (ports) इस तकनीक के लिए आदर्श माने जाते हैं, क्योंकि वहाँ भारी ट्रकों की आवाजाही नियमित और अनुमानित होती है, साथ ही अक्सर रुक‑रुककर चलना पड़ता है। इससे एक ही सड़क हिस्से से बार‑बार ऊर्जा प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
नवंबर 2025 में REPS ने अपना पहला कार्यरत रोड पावर प्लांट जर्मनी के पोर्ट ऑफ हैम्बर्ग में स्थापित किया। यह सिस्टम Hamburger Container Service टर्मिनल पर लगाया गया।
इस पायलट परियोजना की कुछ प्रमुख विशेषताएँ:
अब तक इस सिस्टम के ऊपर से 85,000 से अधिक भारी ट्रक गुजर चुके हैं, जिससे वास्तविक परिस्थितियों में इसकी कार्यक्षमता और टिकाऊपन का परीक्षण किया जा रहा है।
यदि ऐसे सिस्टम बड़े पैमाने पर सफल साबित होते हैं, तो सड़क‑आधारित ऊर्जा संग्रह भविष्य में परिवहन ढांचे का हिस्सा बन सकता है। यानी सड़कें सिर्फ परिवहन के लिए नहीं, बल्कि वितरित बिजली उत्पादन (distributed energy generation) के स्रोत के रूप में भी काम कर सकती हैं।
इसके पीछे कुछ बड़े रुझान भी हैं:
REPS के अनुसार, यदि किसी बड़े बंदरगाह में रणनीतिक स्थानों पर सैकड़ों सिस्टम लगाए जाएँ, तो वे उस बंदरगाह की कुल ऊर्जा आवश्यकता का लगभग 5–10% तक पूरा कर सकते हैं और पोर्ट ट्रैफिक से जुड़ी उत्सर्जन में भी कमी ला सकते हैं।
हैम्बर्ग का पायलट प्रोजेक्ट यह दिखाता है कि सड़क यातायात से ऊर्जा प्राप्त करना तकनीकी रूप से संभव है। लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव के बारे में अभी कई प्रश्न बाकी हैं:
फिलहाल REPS जैसी तकनीकें ऊर्जा‑संग्रह इंफ्रास्ट्रक्चर की नई श्रेणी का प्रतिनिधित्व करती हैं—जहाँ रोजमर्रा की गतिविधियाँ, जैसे वाहन का धीमा होना या ब्रेक लगाना, साफ बिजली पैदा करने का स्रोत बन सकती हैं।
अगर भविष्य में यह मॉडल बड़े पैमाने पर लागू हुआ, तो व्यस्त परिवहन मार्गों की सड़कें सिर्फ गाड़ियों को चलाने का काम नहीं करेंगी—वे चुपचाप बिजली भी पैदा कर सकती हैं।
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