दरअसल EU पहले से ही व्यापार रक्षा उपकरणों का उपयोग कर रहा है। 2024 के अंत तक EU के पास 199 व्यापार‑रक्षा उपाय लागू थे और उसी वर्ष 33 नई जांचें शुरू की गईं—जो 2006 के बाद सबसे अधिक हैं।
EU की रणनीति का दूसरा बड़ा हिस्सा सप्लाई‑चेन सुरक्षा है। यूरोपीय नीति‑निर्माता ऐसे नियमों पर विचार कर रहे हैं जो कंपनियों को एक ही देश—विशेषकर चीन—पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए प्रेरित या बाध्य कर सकते हैं।
इसका उद्देश्य औद्योगिक मशीनरी, रसायन और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उत्पादन को अधिक लचीला बनाना है, ताकि भू‑राजनीतिक तनाव या व्यापारिक व्यवधान होने पर यूरोप की अर्थव्यवस्था प्रभावित न हो।
यह कदम EU की व्यापक आर्थिक सुरक्षा (economic security) रणनीति का हिस्सा है—जिसमें व्यापार जारी रखते हुए रणनीतिक जोखिमों को कम करना शामिल है।
EU‑चीन तनाव का एक और बड़ा केंद्र दूरसंचार तकनीक है। यूरोपीय आयोग ने आकलन किया है कि चीनी टेलीकॉम कंपनियाँ Huawei और ZTE अन्य 5G सप्लायर्स की तुलना में अधिक सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकती हैं।
इसी वजह से EU ने सदस्य देशों को सलाह दी है कि वे संवेदनशील 5G नेटवर्क में इन कंपनियों के उपकरणों के उपयोग को सीमित या बंद करें। आयोग ने यह भी कहा है कि वह अपने आंतरिक नेटवर्क को ऐसे सप्लायर्स से दूर रखेगा।
नई साइबरसिक्योरिटी नीतियों के तहत EU भविष्य में “हाई‑रिस्क सप्लायर्स” के उपकरणों को महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे से चरणबद्ध तरीके से हटाने की दिशा में भी कदम उठा सकता है—जिसे आलोचक चीन की कंपनियों को निशाना बनाने के रूप में देखते हैं।
बीजिंग इन आरोपों को सिरे से खारिज करता है। चीनी अधिकारियों का कहना है कि पश्चिमी देशों द्वारा उठाया गया ओवरकैपेसिटी का मुद्दा राजनीतिक रूप से प्रेरित है और वास्तव में यह चीन की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता से पैदा हुई चिंता को दर्शाता है।
चीन का तर्क है कि सस्ते और बड़े पैमाने के निर्यात को ओवरकैपेसिटी कहना वास्तव में व्यापार संरक्षणवाद का बहाना है, जिसका उद्देश्य चीनी कंपनियों की वैश्विक बाजार तक पहुंच सीमित करना है।
साथ ही, चीन ने चेतावनी दी है कि यदि EU नई व्यापारिक पाबंदियाँ लागू करता है तो इससे वैश्विक सप्लाई‑चेन प्रभावित हो सकती हैं और वह जवाबी कार्रवाई भी कर सकता है।
EU के अंदर भी इस मुद्दे पर पूरी सहमति नहीं है। कुछ सदस्य देश—खासकर वे जिनके चीन के साथ मजबूत व्यापारिक रिश्ते हैं—अभी तक कड़े कदम उठाने को लेकर सावधान रहे हैं।
इनमें जर्मनी सबसे महत्वपूर्ण है। यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के कारण उसकी औद्योगिक कंपनियों के चीन में बड़े व्यावसायिक हित हैं। इसलिए बर्लिन का रुख अक्सर EU नीति को प्रभावित करता है।
लेकिन अब EU में बढ़ते दबाव के कारण जर्मनी सहित कई देशों से अपेक्षा की जा रही है कि वे मजबूत व्यापार‑रक्षा नीतियों और आर्थिक सुरक्षा उपायों का समर्थन करें।
इन सभी घटनाओं को मिलाकर देखें तो यूरोप की चीन नीति में स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है। पहले जहां सस्ते आयात और आर्थिक एकीकरण पर जोर था, अब बहस इस बात पर केंद्रित है कि कहीं राज्य‑समर्थित निर्यात और तकनीकी निर्भरता यूरोप के औद्योगिक आधार और सुरक्षा को कमजोर तो नहीं कर रही।
इसका परिणाम यह है कि EU की नीति धीरे‑धीरे खुली बाजार रणनीति से हटकर एक अधिक रक्षात्मक मॉडल की ओर बढ़ रही है—जिसमें व्यापार रक्षा उपकरण, तकनीकी प्रतिबंध और सप्लाई‑चेन विविधीकरण शामिल हैं।
भविष्य में यह रणनीति EU‑चीन संबंधों को स्थिर करेगी या दोनों के बीच बड़ा व्यापारिक संघर्ष पैदा करेगी—यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन इतना तय है कि यूरोप अब आर्थिक नीति, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और राष्ट्रीय सुरक्षा को एक साथ जोड़कर चीन के साथ अपने संबंधों का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है।
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