आमतौर पर जब आर्थिक गतिविधि धीमी पड़ती है तो कीमतों पर दबाव कम हो जाता है। लेकिन यूरोज़ोन में अभी इसका उल्टा हो रहा है।
सर्वेक्षण बताते हैं कि कंपनियों की इनपुट लागत और बिक्री कीमतें कई वर्षों में सबसे तेज़ गति से बढ़ रही हैं, जिसका मुख्य कारण महँगी ऊर्जा और आपूर्ति बाधाएँ हैं।
यह स्थिति तथाकथित कॉस्ट‑पुश इन्फ्लेशन की है—जब बाहरी झटके (जैसे ऊर्जा कीमतें) उत्पादन लागत बढ़ा देते हैं और कंपनियाँ इन खर्चों का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाल देती हैं।
इससे एक कठिन आर्थिक मिश्रण बनता है:
यही स्थिति स्टैगफ्लेशन की परिभाषा से मेल खाती है।
कमजोर संकेतकों का असर आधिकारिक आर्थिक अनुमानों में भी दिखाई देने लगा है। यूरोपीय आयोग ने 2026 के लिए यूरोज़ोन विकास अनुमान घटाकर लगभग 0.9% कर दिया, जो पहले लगभग 1.2% था।
आयोग के अनुसार बढ़ती ऊर्जा कीमतें घरेलू बिजली और ईंधन बिल बढ़ा रही हैं, जिससे उपभोक्ता खर्च और कंपनियों का निवेश दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
यूरोप की स्थिति इसलिए और संवेदनशील है क्योंकि यूरोपीय संघ ऊर्जा का बड़ा आयातक है। वैश्विक तेल और गैस कीमतों में उछाल सीधे यूरोपीय अर्थव्यवस्था पर असर डालता है।
ऊर्जा कीमतों में अचानक वृद्धि अर्थव्यवस्था को कई रास्तों से प्रभावित करती है:
ECB भी मानता है कि मध्य पूर्व संघर्ष महँगाई के लिए ऊपर की ओर जोखिम और आर्थिक वृद्धि के लिए नीचे की ओर दबाव पैदा कर रहा है, मुख्य रूप से ऊर्जा कीमतों के माध्यम से।
रोज़गार के आधिकारिक आँकड़े आमतौर पर देर से आते हैं, लेकिन सर्वेक्षण संकेत दे रहे हैं कि कंपनियाँ अब भर्ती धीमी कर रही हैं। कुछ क्षेत्रों में नौकरी में कटौती भी दिखाई देने लगी है, क्योंकि कंपनियाँ कमजोर मांग और बढ़ती लागत का सामना कर रही हैं।
यदि आर्थिक मंदी जारी रहती है तो सेवाओं के क्षेत्र—जहाँ यूरोज़ोन के अधिकतर लोग काम करते हैं—में रोजगार वृद्धि और कमजोर पड़ सकती है।
यूरोपीय सेंट्रल बैंक का लक्ष्य महँगाई को लगभग 2% के आसपास स्थिर रखना है। लेकिन मौजूदा स्थिति में महँगाई का जोखिम बढ़ रहा है जबकि आर्थिक गतिविधि कमजोर हो रही है।
इससे ECB के सामने दो कठिन विकल्प हैं:
इतिहास बताता है कि केंद्रीय बैंकों के लिए सप्लाई‑शॉक वाली महँगाई को नियंत्रित करना सबसे मुश्किल होता है, क्योंकि ब्याज दरें बढ़ाने से तेल या गैस की आपूर्ति सीधे नहीं बढ़ती।
अभी यूरोज़ोन पूरी तरह स्टैगफ्लेशन संकट में नहीं पहुँचा है, लेकिन संकेत उसी दिशा में जा रहे हैं—कमज़ोर गतिविधि, बढ़ती लागत और घटते विकास अनुमान।
अगर ऊर्जा कीमतें ऊँची बनी रहती हैं या आपूर्ति व्यवधान बढ़ते हैं, तो आने वाले महीनों में यूरोप की अर्थव्यवस्था और केंद्रीय बैंक—दोनों के लिए चुनौती और गंभीर हो सकती है।
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