ग्रीनलैंड का रक्षा महत्व भी बड़ा है। यहां उत्तर‑पश्चिम में स्थित पिटुफिक स्पेस बेस (पहले थुले एयर बेस) पर अमेरिका मिसाइल‑चेतावनी रडार और अंतरिक्ष निगरानी प्रणालियां संचालित करता है, जिन्हें अमेरिका और नाटो की रक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
तनाव तब बढ़ा जब लुइसियाना के गवर्नर जेफ लैंड्री को ग्रीनलैंड के लिए अमेरिकी विशेष दूत नियुक्त किया गया। यह कदम डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों के लिए संवेदनशील बन गया क्योंकि उसी समय वॉशिंगटन से ग्रीनलैंड के रणनीतिक नियंत्रण की जरूरत पर बयान भी सामने आ रहे थे।
डेनमार्क के अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उनकी क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किया जाना चाहिए और ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की किसी भी चर्चा को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
लैंड्री एक और विवाद में भी आ गए जब ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री ने अमेरिका द्वारा भेजे जाने वाले नौसेना के अस्पताल जहाज के प्रस्ताव को सार्वजनिक रूप से “नो थैंक यू” कहकर ठुकरा दिया। इसके बाद लैंड्री ने इस फैसले की आलोचना की, जिससे कूटनीतिक माहौल और ठंडा हो गया।
इसी वजह से जब लैंड्री नूक पहुंचे, तो कई स्थानीय नेताओं को यह यात्रा सामान्य कूटनीतिक मुलाकात से ज्यादा अमेरिकी दबाव का संकेत लगी।
इसी दौरान मीडिया रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच द्वीप पर अमेरिकी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने को लेकर गोपनीय बातचीत चल रही है।
कुछ अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि अमेरिका दक्षिणी ग्रीनलैंड में तीन तक नए सैन्य ठिकाने स्थापित करने का प्रस्ताव दे रहा है। इनका उद्देश्य आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियों की निगरानी मजबूत करना बताया जा रहा है।
हालांकि इन वार्ताओं के कई विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं और संबंधित सरकारों ने भी औपचारिक रूप से सभी प्रस्तावों की पुष्टि नहीं की है। इसलिए इन योजनाओं की पूरी सीमा अभी स्पष्ट नहीं है।
कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि बातचीत में लंबी अवधि की सुरक्षा साझेदारी, आर्कटिक बुनियादी ढांचे और निवेश से जुड़े मुद्दे शामिल हो सकते हैं। लेकिन इन दावों का पूरा आधिकारिक विवरण सामने नहीं आया है।
ग्रीनलैंड, डेनमार्क के साम्राज्य के भीतर एक स्वायत्त क्षेत्र है। दोनों सरकारों ने बार‑बार स्पष्ट किया है कि द्वीप का भविष्य केवल ग्रीनलैंड की जनता तय कर सकती है और इसे किसी दूसरे देश को सौंपने का सवाल ही नहीं उठता।
ग्रीनलैंड के नेता यह भी कहते हैं कि वे अंतरराष्ट्रीय निवेश, बुनियादी ढांचे और सुरक्षा सहयोग के लिए तैयार हैं — जिसमें अमेरिका भी शामिल हो सकता है — लेकिन यह सब उनकी राजनीतिक स्वायत्तता का सम्मान करते हुए होना चाहिए।
इसी बीच यूरोपीय संघ ने भी ग्रीनलैंड के साथ अपने कूटनीतिक और आर्थिक संबंध मजबूत करने की कोशिश तेज कर दी है। यह यूरोप की व्यापक आर्कटिक रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखना है।
दरअसल ग्रीनलैंड केवल एक दूरस्थ द्वीप नहीं रहा। यह भविष्य के आर्कटिक समुद्री मार्गों, संभावित दुर्लभ खनिज संसाधनों और उत्तरी अमेरिका‑यूरोप‑रूस के बीच सैन्य निगरानी के लिए महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित है।
जैसे‑जैसे जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक क्षेत्र अधिक सुलभ होता जा रहा है, वैसे‑वैसे ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व भी बढ़ता जा रहा है।
नूक में कॉन्सुलेट और जेफ लैंड्री की यात्रा को लेकर हुआ विवाद असल में एक बड़े भू‑राजनीतिक बदलाव की झलक है।
अमेरिका आर्कटिक में अपनी सुरक्षा और खुफिया क्षमता मजबूत करना चाहता है। डेनमार्क अपने स्वायत्त क्षेत्र की संप्रभुता बनाए रखना चाहता है। ग्रीनलैंड निवेश और सुरक्षा साझेदारी चाहता है, लेकिन राजनीतिक नियंत्रण खोए बिना। वहीं यूरोपीय संघ और अन्य शक्तियां भी इस क्षेत्र में सक्रिय हो रही हैं ताकि कोई एक देश यहां हावी न हो सके।
यानी आर्कटिक अब दुनिया का दूरस्थ और शांत इलाका नहीं रहा — यह तेजी से वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का नया केंद्र बनता जा रहा है।
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