इस तेजी के पीछे मुख्य कारण हैं—गर्म होते महासागर और तेजी से पिघलती हिमनद व ध्रुवीय बर्फ की चादरें।
कई वर्षों तक वैज्ञानिकों को एक समस्या का सामना करना पड़ा जिसे “सी‑लेवल बजट गैप” कहा जाता था। इसका मतलब था कि समुद्र स्तर में जितनी वृद्धि मापी जा रही थी, वह ज्ञात कारणों के कुल योग से पूरी तरह मेल नहीं खाती थी।
नए अध्ययन के अनुसार यह अंतर अब काफी हद तक खत्म हो गया है। इसके पीछे कुछ अहम सुधार हैं:
इन सुधारों के बाद अब वैज्ञानिक लगभग पूरी तरह समझ पा रहे हैं कि समुद्र स्तर में जितनी वृद्धि दिख रही है, वह किन‑किन भौतिक प्रक्रियाओं से आ रही है।
अध्ययन के अनुसार 1960 से अब तक समुद्र स्तर वृद्धि के स्रोतों का योगदान इस प्रकार है:
जब समुद्र का पानी गर्म होता है तो उसका आयतन बढ़ता है—इसे ही तापीय विस्तार कहते हैं। यही कारण अब तक समुद्र स्तर बढ़ने में सबसे बड़ा कारक रहा है।
1960 के शुरुआती दशकों में समुद्र स्तर बढ़ने में मुख्य भूमिका गर्म होते महासागरों के फैलाव की थी। लेकिन हाल के वर्षों में ग्लेशियर और आइस शीट के पिघलने का योगदान तेजी से बढ़ा है।
ये प्रक्रियाएँ जलवायु परिवर्तन से गहराई से जुड़ी हैं। खास बात यह है कि बड़ी बर्फ की चादरें धीरे‑धीरे प्रतिक्रिया करती हैं—इसलिए उनका प्रभाव कई दशकों या सदियों तक जारी रह सकता है।
समुद्र स्तर बढ़ने का असर सिर्फ तब नहीं दिखता जब जमीन स्थायी रूप से डूब जाए। उससे पहले भी कई समस्याएँ बढ़ने लगती हैं:
इनका असर बंदरगाहों, शहरों की ड्रेनेज प्रणाली, आवास, बीमा लागत और बुनियादी ढाँचे पर पड़ सकता है—खासकर उन क्षेत्रों में जो समुद्र तल के करीब हैं।
“सी‑लेवल बजट” का लगभग पूरा हिसाब मिल जाना वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। इससे यह भरोसा मजबूत होता है कि महासागरों के गर्म होने और बर्फ के पिघलने से समुद्र स्तर बढ़ने के मॉडल वास्तविकता को सही तरीके से दर्शाते हैं।
नीति‑निर्माताओं और शहरी योजनाकारों के लिए इसका मतलब है कि वे अधिक भरोसे के साथ निर्णय ले सकते हैं, जैसे:
एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि भविष्य की योजना स्थिर नहीं बल्कि तेज़ होती समुद्र‑स्तर वृद्धि को ध्यान में रखकर बनानी होगी। क्योंकि महासागर लंबे समय तक गर्मी संचित रखते हैं और बर्फ की चादरें धीरे‑धीरे प्रतिक्रिया देती हैं, इसलिए समुद्र स्तर आने वाली सदियों तक बढ़ता रह सकता है—even अगर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन स्थिर भी हो जाए।
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