वैज्ञानिकों ने उस समय के वातावरण को समझने के लिए कई तरह के प्रमाणों को एक साथ जोड़ा:
इन सब संकेतों से शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि शुरुआती यूकैरियोट संभवतः समुद्री तल पर रहने वाले ऐसे जीव थे जो ऑक्सीजन वाले छोटे‑छोटे पर्यावरणीय क्षेत्रों के अनुकूल थे।
यदि ये जीव ऑक्सीजन‑समृद्ध वातावरण में रहते थे, तो इसका मतलब है कि वे संभवतः एरोबिक मेटाबोलिज़्म यानी ऑक्सीजन का उपयोग करके ऊर्जा बनाने की प्रक्रिया पर निर्भर थे।
कई वैज्ञानिक इसे इस बात का अप्रत्यक्ष संकेत मानते हैं कि शुरुआती यूकैरियोट के पास पहले से माइटोकॉन्ड्रिया या माइटोकॉन्ड्रिया‑जैसे ऊर्जा तंत्र मौजूद थे। माइटोकॉन्ड्रिया कोशिकाओं के भीतर ऊर्जा उत्पादन के लिए जिम्मेदार संरचनाएँ होती हैं और आधुनिक सभी यूकैरियोटिक जीव इनके साथ विकसित हुए हैं।
हालाँकि यूकैरियोट लगभग 1.7–1.8 अरब साल पहले मौजूद थे, लेकिन बहुत लंबे समय तक पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र पर उनका प्रभुत्व नहीं रहा। उस समय अधिकांश जीवन अभी भी प्रोकैरियोटिक सूक्ष्मजीवों के नियंत्रण में था।
एक प्रमुख कारण पर्यावरणीय सीमाएँ हो सकती हैं। पृथ्वी के वातावरण में ऑक्सीजन बढ़ने के बावजूद, गहरे महासागरों के बड़े हिस्से लंबे समय तक ऑक्सीजन‑विहीन रहे।
इस वजह से ऑक्सीजन पर निर्भर शुरुआती यूकैरियोट संभवतः केवल उथले और ऑक्सीजन वाले समुद्री तल के छोटे‑छोटे क्षेत्रों तक सीमित रहे। इससे उनकी विविधता और पारिस्थितिक प्रभाव लंबे समय तक सीमित रहा।
यह अध्ययन दिखाता है कि पृथ्वी पर जटिल जीवन का विकास सीधे तौर पर ग्रह के बदलते पर्यावरण से जुड़ा था। शुरुआती यूकैरियोट अपेक्षाकृत जल्दी उत्पन्न हो गए थे, लेकिन उनका विस्तार तभी संभव हुआ जब महासागरों में ऑक्सीजन धीरे‑धीरे अधिक व्यापक होने लगी।
जब समुद्री वातावरण अधिक ऑक्सीजन‑समृद्ध हुआ, तब यूकैरियोट समुद्री तल से बाहर निकलकर खुले महासागर के पारिस्थितिक तंत्रों में फैलने लगे। यही प्रक्रिया आगे चलकर शैवाल, बहुकोशिकीय जीवों और अंततः जानवरों के विकास का रास्ता बनी।
दूसरे शब्दों में, ऑस्ट्रेलिया के ये फॉसिल उस दौर की झलक देते हैं जब जटिल कोशिकाएँ तो मौजूद थीं, लेकिन पृथ्वी के महासागर अभी उनके व्यापक विस्तार के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे।
Comments
0 comments